लोकसभा चुनाव 2019- सुपौल लोकसभा सीट के बारे में जानिए
नई दिल्ली: बिहार की सुपौल लोकसभा सीट के इस वक्त कांग्रेस पार्टी की नेता रंजीत रंजन सांसद हैं। उन्होंने से सीट साल 2014 में JDU नेता दिलेश्वर कमैत को 59 हजार 672 वोटों से हराकर अपने नाम की थी। सांस्कृतिक रूप से काफी समृद्ध सुपौल, सहरसा जिले से 14 मार्च 1991 में विभाजित होकर अस्तित्व में आया था, लोकगायिका शारदा सिन्हा और स्व. पंडित ललित नारायण मिश्र की धरती के नाम से मशहूर सुपौल में धान,गेहूं,मूंग,पटसन आदि की पैदावार बहुत अच्छी होती है, कुल मिलाकर यहां आय का मुख्य साधन कृषि ही है, सुपौल प्राचीन काल में मिथिला राज्य का हिस्सा था। बाद में मगध और मुगल सम्राटों ने भी यहां राज किया। ब्रिटिश काल में सुपौल के प्रशासनिक और सामरिक महत्व देखते हुए 1870 में इसे अनुमंडल का दर्जा दिया गया था।

सुपौल लोकसभा सीट का इतिहास
भारतीय निर्वाचन आयोग की ओर से क्षेत्रों के विच्छेदीकरण के दौरान सुपौल लोकसभा सीट वर्ष 2009 में स्वतंत्र रूप से वजूद में आई। इससे पहले सहरसा जिला भी सुपौल लोकसभा क्षेत्र में शामिल था, जो नए परिसीमन के बाद मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा बन गया, इस लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत इस जिले के पांच और मधेपुरा जिले के एक विधानसभा क्षेत्र आता है, जिनके नाम हैं निर्मली, पिपरा, सुपौल, त्रिवेणीगंज अजा, छातापुर और मधेपुरा जिले का सिंहेश्वर अजा।
साल 2009 के पहले आम चुनाव में यहां पर JDU नेता विश्वा मोहन कुमार ने जीत दर्ज की थी लेकिन साल 2014 में ये सीट कांग्रेस के पास चली गई और रंजीत रंजन यहां से सांसद बनीं, बताते चलें कि रंजीत रंजन पप्पू यादव की पत्नी हैं, साल 2014 के चुनाव में रंजीत रंजन को 3 लाख 32 हजार 925 वोट मिले थे तो वहीं दूसरे नंबर पर रहे जेडीयू नेता कमैत को 2 लाख 73 हजार 255 वोटों पर ही संतोष करना पड़ना। इस सीट पर उस साल नंबर 2 पर JDU और नंबर 3 पर भाजपा थी।
रंजीत रंजन का लोकसभा में कार्यकाल
बिहार के दबंग सांसद पप्पू यादव से प्रेम विवाह करने वाली रंजीत रंजन की पिछले 5 सालों के दौरान लोकसभा में उपस्थिति 89 प्रतिशत रही है तो वहीं इन्होंने 87 डिबेट में हिस्सा लिया और 263 प्रश्न पूछे हैं। आपको बता दें कि ये रिकार्ड दिसंबर 2018 तक का है। साल 2014 में इस सीट पर मतदाताओं की संख्या 15 लाख 25 हजार 592 थीं, जिसमें से मात्र 9 लाख 70 हजार 528 लोगों ने अपने मतों का प्रयोग किया जिसमें पुरुषों की संख्या 4 लाख 68 हजार 183 थी तो वहीं महिलाओं की संख्या 5 लाख 2 हजार 345 रही।
सुपौल में कांग्रेस हमेशा से मैथिली ब्राह्मणों की पसंदीदा पार्टी रही है। उसे पूर्व केंद्रीय मंत्री ललित नारायण मिश्र और डॉ. जगन्नाथ मिश्र की छवि का लाभ मिलता रहा है, हालांकि यहां कहा जाता रहा है कि यादव और मैथिली ब्राह्मणों का साथ नहीं होता है लेकिन रंजीत रंजन की जीत ने इस मिथक को तोड़ दिया है। वैसे सुपौल और आसपास के इलाके में 'पचपनिया' के नाम से पहचान रखने वाली अतिपिछडी जातियों की ताकतवर लॉबी भी यहां की हार-जीत में अहम रोल निभाती आई है। यहां कांग्रेस को हराना आसान नहीं है, फिलहाल इस बार जेडीयू और भाजपा साथ-साथ हैं ऐसे में इस जीत पर कांग्रेस की वापसी कैसे होती है, ये एक देखने वाली बात है।
बिहार की अररिया लोकसभा सीट से राष्ट्रीय जनता दल के सरफराज़ आलम सांसद हैं। साल 2014 के चुनाव में इस सीट से राजद के तस्लीमउद्दीन जीते थे, लेकिन 2017 में उनका निधन हो जाने पर यह सीट खाली हो गई। 16 मार्च 2018 को इस सीट पर उप चुनाव हुए और सरफराज़ ने 61788 वोटों से जीत दर्ज की। इस उपचुनाव के दौरान कुल 1,738,070 मतदाता सूची में थे। जिनमें 919,675 पुरुष और 818,328 महिलाएं शामिल थीं। इनमें से कुल 59 प्रतिशत लोगों ने वोट डाला। वोट डालने वालों में 582,326 पुरुष और 453,824 महिलाएं शामिल थीं।












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