कर्नाटक सीएम की रेस में शामिल डीके शिवकुमार का सियासी सफ़र

डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया में से किसी एक के कर्नाटक का सीएम बनने की संभावना है. डीके शिवकुमार के सियासी सफ़र में ऐसा क्या रहा जिसने उन्हें सीएम की कुर्सी के नज़दीक पहुंचा दिया है.

Political journey of DK Shivakumar involved in Karnataka CM race

सोमवार को डीके शिवकुमार ने साफ़ कहा है कि वो सीएम पद की अपनी मांग से कोई समझौता नहीं करेंगे. उन्होंने ये भी कहा कि वो मंगलवार को दिल्ली में हाईकमान से मुलाक़ात करेंगे.

एक अख़बार को दिए इंटरव्यू में कर्नाटक कांग्रेस चीफ़ ने कहा है कि अगर हाईकमान ढाई-ढाई साल के लिए सीएम पद के बंटवारे के फ़ॉर्मूले पर विचार करेगा, तो वो इसके लिए भी तैयार नहीं होंगे.

डीके शिवकुमार जानते हैं कि सही समय पर दांव लगाकर अपने सपनों को कैसे पूरा किया जाता है.

उनकी इसी नीति ने उन्हें कामयाबी दिलाई है और अब उनका नाम मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवारों की लिस्ट में शामिल है.

एच नागेश का उदाहरण देखिए जो कर्नाटक विधानसभा के एक निर्दलीय उम्मीदवार थे.

शिवकुमार ने जुलाई 2019 में पूरी कोशिश की कि वो मुंबई की फ़्लाइट न लें.

नागेश उन विधायकों में शामिल थे जिन्हें जनता दल सेक्युलर-कांग्रेस गठबंधन को तोड़ने के लिए एक होटल में रखा गया था.

शिवकुमार नागेश को मुंबई की फ़्लाइट लेने से रोक नहीं सके.

इसलिए वो उनके पीछे मुंबई पहुंच गए और होटल के बाहर खड़े रहे.

वहां पुलिस ने उन्हें अपने दोस्त के साथ 'एक कप चाय' नहीं पीने दिया.


डीके शिवकुमार की शख़्सियत

पूरा नाम - डोड्डालाहल्ली केम्पेगौड़ा शिवकुमार

वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं

कनकपुरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक

कर्नाटक कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष

एचडी कुमारस्वामी सरकार में सिंचाई मंत्री रहे

सिद्धारमैय्या सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे


देश को पता चला - कौन हैं डीके शिवकुमार

रातोंरात देश को पता चल गया कि शिवकुमार कौन हैं और क्यों उनमें इतनी अकड़ है.

उस दिन शिवकुमार ने उन बातों से पर्दा हटाया जिनकी चर्चा राजनीतिक हलकों में सिर्फ़ ऑफ़ द रिकॉर्ड हो रही थी.

उन्होंने मुंबई पुलिस के अफ़सर से कहा, "मेरे पास कोई हथियार नहीं है...मैं सिर्फ़ एक दिल लेकर आया हूं."

सत्तारूढ़ पार्टी से सीधे-सीधे लोहा लेने पर पूरे देश के कांग्रेस कार्यकर्ताओं से उन्होंने ख़ूब तारीफ़ बटोरी.

जब वो राजनीति में आने की कोशिश कर रहे थे, उस समय उनके साथी रहे एक व्यक्ति ने बीबीसी से नाम न बताने की शर्त पर कहा, "उनका यही रवैया उन्हें वो बनाता है जो वो आज हैं."

ये अलग बात है कि कांग्रेस का स्टेट प्रेसिडेंट रहते हुए शिवकुमार ने नागेश के पार्टी कैंडिडेट बनने के फ़ॉर्म पर दस्तखत किए, नागेश महादेवपुरा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे थे, लेकिन हार गए.

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कई ठिकानों पर रेड, लेकिन नहीं डरे शिवकुमार

उनके मुंबई वाले प्रकरण से दो साल पहले केंद्रीय एजेंसियों ने उनके शिक्षण संस्थानों, बेंगलुरू में उनके घर और गांव में उनकी मां के घर पर रेड भी मारी थी, लेकिन वे डरे नहीं.

ये रेड उनके राजनीतिक जीवन के एक अहम मोड़ पर मारे गए थे.

उन्होंने गुजरात के 44 विधायकों को बेंगलुरू के पास एक रिजॉर्ट में रुकवाया था, जब रेड शुरू हुई.

राज्यसभा चुनावों से पहले विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त रोकने के लिए उन्हें वहां रखा गया था.

तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल उम्मीदवार थे.

साल 2002 में विलासराव देशमुख की सरकार के दौरान महाराष्ट्र के विधायकों को एक जगह पर ठहराने का उनका अनुभव यहां काम आया था.

हाईकमान ने कांग्रेस पार्टी के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण नेता के चुनाव के लिए उन पर भरोसा जताया था.

उन्होंने बार-बार कहा कि वह बीजेपी से उप-मुख्यमंत्री का पद स्वीकार करने के बजाय जेल जाना पसंद करेंगे.

शनिवार को विधानसभा चुनाव के नतीजे आने पर भी उन्होंने यही बात दोहराई.

वह भावुक हो गए और याद किया कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का उनसे तिहाड़ जेल में मिलने आना उनके दिल को छू गया था.

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निवेश की अच्छी समझ

उनके एक सहयोगी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,''वह कुछ चीज़ों को लेकर बिल्कुल स्पष्ट हैं. इनमें से एक है, अपने पास पर्याप्त मात्रा में फ़ंड रखना. उन्होंने अपने कुछ क़रीबी सहयोगियों और समर्थकों को सही समय पर सही निवेश करने की सलाह भी दी है."

एक सहयोगी बताते हैं, "कनकपुरा (उनके विधानसभा क्षेत्र) में ग्रेनाइट खनन के बारे में तब तक कोई नहीं जानता था, जब तक उन्होंने इसमें निवेश का फ़ैसला नहीं किया. उन्होंने महसूस किया कि 90 के दशक की शुरुआत में ज़मीन में निवेश एक अच्छा अवसर है. इसलिए उन्होंने उन ज़मीनों में निवेश किया जहां संभावित औद्योगिकीकरण निवेश की संभावना थी, जैसे कि बेंगलुरु के कुछ हिस्सो में जहां आईटी हब बने या फिर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास. इनमें कुछ ग़ैर क़ानूनी नहीं था."

1980 के दशक के अंत में उन्हें बेंगलुरु ग्रामीण ज़िले के सथानूर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस का टिकट मिला.

तब वह महज़ 27 साल के थे. वह 1990 में एस बंगारप्पा के काफ़ी क़रीब आ गए, जिन्हें सीएम चुना गया था.

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आसान नहीं रहा सफ़र

जब उनके जैसे अन्य युवाओं को राज्य मंत्री बनाया गया तो उनका मोहभंग हो गया. काफ़ी अरसे बाद वो स्वर्गीय धरम सिंह (जो बंगारप्पा मंत्रालय के एक वरिष्ठ सदस्य थे) ने उन्हें मंत्रालय में शामिल होने में मदद की.

लेकिन बंगारप्पा से उन्हें जेल मंत्रालय मिला जिससे उन्हें निराशा हुई.

1991 में, उन्होंने राजनीति में नई आई तेजस्विनी गौड़ा का समर्थन किया और लोकसभा चुनाव में एचडी देवेगौड़ा को हराया.

बाद में वह एसएम कृष्णा के ख़ास बन गए और उन्हें केपीसीसी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. लेकिन जब 2019 में जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन बना तो वह कृष्णा और देवेगौड़ा के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाने में कामयाब रहे.

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बीजेपी के एक नेता के मुताबिक़, "उनके पास जाति समूहों के किसी भी वर्ग में मज़बूत समर्थन का आधार नहीं है, लेकिन वह जानते हैं कि मुद्दों से कैसे निपटना है. उनके पास एक ऐसा व्यक्तित्व है जो उनके विरोधियों के बीच विश्वास और भय पैदा करता है. यहां तक कि उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि वह राज्य के सबसे साधन संपन्न राजनेता हैं."

नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ नौकरशाह ने बीबीसी हिंदी को बताया, 'एक मंत्री के रूप में वह अधिकारियों की बात सुनते हैं और जानते हैं कि प्रशासन में आने वाले पेचीदा मुद्दों से कैसे निपटना है.'

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