राहुल गांधी जी यह गर्व की नहीं शर्म की बात है!

Rahul Gandhi can afford to be a loser
उनके पास तैयारी के लिए दस साल थे, फिर भी राहुल गांधी अपने राजनीतिक जीवन के पहले टेलीविज़न इंटरव्यू के लिए बिना किसी तैयारी के आये। ऐसा लग रहा था कि उन्होंने अंतिम समय में कुछ मुद्दों को याद कर लिया है जैसे आरटीआई, युवा, महिलाएं और व्यवस्था लेकिन उस इंटरव्यू के लिए जो करीब 90 मिनट तक चला, उनका बार बार इन शब्दों का इस्तेमाल करना उन्हें किसी तरह से भी उत्तीर्ण सिद्ध नहीं करता। पिछले कुछ समय से ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ परीक्षाओं की तरह राजनीति भी निहायत ही कठोर और क्रूर हो गयी है।

राहुल गांधी ईमानदार और सच्चे थे जब उन्होंने कहा कि सत्ता की भूख उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित नहीं करती पर उस एक स्वीकृति से उन्होंने यह भी बता दिया कि क्यों वह उच्च पद पर टिकने के लिए अयोग्य हैं। युवा काम काज और महिलाओं के उत्थान को अगर छोड़ दें तो प्रधानमंत्री को भूल जाइये, राहुल गांधी तो कैबिनेट मिनिस्टर बनने के लायक भी नहीं लगे। किसी भी और पेशे की तरह राजनीति में उन्नति के लिए इंसान को प्रेरित होना चाहिए, अंदर कुछ करने की तमन्ना होनी चाहिए, जानने की लालसा होनी चाहिए, पाने की चाह होनी चाहिए, तेज़ी से ऊंचाई की ओर बढ़ने की अभिलाषा होनी चाहिए। ऐसा कहना झूठ नहीं होगा कि राहुल में इन सब में से कोई गुण नहीं।

हालांकि, इस बात से ज्यादा कि राहुल गांधी में यह गुण नहीं हैं, यह तथ्य ज्यादा ज़रूरी है कि वह इन गुणों को अपने अंदर लाना नहीं चाहते। यह उनके उत्तराधिकार का अभिशाप है। उनका जन्म कांग्रेस पार्टी का निर्देशन करने के लिए हुआ है। इसे कांग्रेस पार्टी का नेहरू-गांधी राजवंश के लिए जी हुज़ूरीपन ही कहेंगे कि यह विचार तो उनके मन में कभी आया ही नहीं होगा कि एक दिन उन्हें गैर प्रदर्शन के लिए अपदस्थ कर दिया जाएगा। इसलिए अपने स्थायी दर्ज़े को लेकर आश्‍वस्‍त होने के कारण, जीतना या हारना राहुल के लिए ज्यादा महत्व नहीं रखता।

राजनितिक उत्तराधिकार को स्वेच्छा से छोड़ दें राहुल

एक बड़ी राजनीतिक हार के बाद भी उनके अंदर आग सुलग नहीं सकी। दूसरे राजनेताओं की तरह राहुल गांधी भी हारना बर्दाश्त कर सकते हैं, जैसे वह एक इंटरव्यू से लड़खड़ाते हुए निकल सकते हैं। वह ऐसा कह सकते हैं कि वह कांग्रेस की हार का पूरा श्रेय लेने के लिए तैयार हैं क्योंकि इसका नतीजा उनके ऊपर असर नहीं डालने वाला- इसलिए भी क्योंकि उनमें सत्ता की भूख नहीं है। वह एक अपवाद हैं। राहुल गांधी ने जो भी कहा वह गर्व से कहा।

यह गर्व की बात नहीं है। यह शर्म की बात है कि भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का नेता राजनीति के कठोर और कड़े रास्ते पर चलना नहीं चाहता पर राजनीति को एक गैर- राजनेता की तरह अपने धीमे विकास का माध्यम मानता है। यह उनके दादा परदादा के विचारों से बिलकुल मेल नहीं खाता जो राजनीति को भारत की खोज की तरह लेते थे। राजवंश में अब घटते हुए मुनाफे का कानून आ गया है।

राहुल गांधी सिर्फ अपनी पार्टी खोलने के लिए भावुक दिखते हैं और राजनीतिक व्यवस्था को अलग थलग स्थिति से निकालना चाहते हैं पर वह खुद अपने प्रजातंत्रीकरण आंदोलन के अंतर्विरोध को नहीं समझ पा रहे- अगर उच्च पद पर एक राजा है और उसके आस पास कई राजकुमार हैं तो वह किस प्रजातंत्र की बात कर रहे हैं? शायद वह पंचायत में प्रजातंत्र की बात कर रहे हैं। राहुल को तब गम्भीरता से लिया जाएगा अगर वह राजनीतिक उत्तराधिकार को स्वेच्छा से छोड़ दें और भारत में राजनीति को सुधारने के लिए उत्साहपूर्ण तरीके से काम करें। उनको सुनने के बाद ऐसा लगता है कि वह अच्छे इंसान हैं जिसके पास सीमित प्रतिभा और मशहूर नाम है। उनको ज़रुरत है कि वह एक सही पेशे की खोज करें।

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