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मोदी के खिलाफ फिर सिफर साबित होते राहुल बाबा

नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) राहुल गांधी एक बार फिर से फेळ हुए। वे हमेशा खुद को बचाकर चलते हैं। लोकसभा चुनाव से पहले भी यही हुआ। अब महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों में भी वही कहानी दोहराई गई।

Rahul Gandhi failed to fight Narendra Modi effectively

मोदी सरकार के खिलाफ शायद मुद्दों की कमी नहीं हैं, लेकिन उसके लिए जंग-ए-मैदान में पूरी तैयारी के साथ निकलना होगा। नानप्लेयिंग कैप्टन बनकर कुछ हासिल नहीं होगा। हुजूर-ए-आला समझ लीजिए, हिम्मत-ए- मर्दा, मदद-ए-खुदा। वरना जनता अब रहम कर सत्ता देने से रही।

प्रधानमंत्री होने के बावजूद मोदी ने खुद दोनों राज्यों में चुनाव की कमान संभाली। राज्य भी ऐसे, जिनमें भाजपा दोयम दर्जे की या जूनियर सहयोगी की तरह जानी जाती रही है।

दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर कहते हैं कि पुराने सारे गठ-बंधन तोड़कर ताल ठोकी। विपरीत नतीजे आने पर मोदीमैजिक उतरने के खतरे के बावजूद प्रधानमंत्री ने जिम्मेदारी संभाली। हिम्मत की तो उनकी पार्टी को फल भी मिला।

वहीं उत्तर प्रदेश की शिकस्त के बाद राहुल उबर ही नहीं पा रहे। लोकसभा चुनाव में सीधे चेहरा बनने से वह बचे। केंद्र में करारी शिकस्त के बाद अब तो कांग्रेस उपाध्यक्ष के पास खोने को नहीं सिर्फ पाने को ही बचा है।

मगर लड़ने की हिम्मत तक राहुल नहीं जुटा पा रहे। नतीजों के बाद भी राहुल और उनकी मां सोनिया गांधी ने जनता के सामने तक आना जरूरी नहीं समझा। तो क्या कांग्रेस को लग रहा है कि चांदी के चम्मच में रखकर उनको फिर सत्ता मिल जाएगी?

जानकार मानते हैं कि मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ अगर सघन और ईमानदार आंदोलन चलाया जाए तो जनता फिऱ से कांग्रेस को लेकर सोचने लगेगी।

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