नजरिया: इन सवालों के जवाब के लिए झूठ के आडंबर से निकलने की जरूरत

भारत ने UNHRC में जो जवाब दिया वो हकीकत से कहीं मेल नहीं खाती। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात रखने के लिए हमारा देश कब तक सिर्फ लिखित भाषणों और झूठ का सहारा लेगा? पढ़ें विश्लेषण।

अगर हम कभी भारतीय संविधान की उद्देशिका से गुजरें तो हमें पता चलेगा कि भारत एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य है।

थोड़ा और आगे बढ़ेंगे तो इसी उद्देशिका में भारत के समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त है।

उद्देशिका सिर्फ 'शोभात्मक आभूषण'

बावजूद इसके कि कई बार भारत के संविधान की उद्देशिका को सिर्फ 'शोभात्मक आभूषण' का नाम दिया जाता है, हमारे देश में कक्षा पहली से लेकर और जब तक किसी की पढ़ाई जारी रहती है, उसकी सरकारी किताब में ये पहले पन्ने पर छपा होता है।

एक लोकतांत्रिक देश में जब यह कहना फैशन हो चला हो कि सभी को कम से कम 1 साल सेना की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए वहां ये उम्मीद करना तो बेमानी है कि सभी को यह उद्देशिका याद भी होगी। फिर भी क्या हम उद्देशिका के बताए रास्ते से थोड़ा भी चल रहे हैं?

मीडिया के इस योगी - मोदी - ममता - राहुल - केजरीवाल दौर में

मीडिया के इस योगी - मोदी - ममता - राहुल - केजरीवाल वाले समय में बहुत सी खबरें हमसे छूट जाती हैं। एक ऐसी ही खबर आज के करीब 4 दिन पहले आई थी। अपनी हर बुराई को छिपाने के लिए सेना को हथियार बना चुके इस 125 करोड़ की आबादी वाले मुल्क से संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की यूनिवर्सल पिरियोडिक रिव्यू में तमाम दूसरे मुल्कों ने सवाल पूछे।

जो कुछ सवाल पूछे और सलाहें दी गई, अगर वो पाकिस्तान की ओर से आई होती तो हम उसे खारिज कर देते लेकिन सवाल ऐसे देशों से आए हैं, जो हमारे पड़ोसी नहीं है। ना ही शत्रु राष्ट्र। ऐसे में इन सवालों को दिल-ओ-दिमाग में वाजिब जगह दिए जाने की जरूरत है।

सिर्फ भाषण पढ़ने से बदल जाएगी हकीकत?

हर बार की तरह इस बार भी भारत UNHRC में जवाब देकर आया है लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि किसी सरकारी अफसर की ओर से लिखे गए भाषण को पढ़ देने मात्र से हकीकत नहीं बदल जाएगी। जिस देश में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, तमाम केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और अपने-अपने दलों के हिमायती लोग हर भाषण में 'गांव,गरीब, किसान,मजदूर,शोषित,पीड़ित और वंचित' सरीखे छोटे लेकिन बड़े शब्दों का उपयोग करते हों उस मुल्क से दलित, अल्पसंख्यक और महिलाओं के शोषण पर सवाल पूछा जाए, क्या ये शर्मिंदगी की बात नहीं है?

ये देश ना तो हमारे पड़ोसी, ना शत्रु

ये देश ना तो हमारे पड़ोसी, ना शत्रु

लेबनान ने हमसे कहा कि हम धार्मिक आजादी की रक्षा करने की गारंटी दें और तस्करी पर लगाम लगाएं। लिथुआनिया ने कहा कि हमें मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की सुरक्षा करनी चाहिए। साथ ही यह भी अपील की कि पत्रकारों और कार्यकर्ताओं पर होने वाले हमलों की जांच कराई जाए। लातविया ने हमसे महिलाओं के खिलाफ हिंसा को खत्म करने की अपील की तो कीनिया ने कहा कहा कि अल्पसंख्यकों, महिलाओं के खिलाफ की जाने वाली हिंसा और भेदभाव के खिलाफ कदम उठाए जाएं।

ये वो देश हैं, जिनके नाम आपको शायद पता हों। अगर पता हैं, तो आपको इनकी आबादी, क्षेत्रफल और बाकी चीजों की जानकारी भी होगी। नहीं है! तो गूगल करिए और देखिए कि इनमें कोई भी मुल्क हमारा पड़ोसी नहीं है। हम उस देश में अपना जीवन गुजार रहे हैं, जहां एक राजनीतिक दल के लिए देश के कुछ हिस्से में गाय मां होती है, बाकी में बीफ। हम उस देश के बाशिंदे हैं, जिसके एक राज्य का मुख्यमंत्री गाय मारने पर मार के लटका देने की बात तक कह देता है।

संभवतः ऐसे पहले पीएम बन जाएंगे मोदी!

संभवतः ऐसे पहले पीएम बन जाएंगे मोदी!

इटली ने इसी रिव्यू में हमसे अपील की कि फांसी की सज़ा ख़त्म की जाए और धार्मिक हमलों के पीड़ितों को न्याय दिलाया जाए। इराक ने भारत से अपील की कि मानवाधिकार को बढ़ावा देने साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में बजट बढ़ाया जाए। जहां तक मेरी जानकारी है कि इटली और इराक से तो हमारे संबंध खराब नहीं ही हैं।

फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संभवतः देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री बनने वाले हैं जिनके शासनकाल में नेट की परीक्षा इस बार जून में नहीं होने की आशंका है। हालांकि इसी रिव्यू मीटिंग में अमेरिका, नेपाल ,बांग्लादेश, सरीखें मुल्कों ने हमें सराहा भी। पाकिस्तान ने कश्मीर में पैलेट गन का मुद्दा उठाया। खैर, पाकिस्तान को तो आप अपनी सेना की ताकत दिखाकर खारिज कर सकते हैं।

इन सारे सवालों, सलाहों और अपीलों के बाद भारत की ओर से भी जवाब दिया गया।

रोहतगी ने दिया ये जवाब

रोहतगी ने दिया ये जवाब

भारत की ओर से जवाब देने के लिए UNHRC में मौजूद अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है जिसमें राज्य का कोई धर्म नहीं है, भारतीय संविधान हर व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। रोहतगी ने कहा कि हमारे लोग अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता के प्रति जागरूक हैं और हर अवसर पर अपने विकल्पों का इस्तेमाल करते हैं। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने वाले रोहतगी, ने कहा कि भारत एक नागरिक की जाति, पंथ, रंग या धर्म के बीच कोई भेद नहीं करता। उन्होंने यह भी कहा था कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना भारत की नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

संसद में जय श्री राम के नारे!

संसद में जय श्री राम के नारे!

भारत की ओर से दिए गए जवाबों में संविधान का खूब हवाला दिया गया है। यहां तक कहा गया है कि हमारे लोग बहुत ही जागरुक हैं। भारत की ओर से दिए जवाब में एक तरह का फरेब और जमीनी हकीकत का अभाव दिखता है। एक ओर तो हम कह रहे हैं कि किसी जाति, पंथ, रंग या धर्म के बीच कोई भेद नहीं करते दूसरी ओर हमारे ही देश में गाय लेकर जा रहे लोगों पर हमला हो जाता है। कथित गोरक्षक उन अल्पसंख्यकों को मार देते हैं जिनके अधिकारों की रक्षा करना भारत की नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हमारे ही देश की संसद, जिसे हम लोकतंत्र का मंदिर कहते हैं वहां जय श्री राम के नारे लगाए जाते हैं। जिस शिक्षा पर इराक ने सवाल उठाए हैं, उसी शिक्षा को निजी हाथों में बेचने की तैयारी की जा रही है। रही बात महिलाओं के सुरक्षा की तो हमारे यहां के पुरुषों में संस्कार इतने ज्यादा भरे हुए हैं तमाम कानूनी संस्थाएं कहती हैं कि अगर हम शादी में बलात्कार की बात करेंगे तो हमारी वैवाहिक संस्था पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। इस रिव्यू में स्पेन ने शादी में बलात्कार को अपराध की श्रेणी में रखने की अपील की थी।

अगर हम सही होते तो नहीं होता सहारनपुर कांड!

अगर हम सही होते तो नहीं होता सहारनपुर कांड!

इतना ही नहीं इस मसले को रफा-दफा करने के लिए यूपीए-2 ने धारा 376 बी को कानून बना दिया, जो पति द्वारा जबरन शारीरिक संबंध बनाने को केवल उस परिस्थिति में अपराध मानती है जिसमें पत्नी, पति से अलग रह रही हो। आखिर कब तक हम हकीकत से दूर, सिर्फ अफसरों के लिखे भाषण पढ़ कर दुनिया में अपनी झूठी शान का डंका बजाते रहेंगे। हम वो लोग हैं जो अपनी कथित संस्कृति को बचाने के लिए समलैंगिक रिश्तों को अपराध बना दिया।

इस रिव्यू में भारत ने तमाम मुल्कों की सलाहों, सवालों और अपीलों पर जो भी जवाब दिए हैं, वो भी संविधान के बल बूते वो सिर्फ भाषणों में अच्छे लगते हैं। अगर हम इतने ही अच्छे होते तो जब मुकुल रोहतगी अपना राष्ट्रवाद और देश प्रेम से भरा भाषण UNHRC में पढ़ चुके थे, उसके अगले दिन सहारनपुर कांड तो नहीं ही होता? आपका सांसद, जो नीति नियंता है वो किसी एसएसपी के बंगले पर जाकर भीड़ के साथ तोड़ फोड़ तो नहीं ही करता। ना तो दलितों के घर जलाए जाते। ना एक शख्स की मौत होती।

तो बिलकीस बानाे को कब का मिल जाता न्याय

तो बिलकीस बानाे को कब का मिल जाता न्याय

अगर हम अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए इतने ही सजग होते तो बिलकीस बानो को न्याय के लिए दर-दर की ठोकर नहीं खा रही होती। अगर हम एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र वाकई होते तो प्रधानमंत्री पद पर बैठा अपनी पार्टी का स्टार प्रचारक बन जाने पर श्मशान, कब्रिस्तान, ईद और दिवाली पर राजनीति नहीं ही करता। हमारी कथित भीड़ एक सांसद को मौत के घाट उतार देती है। उसकी पत्नी आज भी अदालतों में न्याय की दरकार लिए चौखट पर है लेकिन हम उसकी नहीं सुन रहे।

सिर्फ सरकार के लिए नहीं है सवाल

सिर्फ सरकार के लिए नहीं है सवाल

बुलंदशहर के हाईवे की घटना को उत्तर प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकार में मंत्री रहे आजम खान सरीखा शख्स उसे राजनीति से प्रेरित तो नहीं ही बताता। ना ही तमाम दलों के नेता दंगों के रास्ते अपनी चुनावी जीत का रास्ता अख्तियार करते। जिन सवालों, सुझावों और अपीलों का सामना UNHRC की जेनेवा बैठक में भारत ने किया। जिसका जवाब मुकुल रोहतगी ने दिया, दरअसल वो हम सभी के लिए है।

ये सवाल, सुझाव और अपीलें सिर्फ किसी सरकार तक सीमित नहीं हैं बल्कि इनका जवाब देने की नैतिक जिम्मेदारी हम सभी 125 करोड़ देशवासियों पर है, जिसमें हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, तमाम केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और तमाम दलों के लोग भी शामिल है। जरूरत है कि हम इन सवालों को झूठ के आडंबर से ढंकने की कोशिश ना करते हुए जमीन पर भी उस जवाब का पूरा हिस्सा लागू करें जो मुकुल रोहतगी ने UNHRC में दिया है।

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