नेपाल में राष्ट्रपति का अल्टिमेटम, बिन बहुमत पीएम बनने के लिए जोड़ तोड़

प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा
Reuters
प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा

नेपाल में चुनाव के बाद भी सरकार नहीं बन पाई है. किसी भी पार्टी या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है इसलिए सरकार बनने में देरी हो रही है.

राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने नई सरकार के गठन के लिए सभी राजनीतिक दलों को एक हफ़्ते की मोहलत दी है.

2008 में राजशाही ख़त्म होने के बाद दस बार सरकारें बदल चुकी हैं और हालिया चुनाव में त्रिशंकु संसद होने के बाद अभी तक कोई भी गठबंधन सरकार बनाने का दावा पेश नहीं कर रहा है.

नेपाल को नया प्रधानमंत्री मिलने में हो रही देरी से देश में राजनीतिक संकट गहराता जा रहा है.

नेपाली कांग्रेस नीत सत्तारूढ़ गठबंधन को इस चुनाव में 136 सीटें मिली हैं जबकि 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में बहुमत के लिए 138 सीटें चाहिए. यानी नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को बहुमत साबित करने के लिए दो सीटें और चाहिए.

पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की नेतृत्व वाली मुख्य विपक्षी पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी (यूएमएल) को 76 सीटें हासिल हुई हैं और उनके गठबंधन के पास कुल 104 सीटें हैं.

पुष्प कमल दहाल 'प्रचंड' की पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल माओवादी केंद्र (सीपीएन- माओइस्ट सेंटर) को इस चुनाव में कुल 32 सीटें, 18 सीधे चुनाव में और 14 समानुपातिक प्रतिनिधित्व के ज़रिये हासिल हुई हैं.

काठमांडू स्थित वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमरे का कहना है कि प्रधानमंत्री पद की दावेदारी में कई नाम हैं. नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा वर्तमान में प्रधानमंत्री हैं. प्रचंड ने अपनी दावेदारी जताई है और केपी शर्मा ओली भी इस दौड़ में बने रहना चाहते हैं.

उनके मुताबिक़, 'पर्याप्त संख्या और उस आधार पर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर मामला उलझा हुआ है, इसलिए सरकार गठन में देरी हो रही है.'

नेपाल में देउबा की सरकार बनेगी या ओली की फिर होगी वापसी?

प्रचंड
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प्रचंड

प्रचंड की दावेदारी

प्रचंड ने कहा कहा है कि नई सरकार बनने में उनकी पार्टी की केंद्रीय भूमिका होगी. उन्होंने चुनावों में विदेशी ताक़तों के हस्तक्षेप का भी आरोप लगाया था.

रविवार को उन्होंने वर्तमान प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा से मुलाक़ात की थी.

माना जा रहा है कि प्रचंड ने देउबा से मिलकर ख़ुद की दावेदारी के लिए समर्थन मांगा है.

नेपाली कांग्रेस के प्रवक्ता प्रकाश शरण का कहना है कि प्रचंड ने पीएम देउबा से पांच साला कार्यकाल के शुरुआती ढाई साल में प्रधानमंत्री बनने के लिए समर्थन मांगा है.

चुनाव से पहले भी दोनों पार्टियों में इस तरह का समझौता हुआ था लेकिन अब नेपाली कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर आई है, इसलिए वो ये पद गंवाना नहीं चाहेगी.

क्यों देना पड़ा अल्टिमेटम?

सरकार गठन में देरी के चलते राष्ट्रपति ने राजनीतिक दलों को नोटिस जारी किया है.

युवराज घिमरे का कहना, "संविधान के अनुच्छेद 76 के खंड (1) के मुताबिक़ पूर्ण बहुमत लाने वाले पक्ष को न्योता दिया जाता है. चूंकि ऐसी स्थिति नहीं है इसलिए अब अनुच्छेद 76 के खंड (2) के तहत ऐसे किसी पक्ष को राष्ट्रपति की तरफ़ से आमंत्रित किया जाएगा जिसके पास दो या अधिक पार्टियों का समर्थन हो."

इसका मतलब है कि राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी 25 दिसंबर के बाद किसी नेता को बुला सकती हैं जो दावा करता है कि उसके पास दो या दो से अधिक दलों का समर्थन प्राप्त है और वो बहुमत साबित कर सकता है. ये दावा 25 दिसंबर की शाम पांच बजे से पहले पहुँचना होगा.

घिमरे कहते हैं, "लेकिन नेपाल के राजनीतिक संकट का हल इतना आसान भी नहीं है. प्रचंड ने गठबंधन में शामिल होने के लिए ख़ुद को प्रधानमंत्री बनाए जाने की शर्त रख दी है. जैसे-जैसे 25 दिसंबर आएगा राजनीतिक सरगर्मी और बढ़ेगी."

उनके अनुसार, "प्रचंड की दावेदारी के बाद ये भी संभावना बनती है कि गठबंधन में टूट फूट हो और गठबंधन का कोई नया स्वरूप सामने आए."

क्या है पीएम नियुक्त करने की प्रक्रिया?

नेपाल में 2015 में स्वीकार किए गए नए संविधान में सीधे चुनाव और समानुपातिक प्रतिनिधित्व की मिलीजुली व्यवस्था है. इसके अनुसार, 60 प्रतिशत सीटें सीधे चुनाव से और 40 प्रतिशत सीटें वोट प्रतिशत के आधार पर तय की जाती हैं.

अगर किसी को स्पष्ट बहुमत मिल जाता है तो परिणाम घोषित होने के 30 दिन के अंदर प्रधानमंत्री को नियुक्त करना होता है.

नियुक्त प्रधानमंत्री को अगले एक महीने की तक मोहलत दी जाती है कि वो बहुमत साबित करे. अगर ऐसा नहीं होता है या त्रिशंकु संसद के हालात हैं तो राष्ट्रपति को अधिकार है कि वो सदन में सबसे बड़े दल के संसदीय नेता को पीएम नियुक्त कर सकता है और उसे भी एक महीने के भीतर बहुमत साबित करना पड़ेगा.

लेकिन इसके बावजूद बहुमत नहीं साबित होता है तो एक प्रावधान ये भी है कि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सिफ़ारिश पर प्रतिनिधिसभा को भंग कर करता है और छह माह के अंदर चुनाव की घोषणा कर सकता है.

घिमरे कहते हैं कि इतनी राजनीतिक अस्थिरता के बीच कोई भी नहीं चाहता कि ऐसी नौबत आए.

राजनीतिक दलों की गणित

ग़ौतलब है कि 275 सीटों में 165 सीटें सीधे चुनाव से और 110 सीटें समानुपातिक प्रतिनिधित्व से चुनी जाती हैं.

सीधे चुनाव में नेपाली कांग्रेस को 57, नेकपा एमाले को 44, नेकपा माओवादी केंद्र को 18 नेकपा एकीकृत समाजवादी को 7, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को 7 राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी को 7, जनता समाजवादी पार्टी को 7 और अन्य को 15 सीटें मिलीं हैं.

अगर समानुपातिक प्रतिनिधित्व की सीटें जोड़ लें तो नेपाली कांग्रेस को 89 और उसके अन्य सहयोगियों को 47 सीटें मिली हैं. पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (यूएमएल) को 76 सीटें, नेकपा माओवादी केंद्र को 32 सीटें मिली हैं. राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को 20 सीटें मिली हैं. नेकपा एकीकृत समाजवादी को 10 सीटें मिली हैं.

राजनीतिक गलियारे में ये भी चर्चा है कि केपी शर्मा ओली भी प्रधानमंत्री की दावेदारी के लिए जोड़तोड़ कर रहे हैं.

नेपाली कांग्रेस के प्रमुख नेता और वर्तमान प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने पांच पार्टियों का गठबंधन बनाया है. अगर राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने इस गठबंधन को अपना समर्थन दिया तो नेपाली कांग्रेस नीत गठबंधन के लिए सरकार बनाने का रास्ता साफ हो सकता है.

युवराज घिमरे कहते हैं कि आने वाले दिनों में राजनीतिक सरगर्मी और तेज़ होने की संभावना है क्योंकि समय के साथ राष्ट्रपति को अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करना मजबूरी हो जाएगा.

राजनीतिक उतार चढ़ाव

नेपाल में साल 1990 में लोकतंत्र स्थापित हुआ था और साल 2008 में यहां राजशाही को ख़त्म कर दिया गया था.

लोकतंत्र स्थापित होने के 32 सालों में यहां 32 सरकारें रही हैं और 2008 के बाद से अब तक पिछले चौदह सालों में दस सरकारें आईं-गईं हैं.

काफ़ी राजनीतिक संघर्षों के बाद 2015 में नया संविधान स्वीकार किया गया, लेकिन राजनीतिक स्थिरता अभी भी दूर की कौड़ी दिखाई देती है.

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