Puja Khedkar को IAS से हटाते वक्त UPSC ने क्या-क्या लिखा, कौन से नियम से छीन ली नौकरी?
Pooja Khedkar News: महाराष्ट्र कैडर में विवादित ट्रेनी आईएएस अधिकारी पूजा खेडकर की नौकरी चली गई है। पूजा खेडकर अब आईएएस नहीं रही है। यूपीएससी ने 31 जुलाई 2024 को उसकी आईएएस उम्मीदवारी को रद्द कर दिया है।
पूजा खेडकर को ब्लैक लिस्टेट भी किया गया है। अब वह भविष्य में यूपीएससी की किसी भी परीक्षा में हिस्सा नहीं ले पाएगी। उसे भविष्य की सभी सरकारी परीक्षाओं/चयनों से स्थायी रूप से वंचित कर दिया गया है।

UPSC की सिविल सेवा परीक्षा में लाखों उम्मीदवार हिस्सा लेते हैं। उनमें से हजार से भी कम ही सक्सेस होते हैं। इतनी कठिन परीक्षा पास करके कोई IAS, IPS व IFS जैसे टॉप लेवल का अफसर बनता है।
पूजा खेडकर को आईएएस से हटाए जाने पर हर किसी के मन में सवाल उठ रहा होगा कि आखिर कौनसे नियम से यूपीएससी किसी आईएएस की नौकरी खत्म कर सकता है?
IAS की नौकरी खत्म करने के नियम
भारतीय प्रशासनिक सेवा की नौकरी खत्म करने के लिए बाकायदा नियम बने हुए हैं। संविधान के अनुच्छेद 311 (2) के अनुसार अगर किसी आईएएस अधिकारी को अपराध में दोषी ठहराया जाता है उसकी रैंक कम की जा सकती है। साथ ही उसकी नौकरी भी खत्म की जा सकती है।
इन प्रावधानों के तहत बर्खास्त किए गए सरकारी कर्मचारी राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण या केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) न्यायालयों जैसे न्यायाधिकरणों में जा सकते हैं।

अनुच्छेद 310 के अनुसार, संविधान द्वारा प्रदान किए गए प्रावधानों को छोड़कर, संघ में एक सिविल सेवक राष्ट्रपति की इच्छा से काम करता है और राज्य के अधीन एक सिविल सेवक उस राज्य के राज्यपाल की इच्छा पर काम करता है। ऐसे में उसे नौकरी से निकालना भी राष्ट्रपति के हाथ में होता है, यूपीएससी के नहीं। IAS, IRS या IFS पद के ऑफिसर को सिर्फ राष्ट्रपति ही नौकरी से निकाल सकता है।
संविधान के अनुसार, इसका हक यूपीएससी को नहीं दिया गया है. यहां तक कि राज्य का मुख्यमंत्री भी किसी ऑफिसर को पद से हमेशा के लिए नहीं हटा सकता है।
पूजा खेडकर को नौकरी के नोटिस में यूपीएससी ने क्या लिखा?
संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा सिविल सेवा परीक्षा-2022 (सीएसई-2022) की अनंतिम रूप से अनुशंसित उम्मीदवार सुश्री पूजा मनोरमा दिलीप खेडकर को 18 जुलाई, 2024 को फर्जी पहचान बताकर परीक्षा नियमों में निर्धारित अनुमेय सीमा से अधिक बार प्रयास करने के लिए कारण बताओ नोटिस (एससीएन) जारी किया गया था। उन्हें 25 जुलाई, 2024 तक एससीएन का जवाब देना था। हालांकि, उन्होंने 04 अगस्त, 2024 तक का अतिरिक्त समय मांगा ताकि वह अपने जवाब के लिए आवश्यक दस्तावेज जुटा सकें।

यूपीएससी ने सुश्री पूजा मनोरमा दिलीप खेडकर के अनुरोध पर सावधानीपूर्वक विचार किया और न्याय के उद्देश्य को पूरा करने के लिए उन्हें 30 जुलाई, 2024 को अपराह्न 3:30 बजे तक का समय दिया ताकि वह एससीएन का जवाब दे सकें। सुश्री पूजा मनोरमा दिलीप खेडकर को यह भी स्पष्ट रूप से बता दिया गया कि यह उनके लिए अंतिम अवसर है और समय में कोई और विस्तार नहीं दिया जाएगा।
उन्हें यह भी स्पष्ट शब्दों में बताया गया कि यदि उपरोक्त तिथि/समय तक कोई जवाब नहीं मिलता है, तो यूपीएससी उनसे कोई और संदर्भ लिए बिना आगे की कार्रवाई करेगा। उन्हें समय में विस्तार दिए जाने के बावजूद, वह निर्धारित समय के भीतर अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने में विफल रहीं।
यूपीएससी ने उपलब्ध अभिलेखों की सावधानीपूर्वक जांच की है और उन्हें सीएसई-2022 नियमों के प्रावधानों के उल्लंघन में कार्य करने का दोषी पाया है। सीएसई-2022 के लिए उनकी अनंतिम उम्मीदवारी रद्द कर दी गई है और उन्हें यूपीएससी की सभी भविष्य की परीक्षाओं/चयनों से भी स्थायी रूप से वंचित कर दिया गया है।
सुश्री पूजा मनोरमा दिलीप खेडकर के मामले की पृष्ठभूमि में, यूपीएससी ने वर्ष 2009 से 2023 तक यानी 15 वर्षों के लिए सीएसई के 15,000 से अधिक अंतिम रूप से अनुशंसित उम्मीदवारों के उपलब्ध आंकड़ों की उनके द्वारा किए गए प्रयासों की संख्या के संबंध में गहन जांच की है। इस विस्तृत अभ्यास के बाद, सुश्री पूजा मनोरमा दिलीप खेडकर के मामले को छोड़कर, किसी अन्य उम्मीदवार को सीएसई नियमों के तहत अनुमत संख्या से अधिक प्रयासों का लाभ उठाते हुए नहीं पाया गया है।
सुश्री पूजा मनोरमा दिलीप खेडकर के एकमात्र मामले में, यूपीएससी की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) मुख्य रूप से इस तथ्य के कारण उनके प्रयासों की संख्या का पता नहीं लगा सकी कि उन्होंने न केवल अपना नाम बल्कि अपने माता-पिता का नाम भी बदल लिया था। यूपीएससी एसओपी को और मजबूत करने की प्रक्रिया में है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भविष्य में ऐसा मामला दोबारा न हो।
जहां तक झूठे प्रमाण-पत्र (विशेष रूप से ओबीसी और पीडब्ल्यूबीडी श्रेणियों) प्रस्तुत करने के बारे में शिकायतों का सवाल है, यूपीएससी यह स्पष्ट करना चाहता है कि वह प्रमाण-पत्रों की केवल प्रारंभिक जांच करता है, जैसे कि प्रमाण-पत्र सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया है या नहीं, प्रमाण-पत्र किस वर्ष का है, प्रमाण-पत्र जारी करने की तिथि, प्रमाण-पत्र पर कोई ओवरराइटिंग तो नहीं है, प्रमाण-पत्र का प्रारूप आदि। आम तौर पर, प्रमाण-पत्र को असली माना जाता है, अगर वह सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया हो। यूपीएससी के पास न तो अधिकार है और न ही हर साल उम्मीदवारों द्वारा प्रस्तुत हजारों प्रमाण-पत्रों की सत्यता की जांच करने का साधन। हालांकि, यह समझा जाता है कि प्रमाण-पत्रों की सत्यता की जांच और सत्यापन इस कार्य के लिए नियुक्त अधिकारियों द्वारा किया जाता है।












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