लोकसभा चुनाव 2019: शहडोल लोकसभा सीट के बारे में जानिए

नई दिल्ली: मध्यप्रदेश की शहडोल लोकसभा सीट से मौजूदा सांसद भाजपा के ज्ञान सिंह हैं। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां से जीत मिली और दलपत सिंह परस्ते सांसद बने लेकिन ब्रेन हेमरेज की वजह से उनका निधन हो जाने के कारण इस सीट पर साल 2016 में फिर से उपचुनाव हुए जिसमें भाजपा को ही सफलता मिली और ज्ञान सिंह सांसद बने। इस उपचुनाव में भाजपा के ज्ञानसिंह 58 हजार से ज्यादा वोटों से जीते थे उन्होंने कांग्रेस की हिमाद्री सिंह को हराया था, शहडोल लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस को जीत की उम्मीद थी लेकिन शिवराज कैबिनेट मंत्री और दो बार सांसद रह चुके ज्ञानसिंह मतदाताओं का दिल जीतने में कामयाब रहें। ज्ञानसिंह इससे पहले भी दो बार इसी सीट से जीतकर लोकसभा पहुंचे हैं ।

profile of Shahdol lok sabha constituency

शहडोल लोकसभा सीट का इतिहास

शहडोल अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट है। मध्यप्रदेश के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित शहडोल जिले का गठन 1959 में किया गया था। इसकी कुल जनसंख्या 24 लाख 10 हजार 250 है, जिसमें से 79 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है और 20 प्रतिशत लोग शहरों में निवास करते हैं। साल 1957 के चुनाव में यहां कांग्रेस का राज था तो वहीं 1962 के चुनाव में यहां सोशलिस्ट पार्टी ने जीत दर्ज की। 1967 के चुनाव में एक बार फिर से यहां कांग्रेस ने झंडे गाड़े तो वहीं 1971 में ये सीट निर्दलीय नेता धानशाह प्रधान ने जीत ली। 1977 के चुनाव में भारतीय लोकदल ने यहां जीत दर्ज की तो 1989 के चुनाव में यहां जनता दल विजयी हुई तो साल 1991 में एक बार फिर यहां कांग्रेस जीती लेकिन 1996 के चुनाव में यहां भाजपा ने जीत के साथ खाता खोला और ज्ञान सिंह सांसद बने और उसके बाद से लगातार साल 2004 तक भाजपा यहां जीतते आई है लेकिन साल 2009 के चुनाव में अरसे बाद यहां कांग्रेस ने जीत दर्ज की।

ज्ञान सिंह का लोकसभा में प्रदर्शन

दिसंबर 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा के कद्दावर नेता की लिस्ट में शामिल ज्ञान सिंह की लोकसभा में उपस्थिति 53 प्रतिशत रही है। इस दौरान उन्होंने 1 डिबेट में हिस्सा लिया है और 2 प्रश्न पूछे हैं।

अगर शहडोल के राजनीतिक समीकरणों और आंकड़ों पर गौर करें तो 1952 से लेकर 2016 तक शहडोल में सीधी टक्कर ही देखने को मिली है। हर बार बीजेपी और कांग्रेस में जोरदार मुकाबला हुआ। शुरुआती समय में यहां सोशलिस्ट विचारधारा का राज था और 1962 तक यहां सोशलिस्ट विचारधारा की पकड़ मजबूत रही लेकिन 1996 के बाद से भाजपा यहां मजबूत खिलाड़ी बनकर उभरी। आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र होने के बाद भी यहां के वोटर नेताओं को सबक सिखाने में भी पीछे नहीं रहे। दिवंगत सांसद दलवीर सिंह और अजीत जोगी जैसे कद्दावर नेताओं को भी यहां हार का स्वाद चखना पड़ा है। इतिहास गवाह है कि केंद्रीय राज्य मंत्री की कुर्सी तक पहुंचे दलवीर सिंह को इस सीट ने राजनीति के हाशिए पर पहुंचा दिया तो अजीत जोगी को आखिरकार छत्तीसगढ़ का रुख करना पड़ा था। खैर क्या एक बार फिर से यहां कमल खिलेगा या फिर कांग्रेस की वापसी होगी ये एक बड़ा सवाल सबके सामने हैं क्योंकि राज्य के सियासी समीकरण बदल गए हैं, आज एमपी में कांग्रेस की सरकार है तो वहीं भाजपा लंबे शासन के बाद मध्य प्रदेश की सत्ता से बाहर हो गई है, ऐसे में क्या इस सीट पर भाजपा फिर से विजय पताका फहरा पाएगी, ये देखना दिलचस्प होगा, कहना गलत नहीं होगा कि इस बार यहां एक कड़ा चुनावी मुकाबला देखने को मिलेगा।

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