लोकसभा चुनाव 2019: कच्छ लोकसभा सीट के बारे में जानिए

नई दिल्ली: गुजरात की कच्छ लोकसभा सीट से मौजूदा सांसद भाजपा के विनोद चावड़ा हैं। उन्होंने कांग्रेस के डॉ. दिनेश परमार को 254, 482 वोटों से हराया था। विनोद चावड़ा को इस चुनाव में 562, 855 वोट मिले थे। वहीं डॉ. दिनेश परमार को 308, 373 वोटों पर संतोष करना पड़ा था। बसपा प्रत्याशी 212, 30 वोटों के साथ इस जंग में तीसरे नंबर पर था।

profile of Kachchh lok sabha constituency

कच्छ लोकसभा सीट का इतिहास

गुजरात की कच्छ संसदीय सीट पर सबसे पहले आम चुनाव 1952 में हुआ था, जिसे की कांग्रेस ने जीता था और 1957 तक यहां पर कांग्रेस का ही राज रहा। साल 1962 में यहां स्वतंत्रता पार्टी ने चुनावी जीता तो साल 1967 और 1971 का चुनाव कांग्रेस के ही नाम रहा। वहीं 1977 में यहां चुनाव जनता पार्टी ने जीता लेकिन 1980-1984 में यहां कांग्रेस का राज रहा। इसके बाद साल 1989 में यहां पहली बार भाजपा ने जीत दर्ज की हालांकि इसके दो साल बाद ही हुए चुनाव में यहां कांग्रेस जीती लेकिन साल 1996 के चुनाव में यहां भाजपा ने जोरदार वापसी की और तब से लेकर अब तक सिर्फ और सिर्फ भाजपा का राज यहां पर है। 1996 से लेकर 2004 तक इस सीट पर पुष्पदन गढ़वी सांसद रहे तो 2009 में पूनमबेन जाट यहां से जीतकर लोकसभा पहुंचे थे तो वहीं 2014 में कच्छ लोकसभा सीट पर भाजपा ने विनोद चावड़ा को मौका दिया, जिसमें उन्होंने बड़ी जीत हासिल की और बीजेपी के कब्जे को यहां बरकरार रखा।

विनोद चावड़ा का लोकसभा में प्रदर्शन

दिसंबर 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात भाजपा का बड़ा नाम विनोद चावड़ा की पिछले 5 सालों के दौरान लोकसभा में उपस्थिति 83 प्रतिशत रही है। इस दौरान इन्होंने 7 डिबेट में भाग लिया है और 217 प्रश्न पूछे हैं। साल 2014 के चुनाव में इस सीट पर नंबर 2 पर कांग्रेस और नंबर 3 पर बसपा थी। उस साल यहां पर कुल मतदाताओं की संख्या 15,33,782 थी जिसमें से मात्र 9,46,240 लोगों ने अपने मतों का प्रयोग यहां पर किया था, जिसमें पुरूषों की संख्या 5,20,905 और महिलाओं की संख्या 4,25,335 थी।

कच्छ एक, परिचय- प्रमुख बातें-

गुजरात का कच्छ जिला पर्यटन का बहुत बड़ा केंद्र है इसलिए यहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए हर वर्ष कच्छ महोत्सव आयोजित किया जाता है। गुजरात के सबसे बड़े जिले के रूप में कच्छ की गिनती होती है हालांकि इसका अधिकांश हिस्सा रेत और दलदल से भरा है। यहां की ऐतिहासिक इमारतें और हिल स्टेशन काफी प्रसिद्ध है। 1270 में कच्छ एक स्वतंत्र प्रदेश हुआ करता था लेकिन अंग्रेजों के आने के बाद इसे ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया। साल 1953 में यह महाराष्ट्र के अंतर्गत था लेकिन 1960 में महाराष्ट्र और गुजरात का विभाजन हुआ तो कच्छ गुजरात का हिस्सा बन गया। यहां की कुल आबादी 24,54,299, है जिसमें से 59 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है और 40 प्रतिशत लोग शहरों में निवास करते हैं, 11 प्रतिशत लोग sc वर्ग के हैं तो वहीं 1 प्रतिशत आबादी एसटी वर्ग की है। ये अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है।

कच्छ सीट पर कांग्रेस 1996 से अबतक एक बार भी जीत हासिल नहीं कर पाई है। ऐसे में कांग्रेस के लिए कच्छ सीट सबसे बड़ी चुनौती है इसमें कोई शक नहीं कि कच्छ में भारतीय जनता पार्टी के मजबूत किले को तोड़ने के लिए उसे काफी मशक्कत करनी होगी हालांकि गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हालत पहले से बेहतर हुई थी,उसका जनाधार बढ़ा था, जिसकी वजह से उसके अंदर आत्मविश्वास वापस आया है, देखते हैं साल 2019 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी कच्छ के रण का सामना कैसे करती है।

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