क्या प्रगतिशील कहलाने की शर्त देशद्रोह है?
पटना (मुकुन्द सिंह)। जेएनयू प्रकरण में हुई गिरफ्तारी व सियासत ने यह कहने पर मज़बूर कर दिया है कि क्या प्रगतिशील कहलाने की शर्त देशद्रोह है। जिस अफज़ल गुरु को ये नासमझ लोग शहीद व हीरो बता रहे हैं शायद इन्हें नहीं पता कि देश के कानून व संविधान ने अफज़ल गुरु को फांसी की सजा सुनाई थी। हमला संसद पर हुआ था, हमला सीधे सीधे देश के संविधान पर हुआ। संसद में बैठे लोगों से आपका वैचारिक मतभेद हो सकता है। तो क्या इसका रास्ता देशद्रोह है।



आखिर किस विचारधारा के बारूद पर खड़ी है जेएनयू
कन्हैया व खालिद तो नाम है, विचारधारा तो वामपंथ है कन्हैया व खालिद के अलावे पुलिस को अन्य आरोपियों की तलाश है जिन्होंने पिछले दिनों जेएनयू कैंपस में देश विरोधी नारे लगाये। दरअसल वैचारिक दोहरापन और राष्ट्रविरोधी उन्माद वो दो पैर हैं, जिन पर जेएनयू का वामपंथ खड़ा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ये आतंकियों-अलगाववादियों को सेमिनार में बुलाएंगे, उनकी शहादत मनाएंगे, लेकिन इंदिरा गांधी, एपीजे अब्दुल कलाम, व वीर सपूतों को लेकर इनके पेट में मरोड़ उठने लगती है।

जेएनयू तो इस विषबेल की एक शाखा मात्र है। जिस शोषित-दलित की बात ये दिन भर करते हैं, उन झूठे क्रांतिवीरों को खुद जेएनयू के ढाबों पर काम कर रहे बाल-मज़दूर नहीं दिखते।जेएनयू के क्रांतिवीर सीरिया से लेकर फिलिस्तीन तक के मसलों पर आग उगल देंगे, लेकिन अपने ही घर में लगी आग को देखने तक से इंकार कर देंगे।












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