नीतीश के 'पीके' ने शरद को किनारे करने की निकाली तरकीब!
पटना। लोकसभा चुनाव 2014 में अप्रत्याशित हार के बाद से नीतीश कुमार का देश और खासकर के बिहार की राजनीति में गजब का ह्रास देखने को मिला। लेकिन बिहार में जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाने के बाद से नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति में काफी मजबूती से वापसी की है और लगातार राजनीति की बुलंदियों की ओर अग्रसर होते जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि इस उछाल के पीछे का कारण कोई और नहीं बल्कि उनके रणनीतिकार और बिहार में महागठबंधन को महाजीत दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले प्रशांत किशोर हैं। लेकिन ये क्या अब यही प्रशांत शरद यादव को किनारे करने की तरकीब निकाल रहे हैं।
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अब नीतीश कुमार को सर्वमान्य नेता बनवाने और जदयू को राष्ट्रीय पार्टी के रूप में स्थापित करवाने की रणनीति पर काम करते हुए बिहार से आगे उत्तर प्रदेश के रालोद और झारखंड के जेवीएम जैसी क्षेत्रीय पार्टी के नेताओं को एकजुट करने की जुगाड़ लगा ली है।
'पीके' ने शरद यादव को किनारे करने की निकाली तरकीब!
पीके ने बनाया पार्टी पर दबाव
इतना ही नहीं बिहार सरकार की कमान के आलावा नीतीश कुमार को राष्ट्रीय फलक पर बैठाने के लिए शरद यादव को भी ठिकाने लगाने की जबरदस्त तैयारी का तानाबाना बुन लिया है। यहां तक कहा जा रहा है कि पीके ने ही दबाव बनवाकर शरद यादव को फिर से राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बनने का ऐलान उनके ही मुंह से करवाया है। शरद यादव ने स्वेच्छा से ऐलान नहीं किया है, बल्कि उन्हें नीतीश कुमार एण्ड कंपनी द्वारा दो विकल्प दिया गया था। एक राज्यसभा सांसद फिर से बनना या फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष ही बने रहना।
पीके की रणनीति है कि नरेन्द्र मोदी की तर्ज पर ही नीतीश कुमार को राष्ट्रीय पटल पर स्थापित करवाना और मिशन 2019 में जबरदस्त वापसी के साथ उच्चस्थ पद पर सत्तासीन करवाना है।
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नीतीश कुमार को उनके सबसे बुरे दिनों से उबारकर प्रशान्त किशोर ने हनुमान बनकर बिहार चुनाव रूपी किले को फतह करवाया था। लोकसभा चुनाव से पहले बिना रणनीति के ही नीतीश कुमार ने एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ने का खामियाजा भुगत लिया। दूसरी बार भी बिना किसी पूर्व रणनीति के नीतीश ने जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया। उसका भी खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा और जदयू ही नहीं बिहार में भी उनकी काफी किरकिरी होने लगी थी। जदयू दो धड़ों में बंट गई थी और नीतीश कुमार मांझी प्रकरण में बुरी तरह फंस चुके थे। तभी प्रशान्त किशोर नीतीश कुमार का नैया पार लगाने सामने आये।
अपने मास्टर प्लान वन के तहत पीके ने सबसे बड़ा निर्णय जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री से हटवाने का लिया। उसके बाद पीके के प्लान और सफलता से सभी भलीभांति परिचित हो ही गये हैं। फिर क्या था नीतीश कुमार दुबारा बिहार की राजनीति की धुरी बनते चले गये। आज जब नीतीश बिहार से इतर राष्ट्रीय राजनीति की धुरी बनने की ओर अग्रसर होने लगे हैं, इसके पीछे है पीके का प्लान नंबर टू। इसके मुताबिक प्रशांत किशोर जदयू का छोटी पार्टियों से विलय और भविष्य के रोड़े को रास्ते से हटाने में जुट गए हैं।
माना जा रहा है कि नीतीश कुमार का जदयू में अगर कोई रोड़ा है तो सिर्फ शरद यादव। जब तक शरद यादव राष्ट्रीय राजनीति में दल के सर्वोच्च पद पर बैठे रहेंगे, तब तक नीतीश कुमार जैसे नेताओं के लिए राष्ट्रीय राजनीति में पायलट सीट पर आना आसान नहीं होगा।
अगड़ा-पिछड़ा की जंग में नीतीश को होगा फायदा
समय समय पर शरद यादव की भूमिका नीतीश कुमार के प्रति जगजाहिर होती रही है। जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनवाने से लेकर मांझी को नीतीश के विरुद्ध करने की पृष्ठभूमि के रचयिता शरद को ही माना गया था। मसलन, शरद यादव को ठिकाने लगाने की तैयारी पूरी कर ली गई है। प्रशांत किशोर नीतीश के चेहरे को आगे कर बिहार की तरह 2019 में भी अगड़ा- पिछड़ा की लड़ाई छेड़ कर नीतीश को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाना चाहेंगे।
प्लान टू के अनुसार नीतीश कुमार की ओर से शरद यादव को दो विकल्प दिये गये हैं। एक फिर से राज्यसभा सांसद बनना या चौथी बार भी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना। आगामी मई महिने में शरद यादव का राज्यसभा कार्यकाल खत्म होनेवाला है। मई महीने में बिहार से जदयू कोटे से दो राज्यसभा सांसद बनने हैं। ऐसे में शरद यादव ने जदयू संविधान में संशोधन नहीं करने की दुहाई देते हुए इसी दबाव के चलते चौथी बार राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से इनकार कर राज्यसभा जाने को ज्यादा तवज्जो दिया। अब यह बात सामने आने लगी है कि जदयू से राज्यसभा में शरद यादव और राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत सिंह का जाना लगभग तय हो गया है।
बदल जायेगा जदयू का नाम
जदयू के स्वरूप ही नहीं नाम में भी बदलाव की पृष्ठभूमि लगभग तैयार हो गई है। झारखंड के पहले मुख्यमंत्री और जन विकास मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने नीतीश कुमार के नेतृत्व में विलय को सहमति दे दी है। रालोद के अजीत कुमार राज्यसभा जाने और उत्तरप्रदेश में अपनी मजबूती के लिए नीतीश के नेतृत्व को लगभग स्वीकार कर चुके हैं। ऐसे में यह बात भी सामने आ रही है कि शरद यादव को रालोद और जेवीएम के विलय से बननेवाली राष्ट्रीय जन विकास पार्टी के संयोजक का पद दिया जा सकता है। उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष की भूमिका में नीतीश कुमार होंगे। रालोद अध्यक्ष पार्लियामेंट्री बोर्ड के चीफ होंगे।
जदयू पार्टी के संविधान के मुताबिक, कोई व्यक्ति दो बार ही अध्यक्ष पद पर रह सकता है, जबकि शरद यादव को संविधान में संशोधन करते हुए तीसरी बार अध्यक्ष बनाया गया था। इसबार इसी को हथकंडा बनाकर शरद यादव ने चौथी बार अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया है। पार्टी नेताओं का तर्क यह भी है कि इस बार शरद यादव को पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने पर प्रखंड स्तर तक के अध्यक्ष को हटाने या रखने में परेशानी होगी।
30 जून के पहले पार्टी के नए अध्यक्ष का चुनाव हो जाना है। दिल्ली में राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में इस बात का फैसला भी होगा कि शरद यादव ने जो इस्तीफे की पेशकश की है, उसे स्वीकार किया जाएगा या नहीं। अब सवाल यह उठता है कि जब तीन दलों को मिलाकर एक दल बनाने की तैयारी चल रही है तब पार्टी के पुराने संविधान का मतलब क्या है और जब नई पार्टी होगी तो उसका स्वरूप भी नया होगा।
निश्चित तौर पर पार्टी के इस तर्क में दम नहीं दिखता की चौथी बार शरद यादव को अध्यक्ष बनाने में कोई संवैधानिक संकट है। जाहिर तौर पर शरद यादव का हश्र भी पार्टी के वर्तमान रणनीतिकार जॉर्ज फर्नांडीस और जीतनराम मांझी जैसा करना चाहते हैं।












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