जानिए, राफेल डील पर अरुण शौरी, प्रशांत भूषण और अटॉर्नी जनरल ने क्या-क्या दी दलीलें
नई दिल्ली। राफेल डील को लेकर याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल की गई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है। राफेल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह, बीजेपी नेता अरुण शौरी और वरिष्ठ वकील एम एल शर्मा ने ने याचिका दाखिल की थी। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस के कौल और जस्टिस के एम जोसेफ की तीन सदस्यी पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। इस मामले में अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल सरकार का पक्ष रख रहे हैं।

मोदी सरकार ने मेक इन इंडिया को किनारे कर दिया गया
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने राफेल डील के मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी की ओर से पैरवी करते हुए तीन-सदस्यीय पीठ को बताया कि सिर्फ तीन परिस्थितियों में अंतर-सरकार मार्ग अपनाया जा सकता है। भूषण ने कहा कि पहले इस डील में 108 विमान भारत में बनाने की बात की जा रही थी। 25 मार्च 2015 को डसॉल्ट और एचएएल में करार हुआ और दोनों ने कहा कि 95 फीसदी बात हो गई है। लेकिन 15 दिन बाद ही प्रधानमंत्री के दौरे के दौरान नई डील सामने आई, जिसमें 36 राफेल विमानों के लिए कॉन्ट्रैक्ट हुआ और मेक इन इंडिया को किनारे कर दिया गया।

विमान सौदा आरटीआई के दायरे में आता है
प्रशांत भूषण ने कहा कि, सरकार कह रही है कि उन्हें ऑफसेट पार्टनर का पता नहीं है। लेकिन प्रोसेस में साफ है कि बिना रक्षा मंत्री की अनुमति के ऑफसैट तय नहीं हो सकता है। ऑफसेट बदलने के लिए सरकार ने नियमों को बदला गया और तुरंत लागू किया गया। सरकार पहले ही दो बार देश की सुरक्षा को ताक पर रख चुकी है, क्योंकि वह दो बार संसद में राफेल के दाम बता चुकी है। भूषण ने कहा कि, डसॉल्ट ने रिलायंस ग्रुप के 240 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे हैं। भूषम ने कहा कि, विमान सौदा आरटीआई के दायरे में आता है। भूषण ने सवाल करते हुए कहा कि इस डील के लिए रिलायंस को ही क्यों चुना गया? उनके पास तो जमीन भी नहीं थी, रिलायंस फॉर्मूला का ही पार्ट थी? इसीलिए 17 दिन के भीतर रिलायंस को जमीन, डिफेंस मैन्यूफेक्चरिंग का लाइसेंस दे दिया गया? प्रशांत भूषण ने कहा कि राफेल डील भ्रष्टाचार का मामला है।अब इस मामले में भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत केस दर्ज होना चाहिए।

पूर्व रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर को राफेल डील के बारे में पता नहीं था
अरुण शौरी ने सु्प्रीम कोर्ट में कहा, पूर्व रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर को राफेल डील के बारे में पता नहीं था। उन्होंने कहा था कि यह पीएम मोदी का फैसला है मैं इसका समर्थन करता हूं, किसी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। शौरी ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि हमें इस मामले में विमानों कि कीमत से आगे जाना चाहिए क्योंकि यह देश की सुरक्षा के साथ समझौता है क्योंकि एयरक्राफ्ट की संख्या घटा दी गई है। अरुण शौरी ने कहा कि ऑफसेट की गाइडलाइंस को बाद में बदला गया। उन्होंने आरोप लगाया कि डसॉल्ट भी इस समय फाइनेंशियल क्राइसेस से जूझ रहा है, यही कारण है कि उन्होंने सरकार की हर बात मानी और रिलायंस के साथ करार किया।

न्यायिक समीक्षा के तहत कीमतों का खुलासा नहीं किया जा सकता है
वहीं इस मामले पर सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि यह एक रक्षा खरीद हैं, राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है। इसलिए न्यायिक समीक्षा के तहत कीमतों का खुलासा नहीं किया जा सकता है। इस पर सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा, राफेल डील से जुड़ी कीमतों पर कोई भी बहस केवल तभी होगी, जब कोर्ट तय करेगा कि तथ्य सार्वजनिक होने चाहिए। वही इस मामले में अन्य एक याचिकाकर्ता वकील एमएल शर्मा ने कोर्ट से कहा कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा फाइल की गई रिपोर्ट से पता चलता है कि मई, 2015 के बाद फैसला किए जाते वक्त गंभीर फ्रॉड किया गया है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि मामले की सुनवाई पांच-सदस्यीय पीठ से कराई जाए।
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