क्या प्रगतिशील कहलाने की शर्त देशद्रोह है?

पटना (मुकुन्द सिंह)। जेएनयू प्रकरण में हुई गिरफ्तारी व सियासत ने यह कहने पर मज़बूर कर दिया है कि क्या प्रगतिशील कहलाने की शर्त देशद्रोह है। जिस अफज़ल गुरु को ये नासमझ लोग शहीद व हीरो बता रहे हैं शायद इन्हें नहीं पता कि देश के कानून व संविधान ने अफज़ल गुरु को फांसी की सजा सुनाई थी। हमला संसद पर हुआ था, हमला सीधे सीधे देश के संविधान पर हुआ। संसद में बैठे लोगों से आपका वैचारिक मतभेद हो सकता है। तो क्या इसका रास्ता देशद्रोह है।

Progressive is equal to anti-nationalism?
भारत कितना सहिष्णु है इसका अंदाज़ा आप इससे लगा सकते हैं कि अफज़ल गुरु के खिलाफ तमाम प्रमाण होने के बाद भी कभी उनके परिजनों को प्रताड़ित नहीं किया गया। अफज़ल गुरु के बेटे की पढाई में कभी बाधा नहीं पहुंची। उसने मैट्रिक की परीक्षा में उत्तीर्ण कर अपने परिवार का मान रखा। वो आईएएस बनना चाहता है। जब अफज़ल गुरु के बेटे को देश के संविधान पर भरोसा है इन्हें पेट में इतना दर्द क्यों हो रहा है। आप देश द्रोह का नारा लगाते हैं, कश्मीर की आज़ादी की मांग करते है।
JNU
असहिष्णुता के नाम पर आप हर दिन किसी न किसी राज्य को स्वतंत्र करने की बात करते रहे। क्या सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इसलिए देश को एक सूत्र में बांधा था कि आप सहिष्णुता बनाम अहिष्णुता के नाम पर देश की अखंडता के विरोधी हो जाएँ। थूं है ऐसे नेताओं पर जो देशद्रोहियों को निर्दोष साबित करने में जुटी है। मैं तो कहता हूं देश के संविधान में संसोधन करके ऐसे तमाम लोगों को फांसी पर चढ़ा देना चाहिए जो देशद्रोह में लिप्त है।
JNU protest

आखिर किस विचारधारा के बारूद पर खड़ी है जेएनयू

कन्हैया व खालिद तो नाम है, विचारधारा तो वामपंथ है कन्हैया व खालिद के अलावे पुलिस को अन्य आरोपियों की तलाश है जिन्होंने पिछले दिनों जेएनयू कैंपस में देश विरोधी नारे लगाये। दरअसल वैचारिक दोहरापन और राष्ट्रविरोधी उन्माद वो दो पैर हैं, जिन पर जेएनयू का वामपंथ खड़ा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ये आतंकियों-अलगाववादियों को सेमिनार में बुलाएंगे, उनकी शहादत मनाएंगे, लेकिन इंदिरा गांधी, एपीजे अब्दुल कलाम, व वीर सपूतों को लेकर इनके पेट में मरोड़ उठने लगती है।

Progressive is equal to anti-nationalism?
पहले मॉस्को में बारिश होने पर भारत में छाता खोल लेनेवाले ये अद्भुत वामपंथियों ने बाद के दौर में चीन की तरफ बड़ी आस लगायी। अब इनका लख्ते-जिगर कोई और है।वहीँ के एक सीनियर छात्र ने बताया कि जेएनयू में आतंकियों और अलगाववादियों का महिमामंडन और ‘भारत मुर्दाबाद' के कार्यक्रम नए नहीं हैं। देशविरोधी और वामपंथी गठजोड़ दशकों से ऐसे ही अभियान चलाता रहा है। दरअसल, राष्ट्रद्रोह और अलगाववाद वामपंथ (कम-अज़-कम भारतीय) की वह रक्तशिरा है, जिसे काट देने पर यह खुद ब खुद दम तोड़ देगा।

जेएनयू तो इस विषबेल की एक शाखा मात्र है। जिस शोषित-दलित की बात ये दिन भर करते हैं, उन झूठे क्रांतिवीरों को खुद जेएनयू के ढाबों पर काम कर रहे बाल-मज़दूर नहीं दिखते।जेएनयू के क्रांतिवीर सीरिया से लेकर फिलिस्तीन तक के मसलों पर आग उगल देंगे, लेकिन अपने ही घर में लगी आग को देखने तक से इंकार कर देंगे।

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