पंजाब विधानसभा चुनाव 2017: आखिर दिल्ली छोड़कर पंजाब क्यों नहीं जा सकते अरविंद केजरीवाल?

आप संयोजक अरविंद केजरीवाल ने 14 फरवरी 2015 को दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उन्होंने वादा किया इस बार वह दिल्ली की जनता को अचानक छोड़कर नहीं जाएंगे। ऐसे में क्या वो अपना वादा तोड़ेंगे?

नई दिल्ली। पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर आम आदमी पार्टी प्रचार अभियान में जुटी हुई है। इसी दौरान दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के उस बयान ने सियासी गलियारे में हलचल मचा दी जिसमें उन्होंने इशारा किया था कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पंजाब में चुनाव लड़ सकते हैं और वो पंजाब के सीएम होंगे। इस बयान के सामने आते ही सवाल उठने लगे कि क्या अरविंद केजरीवाल दिल्ली छोड़कर अब पंजाब जाएंगे?

kejriwalदिल्ली छोड़कर पंजाब नहीं जा सकते केजरीवाल, ये है असल वजह...

सवाल इसलिए भी उठे क्योंकि ये बातें आम आदमी पार्टी के बड़े नेता और दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कही थी।दिल्ली के डिप्टी सीएम के बयान के अगले ही दिन खुद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सामने आए। उन्होंने ऐसे किसी भी फैसले से साफ इंकार करते हुए कहा कि वो दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं और दिल्ली में ही काम करेंगे। उनकी इस सफाई के पीछे अहम वजह ये है कि वो दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं और अपने कार्यकाल के दौरान अगर वो किसी और राज्य में सीएम के पद पर नजर रखेंगे तो इससे उनकी साख पर सवाल उठेंगे। इन वजहों से दिल्ली के सीएम का पद नहीं छोड़ सकते हैं अरविंद केजरीवाल...

अरविंद केजरीवाल की साख का है सवाल

अरविंद केजरीवाल की साख का है सवाल

आम आदमी पार्टी दिल्ली में अपनी पकड़ बनाने को लेकर अभी शुरुआती स्थिति में है, दिल्ली के लोगों ने अरविंद केजरीवाल पर विश्वास करके उन्हें सरकार बनाने में समर्थन किया। लोगों को उम्मीद है कि आम आदमी पार्टी दिल्ली में साफ सरकार देगी। इससे पहले केजरीवाल के नेतृत्व में बनी पहली सरकार ने महज 47 दिनों में ही इस्तीफा दे दिया था। 2013 में दिल्ली विधानसभा में लोकपाल बिल पेश नहीं कर पाने की वजह से उन्होंने ये कदम उठाया। 2013 में अरविंद केजरीवाल के दिल्ली सत्ता छोड़ने के फैसले के बाद दिल्ली की जनता को जोरदार झटका लगा था। दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लग गया। लोगों को लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है, उनकी चुनी हुई सरकार कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं कर सकती है।

2013 में छोड़ चुके हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री का पद

2013 में छोड़ चुके हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री का पद

अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को इस फैसले के बाद अहसास हुआ कि उन्होंने बड़ी गलती की है। उन्होंने तुरंत ही अपनी प्रतिष्ठा को फिर से हासिल करने की कोशिश में जुट गई। इस बीच आम आदमी पार्टी लोकसभा चुनाव में भी 400 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए, जिनमें 4 सीटों पर उन्हें जीत हासिल हुई। हालांकि आप को दिल्ली की सभी सात लोकसभा सीटों पर बीजेपी से हार का सामना करना पड़ा। जनता का ये फैसला केजरीवाल के लिए किसी झटके से कम नहीं था, उन्हें ऐसी हार की उम्मीद नहीं थी। लोकसभा चुनाव के बाद आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल को समझ आया कि उनकी पार्टी के पास अवसर है, वो दिल्ली में एक बार फिर से खड़े हो सकते हैं। अल्पमत वाली सरकार गिरने के महज एक साल बाद ही दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी फिर से मैदान में उतरी। इस बार आम आदमी पार्टी को भारी जनादेश मिला।

AAP के प्रति बना जनता का विश्वास बने रहना जरूरी

AAP के प्रति बना जनता का विश्वास बने रहना जरूरी

पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने 14 फरवरी 2015 को दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उन्होंने वादा किया इस बार वह दिल्ली की जनता को अचानक छोड़कर नहीं जाएंगे। उन्होंने सबके सामने पद छोड़ने की अपनी पिछली गलती को स्वीकार किया, जिसकी वजह से दिल्ली के मतदाताओं ने उनका समर्थन किया और उन्हें दिल्ली विधानसभा चुनाव में शानदार जीत दिलाई। एक नेता के तौर पर अरविंद केजरीवाल की प्रतिष्ठा दिल्ली के नागरिकों की प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर निर्भर करता है। पंजाब चुनाव में वो भले ही आम आदमी पार्टी के लिए कितने फायदेमंद हों इससे कोई मतलब नहीं है, अगर वो दिल्ली छोड़कर पंजाब जाते हैं तो वो अपना ही नुकसान करेंगे। उन नागरिकों को केजरीवाल के इस फैसले से झटका लगेगा जिन्होंने उन्हें अलग राजनीति के तौर पर चुना था।

केजरीवाल के लिए दिल्ली का सीएम बने रहना इसलिए भी है जरूरी

केजरीवाल के लिए दिल्ली का सीएम बने रहना इसलिए भी है जरूरी

अगर अरविंद केजरीवाल चाहते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर जनता का आम आदमी पार्टी पर भरोसा बरकरार रहे इसके लिए अरविंद केजरीवाल दिल्ली के सीएम बने रहें। उनकी पार्टी भले ही दूसरे राज्यों में चुनाव में उतरे और ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच अपनी पहुंच बनाने की कोशिश करे, लेकिन केजरीवाल खुद दिल्ली में डटे रहें। ये उनकी व्यक्तिगत पहचान के लिए बेहद जरूरी है। इसके साथ-साथ एक और महत्वपूर्ण पहलू केजरीवाल के दिल्ली के मुख्यमंत्री बने रहने की ये भी है कि वो यहां सीधे केंद्र सरकार के किसी फैसले के खिलाफ विरोध दाखिल कर सकते हैं। राजधानी दिल्ली में उनके फैसलों का असर देश की जनता पर दिखाई देता है, लोग उनके फैसलों पर नजर रखते हैं।

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