कोरोना महामारी में गिद्ध बन गये हैं मुनाफाखोर, क्यों नहीं लागू होती हेल्थ इमरजेंसी ?

नई दिल्ली, अप्रैल 28: सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि कोरोना के कारण अभी देश में नेशनल इमरजेंसी जैसे हालत हैं। इस बीमारी से रोज मरने वालों का आंकड़ा तीन हजार के पार हो गया है। चारो तरफ चीख-पुकार मची है। लोग त्राहिमाम कर रहे हैं और अस्पताल संसाधनों की कमी का दुखड़ा अलाप रहे हैं। ऑक्सीजन और रेमडेसिविर की कालाबाजारी हो रही है। स्थिति नियंत्रण से बाहर होती जी रही है। न्यायालय सरकार के कामकाज पर लगातार असंतोष जता रहे हैं। ऐसी स्थिति में व्यस्था को पटरी पर लाने के लिए देश में हेल्थ इमरजेंसी क्यों नहीं लागू की जाती ? इस साल जनवरी में जब आस्ट्रेलिया और जापान में कोरोना की दूसरी लहर फूटी थी तब वहां हेल्थ इमरजेंसी लागू कर हालात पर काबू पाया गया था। पिछले साल नवम्बर में जब दिल्ली और उसके आसपास की हवा जहरीली हो गयी तब दिल्ली एनसीआर में हेल्थ इमरजेंसी लागू की गयी थी। अब जब कि पूरे देश में कोरोना की दूसरी लहर से हाहाकार मचा हुआ है तब क्यों नहीं कठोर फैसले लिये जा रहे ?

गिद्ध बन गये हैं मुनाफाखोर

गिद्ध बन गये हैं मुनाफाखोर

दिल्ली में दो-दो सरकारें बैठी हैं। उनकी नाक के नीचे ऑक्सीजन की कालाबाजारी हो रही है। 10 लीटर के ऑक्सीजन सिलेंडर की कीमत आठ सौ रुपये है। लेकिन वह दिल्ली में कहीं 8 हजार में बिक रही है तो कहीं साढ़े आठ हजार तक वसूले जा रहे हैं। जो सिलेंडर दो सौ रुपये में रिफील हो रहा था अब उसके लिए पंद्रह सौ रुपये देने पड़ रहे हैं। जिस ऑक्सीजन सिलेंडर का दाम 4200 रुपये था वह 15 हजार रुपये में बिक रहा। जिस मरीज की जैसी जरूरत उससे वैसी कीमत वसूली जा रही है। यहां लोगों की जान जा रही और मुनाफाखोर गिद्ध की तरह उन्हें नोच रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने आक्सीजन की कालाबाजारी पर कहा था कि यह समय गिद्धों की तरह बर्ताव करने का नहीं है। अगर ऐसे राक्षस कानून की भाषा नहीं समझें तो क्या किया जाना चाहिए ? कभी-कभी व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए निरंकुश होना पड़ता है। पिछले साल कोरोना को नियंत्रित करने के लिए फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों ने तो नेशनल इमरजेंसी घोषित कर दी थी। भारत में 1975 की इमरजेंसी देखने वालों लोगों का कहना है कि उस दौर में कानून का ऐसा खौफ था कि रिश्वतखोरी और कालाबाजारी बिल्कुल खत्म हो गयी थी। कोरोना संकट के दौर में आक्सीजन और रेमडेसिविर के कालाबाजारियों के साथ क्या निरंकुशता नहीं दिखायी जानी चाहिए ?

जान बचाने के लिए कैसे बिलख रहे लोग ?

जान बचाने के लिए कैसे बिलख रहे लोग ?

उत्तर प्रदेश के आगरा में एक दम्पति कोरोना संक्रमित हो गये। पत्नी की स्थिति थोड़ी ठीक थी लेकिन पति के इलाज के लिए ऑक्सीजन जरूरी था। बिना ऑक्सीजन उसकी जान बचनी मुश्किल थी। इस दम्पति के परिजन आगरा में इस अस्पताल से उस अस्पताल दौड़ते रहे लेकिन कहीं ऑक्सीजन सिलेंडर नहीं मिला। तब हताश महिला ने अपने भाई को फोन कर सारी बात बतायी। उसका भाई पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के गजघंटा गांव में रहता था। उसने हुगली के चुंचुड़ा स्थिति अजंता सेवा सदन अस्पताल में अपनी बहन और बहनोई के इलाज कराने के बारे में डॉक्टरों से राय ली। जब डॉक्टरों ने कहा कि यहां आने पर ऑक्सीजन के साथ इलाज की व्यवस्था हो जाएगी तो उसने अपनी बहन और बहनोई को जल्द हावड़ा आने की सूचना दी। महिला ने आगरा मे एक एम्बुलेंस वाले से बात की। उसने हावड़ा जाने के लिए 60 हजार रुपये मांगे। 60 हजार रुपये खर्च कर महिला अपने बीमार पति के साथ हावड़ा आ गयी। उसे अजंता सेवा सदन अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज के बाद अब पत्नी-पत्नी की हालत में सुधार है। कितनी भयावह स्थिति है कि एक बीमार दम्पत्ति को ऑक्सीजन के लिए 60 हजार रुपये खर्च कर आगरा से हावड़ा आना पड़ा।

सरकारों को कोर्ट की फटकार

सरकारों को कोर्ट की फटकार

दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार में ऑक्सीजन आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। यानी सरकारीतंत्र इस मामले में अक्षम साबित हो रहा है। बिहार में अगर किसी अस्पताल को ऑक्सीजन नहीं मिल रहा तो उसे सीधे पटना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास शिकायत करने के लिए कहा गया है। बिहार के कोविड अस्पतालों को प्रतिदिन हाईकोर्ट को बताना है कि दवा, ऑक्सीजन और बेड की क्या स्थिति है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार के तौरतरीकों पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि कोरोना का भूत गलियों और सड़कों पर दिनरात मार्च कर रहा है और राज्य सरकार जरूरतमंदों का ऑक्सीजन नहीं दे पा रही है। लोगों का जीवन भाग्य भरोसे है। ऑक्सीजन संकट पर सुप्रीम कोर्ट स्वत: संज्ञान ले चुका है। उसने केंद्र सरकार से पूछा है कि मौजूदा संकट से उबरने के लिए क्या कार्ययोजना बनायी गयी है ? केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार अगर वे अपना काम बखूबी करती तो कोर्ट को दखल देने के जरूरत ही नहीं पड़ती।

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