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हार के बाद घर के झगड़ों से परेशान कांग्रेस की कम नहीं हो रही हैं मुश्किलें

By आर एस शुक्ल
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नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को हार क्या मिली, एक तरह से पूरी पार्टी पर ही संकट के बादल मंडराने लगे। कहां पार्टी को उम्मीदें थीं कि इस चुनाव में वह अच्छा प्रदर्शन करेगी और उन राज्यों में भी मजबूत हो सकेगी जहां अभी उसकी हालत कमजोर है। लेकिन हो गया सब उल्टा। उन राज्यों में भी पार्टी में झगड़े बढ़ गए जहां सरकारें हैं और इस सबसे निपटना भी आसान नहीं रह गया। इसके अलावा, एक के बाद नेताओं के इस्तीफों ने हालात और ज्यादा खराब कर दिए। खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इस्तीफे की पेशकश के बाद तो ऐसा लगने लगा है कि जैसे अब सब कुछ पार्टी के हाथ से निकलता जा रहा है। अभी भी इसको लेकर संशय बना हुआ है कि राहुल अध्यक्ष बने रहेंगे अथवा अपने इस्तीफे पर अड़े रहेंगे। हालांकि पार्टी की ओर से इस तरह के संकेत दिए जा रहे हैं कि वही अध्यक्ष हैं और रहेंगे। लेकिन इसका असर भी पार्टी पर पड़ ही रहा है। इसके अलावा, जिस तरह से राज्य इकाइयों में गुटबाजी और झगड़े सामने आ रहे हैं, उससे लगता है कि कांग्रेस का संकट कम होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है।

तेलंगाना में विधायक छोड़ गए पार्टी

तेलंगाना में विधायक छोड़ गए पार्टी

सबसे ताजा संकट तेलंगाना में खड़ा हुआ जहां पार्टी के कांग्रेस के 12 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया और सत्ताधारी टीआरएस में शामिल हो गए। इसका असर यह हुआ कि वहां कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी नहीं रही बल्कि एक तरह से तीसरे स्थान वाली पार्टी हो गई। तेलंगाना में कांग्रेस के 19 विधायक थे। एक विधायक सांसद बन जाने के बाद इस्तीफा दे चुके थे। इन 12 विधायकों के इस्तीफे के बाद पार्टी विधायकों की संख्या छह ही रह गई। एआईएमआईएम के सात विधायक हैं जो अब दूसरे नंबर की पार्टी हो गई है। इससे पहले महाराष्ट्र में वरिष्ठ कांग्रेस नेता और विपक्ष के नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल ने त्यागपत्र दे दिया। इससे पहले एक अन्य विधायक अब्दुल सत्तार पार्टी से निष्कासित किए जा चुके हैं। सत्तार का दावा है कि कांग्रेस के आठ से दस विधायक पाला बदलकर भाजपा में जा सकते हैं। गुजरात में विधायक अल्पेश ठाकोर पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं। अल्पेश विधानसभा चुनाव से पहले ही कांग्रेस में आए थे। अब अल्पेश यह भी कह रहे हैं कि गुजरात के करीब एक दर्जन से ज्यादा विधायक कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जा सकते हैं।

 कर्नाटक में भी बगावत

कर्नाटक में भी बगावत

कर्नाटक में पार्टी नेता रोशन बेग अलग विद्रोह का झंडा उठाए हुए हैं। कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस की सरकार है। विधानसभा चुनावों में राज्य में कांग्रेस ने अच्छी जीत हासिल की थी, लेकिन राजनीतिक मजबूरी में जेडीएस को समर्थन देना पड़ा था और कुमारस्वामी के नेतृत्व में सरकार बनी थी। सरकार बनने के साथ ही कांग्रेस-जेडीएस में झगड़ा भी शुरू हो गया था। कांग्रेस के भीतर भी विभिन्न मामलों को लेकर नेताओं में गुटबाजी और झगड़े बढ़ने लगे थे। रोशन बेग के विद्रोह को इसी कड़ी में देखा जा सकता है जिनका आरोप है कि वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा की जा रही है जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। सरकार को लेकर कांग्रेस और जेडीएस के बीच का भी झगड़ा पुराना है। कुमारस्वामी कांग्रेस को लेकर शुरू से ही असहज महसूस करते रहे हैं। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और कुछ अन्य नेताओं को लेकर भी विवाद सामने आते रहे हैं। कुछ कांग्रेस विधायकों में मंत्री न बनाए जाने अथवा तवज्जो न दिए जाने को लेकर शिकायतें हैं। इस तरह कर्नाटक में भी पार्टी संगठन के भीतर झगड़े हैं।

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 मध्यप्रदेश पंजाब में भी झगड़े

मध्यप्रदेश पंजाब में भी झगड़े

मध्यप्रदेश, राजस्थान और पंजाब में अलग झगड़े हैं। पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और मंत्री नवजोत सिंह के बीच तनातनी बढ़ती ही जा रही है। सिद्धू भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए थे। लेकिन उनके आने के बाद से ही वह न केवल तमाम तरह के विवादों में घिरते चले गए बल्कि अमरिंदर सिंह को पसंद भी आ रहे थे। लोकसभा चुनावों के दौरान भी दोनों के बीच के झगड़े सार्वजनिक होते रहे। सिद्धू की पत्नी ने पहले उम्मीदवार न बनाए जाने को लेकर कैप्टन को घेरना शुरू किया। चुनाव परिणामों के बाद तो कैप्टन और सिद्धू की ओर से हार के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार तक ठहराया जाने लगा। अभी हाल में इस सबका परिणाम इस रूप में सामने आया कि कैप्टन ने सिद्धू का मंत्रालय बदल दिया। इससे पहले सिद्धू कैबिनेट की बैठक में शामिल नहीं हुए तो माना गया कि ऐसा उन्होंने कैप्टन के साथ मनमुटावों की वजह से किया। हालांकि बाद में उन्होंने सफाई दी कि बैठक के एजेंडे में उनके मंत्रालय से संबंधित कुछ नहीं था इसलिए वह बैठक में शामिल नहीं हुए थे। अभी भी इन दोनों नेताओं के बीच का झगड़ा सुलझा हुआ नहीं लग रहा है। कहा तो यहां तक जा रहा है दोनों के बीच की लड़ाई अभी और आगे जा सकती है। ऐसे में बाहर यही संदेश जा रहा है कि भले ही कांग्रेस की सरकार को कोई खतरा नहीं है लेकिन इस तरह की आपसी लड़ाइयों का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ सकता है।

मध्यप्रदेश और राजस्थान में अपने झगड़े हैं जो विधानसभा चुनाव के पहले से सामने आ रहे थे। अब लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद वे खुलकर सामने आ गए हैं। विधानसभा चुनावों में मध्यप्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया मुख्यमंत्री पद के दावेदार माने जाते थे। चुनाव परिणामों के बाद कमलनाथ को कुर्सी मिल गई और सिंधिया रह गए। तभी से यह कहा जा रहा था कि सिंधिया नाराज हैं। यह भी कहा गया कि लोकसभा चुनावों में इन दोनों नेताओं ने कांग्रेस की जीत की गारंटी के लिए वह सब नहीं किया जो इन्हें करना चाहिए था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कार्यसमिति की बैठक में कह दिया था कि पार्टी नेता अपने बेटों को टिकट दिलाने के लिए पहले दबाव बनाते रहे और बाद में केवल उन्हीं के लिए प्रचार करते रहे। दरअसल कमलनाथ अपने बेटे नकुल नाथ, अशोक गहलोत अपने बेटे बैभव गहलोत और पी चिदंबरम अपने बेटे कार्ति चिदंबरम को टिकट के लिए लॉबिंग की थी। नकुल नाथ और कार्ति चिदंबरम तो जीत गए थे लेकिन वैभव गहलोत को हार का सामना करना पड़ा था। मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया तक चुनाव हार गए थे। अब सिंधिया और कमलनाथ दोनों एक दूसरे पर हार को लेकर आरोप लगा रहे हैं।

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राजस्थान में सतह पर झगड़ा

राजस्थान में सतह पर झगड़ा

राजस्थान में भी इसी तरह का झगड़ा नेताओं के बीच सतह पर आ चुका है। वहां भी माना जा रहा था कि विधानसभा चुनावों में अगर कांग्रेस को जीत मिलती है तो सचिन पायलट मुख्यमंत्री होंगे। सचिन ने बतौर राज्य अध्यक्ष राजस्थान में बहुत काम किया था और जीत का पूरा श्रेय भी उनको जा रहा था लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को बना दिया गया। उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में अंदाजा लगाया जा रहा था कि वहां कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करेगी। लेकिन परिणाम उसके ठीक विपरीत आए। कांग्रेस का सफाया हो गया और भाजपा 24 सीटों पर विजयी रही। एक सीट पर उनकी सहयोगी पार्टी को जीत मिली। अशोक गहलोत अपने बेटे की जीत भी सुनिश्चित नहीं करा सके। इसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की इस्तीफे की पेशकश और गहलोत को बेटे को टिकट के लिए अड़ने की बात कहने के बाद सचिन पायलट खुलकर राहुल गांधी के समर्थन और अशोक गहलोत के विरोध में खड़े हो गए। इतना ही नहीं, दोनों नेताओं ने राज्य में कांग्रेस की हार के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। यह झगड़ा अभी भी चला आ रहा है।

 बढ़ती ही जा रही दुश्वारियां

बढ़ती ही जा रही दुश्वारियां

हालांकि कांग्रेस के भीतर गुटबाजी, आपसी झगड़े और इस्तीफे कोई नई बात नहीं रही है। लेकिन ऐसे समय जब पार्टी खुद को नए सिरे से स्थापित करने की कोशिश में लगी हो और पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी जीत की गारंटी करने में जुटे हों, नेताओं के इस्तीफे और विधायकों के त्यागपत्र देकर अन्य पार्टियों में शामिल होते जाने और नए सिरे से राज्यों में बड़े नेताओं के बीच टकराहट से कांग्रेस की दुश्वारियां बढ़ती ही जा रही हैं। इन्हें प्रभावी तरीके से रोकने का भी कोई पुख्ता रोडमैप कांग्रेस के पास नहीं लगता जो पहले भी उसके पास नहीं रहा है। ऐसे में इन ताजा घटनाक्रमों को कांग्रेस के लिए खराब संकेत ही माना जाना चाहिए। अब वक्त आ गया है कि कांग्रेस, उसके अध्यक्ष और अन्य वरिष्ठ नेता इस सब पर गंभीरता से विचार करें और इससे निपटने की तरकीब खोजें। अगर वक्त रहते इन पर काबू नहीं पाया जा सका, तो आने वाले दिनों में कांग्रेस का संकट गहरा हो सकता है जिससे पार पाना मुश्किल हो सकता है।

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English summary
rahul gandhi congress face problem after lose lok sabha elections
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