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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के दिन नई राजनीतिक दल के गठन का ऐलान करेंगे प्रशांत किशोर

Bihar Politics: चुनाव रणनीतिकार से सियासत के रण में आए प्रशांत किशोर (PK) अब अपनी पार्टी लॉन्च करने को तैयार हैं। पिछले 2 साल से जनसुराज पदयात्रा पर हैं और अब 2 अक्तूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती पर जन सुराज पार्टी की सियासत में एंट्री पर औपचारिक घोषणा करने वाले हैं। वर्ष 2022 में पीके ने बिहार के पश्चिमी चंपारण के भितिहरवा गांधी आश्रम से 3,500 किलोमीटर की पदयात्रा शुरू की थी। 1917 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी भितिहरवा आश्रम से अपना सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया था।

उन्होंने अपने यात्रा को 'जन सुराज' नाम दिया है। यह यात्रा अबतक करीब 27 सौ ग्राम पंचायतों से होकर गुजरी है और तकरीबन बिहार के 60 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र को कवर कर चुकी है। इस दौरान प्रशांत ने पलायन, गरीबी और अशिक्षा को मुद्दा बनाया। उन्होंने इस दौरान परिवारवाद और जातिवाद पर भी हमले किए। लेकिन पिछले कुछ दिनों से वो शराबबंदी के खिलाफ मुखर होकर बोलने लगे हैं। पार्टी के घोषणा की तारीख करीब आते ही वो अपने मुद्दों का दायरा बढ़ाने में लगे हैं। प्रशांत ने कहा कि पार्टी के गठन के बाद भी यात्रा का सिलसिला जारी रहेगा।

Prashant Kishor

PK के पास सपनों का पिटारा है

प्रशांत का कहना है कि उनका सारा ध्यान अभी बिहार पर केंद्रित है। प्रदेश की 8500 ग्राम पंचायतों को ध्यान में रख कर उन्होंने विकास का ब्लूप्रिंट भी तैयार किया है। उनके पास सपनों का पिटारा है। उन्हें विश्वास है कि 2025 में पूर्ण बहुमत के साथ जन सुराज की सरकार बननी तय है। उनका वादा है कि अगली बार छठ के मौके पर घर लौटने वाले परदेसी युवा दोबारा दोबारा रोजगार के लिए पलायन नहीं करेंगे। जन सुराज सरकार बेरोजगार युवाओं के लिए बिहार में ही रोजगार का इंतजाम कर देगी। वे सोशल मीडिया के जरिए महिलाओं को कमाई का जरिया भी बताएंगे। उनकी पार्टी जिन्हें उम्मीदवार बनाएगी, उनके प्रचार-प्रसार के खर्च भी वहन करेगी। पीके अपने उद्देश्य में कितने कामयाब होंगे ये तो भविष्य तय करेगा, पर इससे युवा जरूर आकर्षित हो रहे हैं।

नीतीश के चाल में फंस न जाए PK की सियासी गाड़ी

कभी नीतीश कुमार के लिए चुनावी रणनीति बनाने वाले और उनकी पार्टी में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद पाने वाले पीके की राजनीतिक हसरत पर नीतीश पानी न फेर दे। ये सवाल इसलिए लाजिम है क्योंकि नीतीश मध्यावधि चुनाव कराने को लेकर BJP पर लगातार दबाव बना रहे हैं। नीतीश बीजेपी के साथ इसी उम्मीद में वापस आए थे कि लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव हो जाए। BJP इसके लिए तैयार नहीं हुई। लेकिन भाजपा ने लोकसभा चुनाव के उपरांत इसपर विचार करने की बात जरूर कही थी। नीतीश आज भी बीजेपी के ग्रीन सिग्नल का इंतजार कर रहे हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में राज्य में तीन नंबर की पार्टी बनने की कसक कहीं न कहीं नीतीश के दिल में अभी भी है, वो कसक आज भी उनके दिलों दिमाग में रह-रहकर हिलोरे मार रहा है। सीएम नीतीश की दिल्ली यात्रा को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है। राज्यपाल भी दिल्ली की यात्रा पर हैं। बिहार की सियासी गलियों में इसे लेकर चर्चा जोरों पर है। इसलिए अर्ली इलेक्शन का दांव खेल कर नीतीश अपने नए सियासी दुश्मन प्रशांत किशोर को पटखनी दे सकते हैं।

PK के निशाने पर चाचा-भतीजा

प्रशांत किशोर के अब तक के सियासी चाल पर गौर करें तो उनके निशाने पर सबसे ज्यादा नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव ही रहे। वे तेजस्वी के नेतृत्व और शिक्षा को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। नीतीश कुमार के कार्यप्रणाली (Modus Operandi) पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करते रहे हैं। नीतीश पर आरोप लगाते हुए पीके कहते हैं कि सत्ता बचाने के लिए वो कभी बीजेपी तो कभी आरजेडी के बाहों में खेलते रहे हैं। बात करें RJD की तो, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव उन्हें BJP की B-Team बताकर PK पर हमला करते हैं। अगर पीके के बयानों पर गौर करें तो वे राजद और जेडीयू के मुकाबले भाजपा पर कम टिप्पणी करते नजर आए हैं।

ये तो वक्त ही बताएगा कि पीके जो बिहार के लोगों को एक नया विकल्प दिखा रहे हैं, उसमें वो कितना कामयाब होंगे, लेकिन इस समय वे दिल्ली से लेकर बिहार तक चर्चा के केंद्र में हैं।

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