सेना की जिस रेजीमेंट को 75 साल पहले भारत ने टॉस में पाक से जीता, उसके हाथ में होगी राष्ट्रपति की सुरक्षा
नई दिल्ली, 25 जुलाई: भारत के 15वें राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार को शपथ ले ली है। मुर्मू देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने वाली पहली आदिवासी और सबसे कम उम्र की शख्सियत हैं। बतौर राष्ट्रपति उनकी सुरक्षा में राष्ट्रपति के अंगरक्षक तैनात रहेंगे। जिन्हें प्रेसिडेंट गार्ड यानी पीबीजी कहते हैं। लंबे-तगड़े, रौबदार चेहरा, चटक पोशाक और इनकी चुस्ती-फुर्ती हर किसी की ध्यान उनकी ओर खींचती हैं। पीबीजी भारतीय सेना की एलीट रेजीमेंट्स में से एक है। यह सेना की ना सिर्फ सबसे सीनियर बल्कि सबसे पुरानी रेजीमेंट भी है।

पीबीजी भारतीय सेना की सर्वोच्च यूनिट होती है
प्रेसीडेंट्स बॉडीगार्ड यानी पीबीजी भारतीय सेना की सर्वोच्च यूनिट होती है। इसका प्राथमिक रोल राष्ट्रपति की सुरक्षा करना और हर पल उनके साथ चलना है। यह यूनिट राष्ट्रपति भवन में ही रहती है। भारतीय सेना में इस सबसे एलीट रेजिमेंट के सदस्यों को हजारों सैनिकों से चुना जाता है। राष्ट्रपति के अंगरक्षक के रूप में 200 मजबूत घुड़सवार सदियों से भारत के टॉप वीवीईआईपी की रक्षा में तैनात होते हैं। इनमें टॉप वीवीआईपी में ब्रिटिश वायसराय से लेकर आधुनिक समय के राष्ट्राध्यक्षों तक शामिल हैं।

सेना की इन तीन रेजीमेंट से चुने जाते हैं सैनिक
वर्तमान समय में राष्ट्रपति की सुरक्षा में जो बॉडीगार्ड तैनात होते हैं, उनमें सेना से जाट, सिख और राजपूतों को प्राथमिकता दी जाती है। यह सैनिक हरियाणा, पंजाब और राजस्थान से आते हैं। इस पूरी रेजीमेंट में चार ऑफिसर्स, 11 जूनियर कमीशंड ऑफिसर्स (जेसीओ) और 161 जवान होते हैं। राष्ट्रपति के अंगरक्षकों के कमांडिंग ऑफिसर ब्रिगेडियर या कर्नल रैंक के अधिकारी होते हैं। राष्ट्रपति की सुरक्षा में सिर्फ उन्हीं सैनिकों का सिलेक्शन होता है, जिनकी लंबाई 6 फीट या इससे ज्यादा हो। स्वतंत्रता से पहले यह योग्यता छह फीट तीन इंच थी।

गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने किया था इस रेजीमेंट का गठन
करीब 252 वर्ष पुरानी प्रेसिडेंट बॉडीगार्ड या पीबीजी की पहली बॉडीगार्ड यूनिट का गठन सन् 1773 में गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स द्वारा किया गया था। 1784 में नाम गवर्नर-जनरल बॉडीगार्ड कर दिया गया। करीब 70 साल बाद इसका नाम बदलकर वायसराय बॉर्डीगार्ड कर दिया गया। स्वतंत्रता के बाद फिर नाम बदला और प्रेसिडेंट बॉडीगार्ड हो गया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने उस समय देश की इस यूनिट में यूरोपियन सैनिकों को बतौर पैदल सेना भर्ती किया था। इस यूनिट के लिए हेस्टिंग्स ने मुगल हाउस से 50 सैनिको को चुना था। पहले यह वायसराय की सुरक्षा के लिए थी अब यह राष्ट्रपति के अंगरक्षकों के तौर पर काम करती है।

बंटवारे के समय भारत पाकिस्तान में बांट दी गई रेजीमेंट
अब बात करते हैं 1947 की। जब भारत दो हिस्सों में टूटा तो सेना समेत कई संसाधनों का बंटवारा हुआ। इस दौरान भारतीय और पाकिस्तानी दोनों अधिकारी चाहते थे कि, ये रेजीमेंट उन्हें मिले। रेजीमेंट को तो 2:1 के अनुपात में भारत-पाकिस्तान के बीच बांट दिया गया। जब वायसराय की काली और सोने की परत चढ़ी बग्घी की बारी आई तो दोनों देश इस पर अपना दावा ठोकने लगे। 'गवर्नर जनरल्स बॉडीगार्ड्स' के कमांडेंट और उनके डिप्टी ने इस विवाद को सुलझाने के लिए एक सिक्के का सहारा लिया।

टॉस में जीती बग्घी
राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड रेजिमेंट के पहले कमांडडेंट लेफ्टिनेंट कर्नल ठाकुर गोविंद सिंह और पाकिस्तानी सेना के साहबजादा याकूब खान के बीच बग्घी को लेकर टॉस हुआ। जब सिक्का उछाला गया तो इसमें भारत की जीत हुई। जिसके बाद ये बग्घी भारत को मिल गई। गणतंत्र दिवस के मौके पर घोड़ों से सुसज्जित इसी बग्घी में राष्ट्रपति परेड के लिए पहुंचते हैं।

10000 सैनिकों में केवल 9 जवान हुए थे सिलेक्ट
राष्ट्रपति बॉडीगार्ड यूनिट का पहला कमांडर ब्रिटिश कैप्टन स्वीनी टून को बनाया गया था। स्वीनी ईस्ट इंडिया कंपनी के सम्मानित सैनिक थे। उनके अलावा उनके साथ बतौर जूनियर लेफ्टिनेंट सैम्युल ब्लैक थे। उस समय इस यूनिट में कैप्टन से लेकर पैराट्रूपर्स तक को शामिल किया गया था। राष्ट्रपति की सुरक्षा में तैनात बॉडीगार्ड की पुरानी यूनिट में एक कैप्टन, एक लेफ्टिनेंट, चार सार्जेंट्स, 6 दाफादार, 100 पैराट्रूर्प्स, दो ट्रंपटर्स और एक बग्घी चालक होता था। लेकिन अब इसमें कई बदवाल हो चुके हैं। दिसंबर 2019 में, केवल नौ रिक्तियों के लिए 10,000 से अधिक उम्मीदवारों ने आवेदन किया था।

इस एलीट ग्रुप में ऐसे होती सैनिकों की भर्ती
रेजीमेंट में सेना की विभिन्न टुकड़ियों से चुने गए जवानों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। यह पैरा ट्रुपिंग से लेकर दूसरे क्षेत्रों में भी दक्ष होते हैं। किसी जवान को इस यूनिट का हिस्सा बनने के लिए उस दो साल का कठिन प्रशिक्षण पूरा करना होता है। इस यूनिट का हिस्सा बनने के बाद सिलेक्ट हुआ जवान अपने कमांडेंट के सामने अपनी तलवार पेश करता है। जिसको छूकर कमांडेंट उसे पीबीजी में शामिल करते हैं। इस यूनिट की सबसे बड़ी पहचान होती हैं इनके खूबसूरत और मजबूत घोड़े। इस टुकड़ी में शामिल सभी जवानों को इनमें महारत होती है।












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