यूपी के तीसरे चरण में चाचा-भतीजे की जंग, कौन जीतेगा बाजी?

नई दिल्ली- यूपी में तीसरे चरण के चुनाव में मुलायम सिंह यादव के परिवार का बड़ा दांव लगा हुआ है। इस दौर में उनके परिवार के चार सदस्यों के राजनीतिक भाग्य का फैसला होना है। इस चरण में राज्य की 10 लोकसभा सीटों पर चुनाव हो रहा है, जिसमें अभी 7 सीटें बीजेपी के पास है। मंगलवार को जिस इलाके में चुनाव हो रहा है, उसे समाजवादी पार्टी का स्ट्रॉन्गहोल्ड माना जाता है और 2014 में मोदी लहर के बावजूद मुलायम के परिवार के सदस्यों ने यहीं से अपनी कुल 5 में से 3 सीटें जीती थी। लेकिन, इसबार सबसे दिलचस्प ये बात है कि मुलायम परिवार के अंदर ही सियासी टक्कर देखने को मिल रहा है।

इन सीटों पर दोबारा जीतने का प्रयास

इन सीटों पर दोबारा जीतने का प्रयास

इस चुनाव में मैनपुरी से मुलायम सिंह यादव, बदायूं से उनके भतीजे धर्मेंद्र यादव और फिरोजाबाद से दूसरे भतीजे एवं रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव चुनाव मैदान में हैं। इन तीनों सीटों पर पिछलीबार भी यादव परिवार के सदस्य ही जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। मुलायम ने मैनपुरी सीट की सदस्यता छोड़कर आजमगढ़ की सीट अपने पास रखी थी, तो उपचुनाव में परिवार के ही तेज प्रताप यादव मैनपुरी से जीतकर लोकसभा में दाखिल हुए थे।

चाचा-भतीजे की जंग

चाचा-भतीजे की जंग

इसबार मुलायम परिवार के लिए सबसे रोचक मुकाबला फिरोजाबाद में देखने को मिल रहा है, जहां से एक तरफ मुलायम के सगे भाई और दूसरी तरफ से चचेरे भाई के बेटे चुनाव मैदान में ताल ठोकर खड़े हैं। यहां से मुलायम के बेटे अखिलेश यादव ने अपने चचेरे चाचा रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव को टिकट दिया है, तो उनके मुकाबले में अखिलेश के सगे चाचा शिवपाल यादव मैदान में डटे हुए हैं। भतीजे से मनमुटाव के बाद शिवपाल यादव ने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनाई है। सिर्फ फिरोजाबाद ही नहीं यूपी की कई सीटों पर भी शिवपाल यादव ने अपने उम्मीदवारों को उतारकर महागठबंधन के प्रत्याशियों का टेंशन बढ़ा रखी है। क्योंकि, शिवपाल यादव की सपा संगठन में मजबूत पकड़ थी और उस आधार पर उन्हें मुलायम के बाद परिवार का दूसरा जनाधार वाला नेता माना जाता रहा है। ऐसे में देखने वाली बात होगी कि वह भतीजे अखिलेश की सियासी चाल को किस हद तक धीमी कर पाते हैं।

महागठबंधन से परिवार की राह आसान

महागठबंधन से परिवार की राह आसान

जिन सीटों पर यादव परिवार अपना सियासी किस्मत आजमा रहा है, वहां वो मोदी लहर में भी जीतने में कामयाब रहा था। समाजवादी पार्टी ने 2014 में परिवार की 5 सीटें सीटें जीती थीं। इसबार उन्हें बुआ और बबुआ के बीच हुए चुनावी गठबंधन का भी फायदा मिल रहा है। इसलिए, माना जा रहा है कि परिवार को अपनी किसी भी सीट पर सत्ताधारी बीजेपी से कोई बड़ी चुनौती नहीं मिल सकती है। जो भी चुनौती है वह अखिलेश यादव को अपने चाचा की पार्टी से ही चुनौती मिल सकती है। हालांकि, पूरे चुनाव प्रचार के दौरान शिवपाल यादव के अभियान में कहीं से भी कोई ज्यादा धार देखने को नहीं मिली। लेकिन, अगर उन्हें समाजवादी पार्टी के सायलेंट वोटरों का समर्थन है, जो बहनजी के साथ नहीं जाना चाहता, तो नतीजे किस हद तक प्रभावित होंगे, उसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।

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