India China News: चीन के नापाक मंसूबों को कुचलने की पीएम मोदी की तीन-सूत्री रणनीति

मोदी सरकार ने एलएसी पर चीन की चालबाजियों का स्थाई इलाज खोजने की कोशिश की है। सरकार ने हाल में ऐसे फैसले लिए हैं, जो लंबे समय में चीन की सारी रणनीति ध्वस्त कर सकते हैं।

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भारत के उत्तरी और उत्तर-पूर्वी सीमा पर चीन का नाकाब मंसूबा 1962 में ही जाहिर हो गया था। उसके बाद से लगातार चीन ने बार-बार वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीजों को उलझाने की कोशिश की है। कभी लद्दाख में तो कभी सिक्कम और अरुणाचल प्रदेश में। लेकिन, 2020 में जब पूरी दुनिया कोरोना के कोहराम से कराह रही थी, तब उसने पूर्वी लद्दाख में जो कुछ किया, उससे जाहिर हो गया कि उसकी नीतियों में विस्तारवाद हर चीज पर हावी है। लेकिन, चीन को शायद पहली बार गलवान घाटी में ही भारतीय सेना ने एहसास करा दिया था कि अब भारत बदल चुका है। कुछ समय पहले एक बार फिर चीन की सेना अरुणाचल प्रदेश में मुंह की खा चुकी है। लेकिन, अब प्रधानमंत्री ने चीन की विस्तारवादी नीति का स्थाई इलाज तलाशने की रणनीति पर काम किया है।

चीन के नापाक मंसूबों को कुचलने की तीन-सूत्री रणनीति

चीन के नापाक मंसूबों को कुचलने की तीन-सूत्री रणनीति

वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की आक्रमकता को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन बड़े फैसले लिए हैं, जिससे आने वाले समय में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना की सरकार के नापाक मंसूबे हमेशा के लिए कुचले जा सकेंगे। यह तीन सूत्री रणनीति है एलएसी के लिए भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की सात नई बटालियनों का गठन, वाइब्रेंट विलेज स्कीम की शुरुआत और शिंकुन ला सुरंग को मंजूरी। देश की उत्तरी और उत्तर-पूर्वी सीमा के लिए यह लंबे समय की रक्षा नीति में कागरकार साबित होने वाली है। क्योंकि, चीन तिब्बती इलाकों में दखल बढ़ाकर पिछले कई दशकों से इसी क्षेत्र के माध्यम से भारत को उलझाए रखने की चालबाजी कर रहा है।

आईटीबीपी की सात बटालियनें बनेंगी

आईटीबीपी की सात बटालियनें बनेंगी

चीन की सेना पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी (PLA) ने तिब्बत और शिंजियांग के अपने वेस्टर्न थियेटर कमांड में थ्री-टियर सिक्योरिटी इंतजाम किए हैं। सीमावर्ती गांव में बॉर्डर गार्ड, डिस्ट्रिक्ट पुलिस और फिर पीएलए की रिजर्व बटालियनों की व्यवस्था है। आईटीबीपी की सात नई बटालियनों का गठन (जिसके लिए करीब 9,400 हजार जवानों की भर्ती होनी है) का मतलब है कि भारत ने चीन को उसी की भाषा में जवाब देने की रणनीति बनाई है। अब 3,488 किलोमीटर लंबी एलएसी पर करीब 56 बटालियनों की तैनाती होगी, उनके पीछे भारतीय सेना की लोकल यूनिट होगी और फिर आर्मी की रिजर्व फोर्स। आईटीबीपी 12,000 फीट से ऊंचे और सब-जीरो तापमान के लिए स्पेशलाइज्ड फोर्स है। नई भर्तियों में स्थानीय युवकों को भी मौका मिलना है, जो कि उस इलाके से बखूबी वाकिफ रहे हैं।

47 बॉर्डर पोस्ट के लिए होंगी नई बटालियनें

47 बॉर्डर पोस्ट के लिए होंगी नई बटालियनें

आईटीबीपी की नई बटालियनें 47 बॉर्डर पोस्ट के लिए जिम्मेदार होंगे। इनमें से एक लद्दाख, दूसरा उत्तराखंड में बनेगा। बाकी अरुणाचल प्रदेश के संवेदनशील सेक्टर में डटेंगे। अरुणाचल में जो सेक्टर हेडक्वार्टर बनेगा, उसकी डीआईजी रैंक के एक अधिकारी अगुवाई करेंगे। इनके अलावा मुश्किल ऊंचाइयों वाली जगहों पर नए स्टेजिंग कैंप बनाए जाएंगे, जिनके माध्यम से बॉर्डर पोस्ट पर तैनात जवानों को भोजन, तेल, हथियार और गोला-बारूद उपलब्ध करवाए जाएंगे।

वाइब्रेंट विलेज स्कीम

वाइब्रेंट विलेज स्कीम

आईटीबीपी बटालियनों की स्थापना के साथ ही 4,800 करोड़ रुपए की वाइब्रेंट विलेज स्कीम की भी व्यवस्था की गई है। इसके माध्यम से चार सीमावर्ती राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में इंफ्रास्ट्रक्रर का विकास किया जाएगा और वहां के लोगों को जीविकोपार्जन के अवसर उपलब्ध होंगे। इसमें करीब 2,500 करोड़ रुपए का फंड सिर्फ सीमावर्ती गांवों तक लास्ट-माइल कनेक्टिविटी के लिए है। इससे स्थानीय युवकों को रोजगार और व्यापार के मौके भी उपलब्ध करवाए जाने है। इस योजना के माध्यम से सरकार का इरादा स्थानीय लोगों को सीमावर्ती क्षेत्रों के अपने मूल स्थानों में रहने के लिए ही प्रेरित करना है, जिससे कि सीमा की सुरक्षा बढ़ाई जा सके। मोदी सरकार के इस फैसले का दूरगामी असर होने की उम्मीद है। क्योंकि, राष्ट्रीय सुरक्षा की योजना बनाने वालों ने पाया है कि इन सीमावर्ती गांवों के युवाओं को रोजगार की तलाश में शहरों की ओर आना पड़ता है, जिससे एलएसी पर रक्षा की पहली पंक्ति कमजोर होती है।

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    शिंकुन ला सुरंग

    शिंकुन ला सुरंग

    मोदी सरकार का तीसरा अहम फैसला है, लद्दाख में शिंकुन ला सुरंग को हरी झंडी देना। यह मनाली-निमू-पदम-दरचा रोड कनेक्टिविटी के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। 4.1 किलोमीटर लंबी यह सुरंग लद्दाख के दुर्गम से दुर्गम सीमावर्ती इलाकों में भी हर मौसम पहुंच तो सुनिश्चित करेगी ही, पाकिस्तान से सटी सीमाओं तक पहुंचे में भी आसानी रहेगी। इसके माध्यम से मनाली-अटल सुरंग के जरिए हिमाचल प्रदेश से लद्दाख पहुंचना काफी आसान होगा। 1,681 करोड़ रुपए की लागत वाली इस सुरंग का काम 2025 के दिसंबर तक पूरा होगा और यह लद्दाख के सीमावर्ती इलाकों तक पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता भी हो जाएगा। यह ऐसी सुरंग होगी जिसपर चीन और पाकिस्तान की मिलाइलें भी बेअसर होंगी और यहां से जवान और हथियार आसानी और तेज गति से सीमा तक पहुंचाए जा सकेंगे। 16,500 फीट की ऊंचाई पर बनने वाली इस सुरंग के बनने से जोजिला दर्रे से होकर गुजरने की आवश्कता खत्म होगी, जिसमें लंबा वक्त लगता है। (कुछ तस्वीरें-सांकेतिक)

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