प्रफुल्ल कुमार महंत: दो बार के सीएम, एक ही सीट से लगातार छह बार MLA फिर भी भाजपा के लिए काटी टिकट

प्रफुल्ल कुमार महंत: दो बार के सीएम, एक ही सीट से लगातार छह बार MLA फिर भी भाजपा के लिए काटी टिकट

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    Assam Election: AGP ने पार्टी के संस्थापक Prafulla Mahanta को नहीं दिया टिकट | वनइंडिया हिंदी

    दिसपुर। प्रफुल्ल कुमार महंत। असम के दो बार मुख्यमंत्री रहे। 1985 में जब 33 साल की उम्र मुख्यमंत्री बने थे तब देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री थे। अपनी मेहनत और समर्पण से असम गण परिषद (अगप) को खड़ा किया था। लेकिन आज हालत ये है कि पार्टी ने उन्हें चुनाव लड़ने के काबिल भी नहीं समझा। उनकी परम्परगत सीट बरहामपुर भाजपा के दे दी गयी। प्रफुल्ल कुमार महंत बरहमपुर सीट पर 1991 से 2016 तक लगातार छह बार विधानसभा चुनाव जीते थे। इसके बावजूद 2021 में अगप ने ये सीट भाजपा को दी। अगप के मौजूदा अध्यक्ष अतुल बोरा का कहना है कि महंत को स्वास्थ्य संबंधी कारणों से इस बार टिकट नहीं दिया गया है। लेकिन महंत इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनका आरोप है, चूंकि वे सीएए के खिलाफ हैं इसलिए उनकी सीट के साथ घपला कर दिया गया। अब उन्होंने अपनी पुरानी पार्टी असम गण परिषद (प्रगतिशील) को फिर जिंदा करने का संकेत दिया है। माना जा रहा कि महंत कांग्रेस के नेतृत्व में बने 'महाजोट’ के साथ जा सकते हैं। जो महंत एक समय असम की राजनीति में एक मजबूत स्तंभ थे, आज वे दीन-हीन और उपेक्षित क्यों हो गये ?

    महंत के साथ हुआ खेल

    महंत के साथ हुआ खेल

    प्रफुल्ल कुमार महंत इस साल जनवरी में बीमार होने के बाद अस्पताल में भर्ती थे। जब वे दिल्ली के एम्स में भर्ती थे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनकी पत्नी जयश्री और पुत्र से मुलाकात कर उनकी सेहत की जानकारी ली थी। लेकिन इलाज के बाद जब वे दिल्ली से गुवाहाटी लौटे तो उनके साथ बड़ा खेल हो चुका था। अगप ने महंत की सीटिंग सीट (बरहामपुर) भाजपा को दे दी। भाजपा ने यहां से जीतू गोस्वामी को उम्मीदवार भी बना दिया। बीजेपी ने अगप को 26 सीटें दीं। भाजपा ने अपने हिस्से में 92 सीटें रखीं। यूपीपीएल को 8 सीटें मिलीं। अब ये आरोप लग रहा है कि अगप अध्यक्ष अतुल बोरा ने भाजपा के दबाव में यह फैसला लिया है। महंत अगप के संस्थापक नेताओं में एक हैं और वे दो बार सीएम भी रहे हैं। बरहामपुर सीट पर समझौता करने के पहले अतुल बोरा ने महंत को विश्वास में भी नहीं लिया। खुद महंत का मानना है, मुझे सीएए के विरोध की कीमत चुकानी पड़ी है। वर्ना मैंने तो 1991, 1996, 2001, 2006, 2011 और 2016 में लगातार यहां से जीत हासिल की। फिर मेरी सीट छीन लेने की वजह क्या हो सकती है ? भाजपा का यहां कभी जनाधार नहीं रहा, फिर क्यों ये सीट उसे दी गयी ?

    अगर कांग्रेस के साथ गये तो भाजपा को नुकसान

    अगर कांग्रेस के साथ गये तो भाजपा को नुकसान

    प्रफुल्ल कुमार महंत का कहना है कि वे सीएए विरोधी दलों के साथ खड़े हैं। उनकी पत्नी और राज्यसभा सांसद जयश्री महंत का कहना है कि अगप जैसी क्षेत्रीय पार्टी ने नयी दिल्ली के सामने घुटने टेक दिये। महंत ने 2019 के लोकसभा चुनाव में अगप का भाजपा से फिर तालमेल का विरोध किया था। सीएए का मुद्दा असम में बहुत संवेदनशील है। असम के स्थानीय लोगों का यह मानना है कि सीएए, असम समझौता के खिलाफ है। अगर सीएए लागू हुआ तो बांग्लादेश से आये हिंदू लोग असम के नागरिक हो जाएंगे जिससे सामाजिक तानाबाना बिगड़ सकता है। जब सीएए संसद में पास हो रहा था तब अगप ने इसका समर्थन किया था। लेकिन बाद में इस मुद्दे को लेकर अगप में फूट पड़ गयी। कई नेताओं ने इस्तीफा दे दिया था। भाजपा के लिए असम में सीएए, एक तरह से गले की फांस बन गया है। विरोध को देखते हुए भाजपा ने इस मुद्दे पर खामोशी ओढ़ ली है। अमित शाह अपनी रैलियों में घुसपैठ की बात तो करते हैं लेकिन सीएए पर कुछ नहीं कहते। अगर प्रफुल्ल कुमार महंत सीएए को मुद्दा बना कर कांग्रेस गठबंधन में शामिल हो गये तो भाजपा का खेल खराब हो सकता है।

    क्यों हाशिये पर हैं महंत ?

    क्यों हाशिये पर हैं महंत ?

    महंत ने जब 1996 में दूसरी बार सत्ता संभाली तब तक उनकी राजनीतिक ताकत बरकरार थी। वे 2001 तक मुख्यमंत्री रहे। 2001 के चुनाव में अगप सरकार को हार का सामना करना पड़ा। जब महंत अपने कार्यकाल के अंतिम साल में तब उन पर आरोपों की बौछार होने लगी थी। उन पर दो गंभीर आरोप लगे जिसकी वजह से उनकी राजनीतिक छवि धूल में मिल गयी। उनके लिए सबसे बड़ी मुसीबत तब खड़ी हुई जब उन पर विवाहेतर संबंध का आरोप लगा। एक अंग्रेजी अखबार ने खुलासा किया था कि प्रफुल्ल कुमार महंत ने अपने राज्य सचिवालय की एक महिला कर्मचारी से मुम्बई के एक मंदिर में गंधर्व विवाह कर लिया है। जब कि वे पहले से शादीशुदा थे। इस बात का रहसयोद्घाटन कैसे हुआ, उसकी एक अलग कहानी है। ये कहानी खोजी पत्रकारिता से जुड़ी है। इसका जिक्र फिर कभी। महंत पर दूसर आरोप ये लगा कि उल्फा नेताओं के परिजनों की हत्या कराने में उनकी मिलीभगत रही थी। महंत पर विवाहेतर संबंध का आरोप लगने के बाद असम की राजनीति में भूचाल आ गया। 2005 में उन्हें पार्टी से निकाल बाहर किया गया।

    गिरे फिर खड़े हुए

    गिरे फिर खड़े हुए

    शक्तिशाली महंत आसमान से जमीन पर गिर पड़े। उनके अपने लोगों ने उनसे किनारा कर लिया। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। असम गण परिषद प्रगतिशील के नाम से नया दल बनाया। 2006 विधानसभा में किस्मत आजमायी। अपनी पार्टी के वे अकेले विधायक जीते। बाकी सभी उम्मीदवार हार गये। इस बीच कांग्रेस के मजबूत होने से अगप कमजोर होने लगी। अगप में महंत के आने के सारे दरवाजे बंद हो चुके थे। 2008 में जब अगप के अध्यक्ष पद पर चंद्रमोहन पटवारी की नियुक्ति हुई तो हालात बदलने लगे। उन्होंने सभी पुराने साथियों को जोड़ कर अगप को मजबूत करने की मुहिम शुरू की। सबसे पहले प्रफुल्ल कुमार महंत से बात की। तब महंत ने अपनी पार्टी का अगप में विलय कर लिया। इस तरह 2008 में अगप फिर एक हो गया। महंत अध्यक्ष बने। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद उन्होंने अगप अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। 2016 के विधानसभा चुनाव में अगप ने भाजपा के साथ समझौता किया और उसे 14 सीटों पर जीत मिली। महंत की भी इसमें सहमति थी। लेकिन सीएए के मुद्दे पर महंत की भाजपा से तकरार शुरू हो गयी। अब महंत की विधानसभा सीट छीन कर भाजपा ने उनके गुस्से को और भड़का दिया है।

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