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Periyar Birthday: जाति की बेड़ियां तोड़ने वाले समाज क्रांति के अनथक योद्धा, विरोध की आग ने बनाया और प्रखर

Periyar Birthday Special: पेरियार एक ऐसा योद्धा, एक ऐसा तूफान जिसने समाज में फैली कुरीतियों और अंधविश्वास की दीवारें तोड़ने का काम किया। पेरियार का असली नाम वेंकटप्पा रामासामी था। उनका जन्म 17 सितंबर 1879 को ईरोड, तमिलनाडु के एक सम्पन्न व्यापारी परिवार में हुआ था। पढ़ाई-लिखाई महज पांच साल तक सीमित रही, फिर मात्र 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाना शुरू कर दिया। लेकिन उनका विचारशील मन कभी भी बंदी नहीं रहा।

Periyar

वे वैष्णव संतों की बातें ध्यान से सुनते, समाज के विरोधाभासों पर सवाल उठाते और धीरे-धीरे अंधविश्वास व जाति व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष का रास्ता अपनाते चले गए।

बगावत की शुरुआत (Periyar Birthday Special)

1919 में पेरियार ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जॉइन की, न्याय के लिए उसे एक मंच समझते हुए। एरोड नगरपालिका के अध्यक्ष के रूप में खादी को बढ़ावा देना, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, अस्पृश्यता उन्मूलन और देशी शराब विक्रेताओं के खिलाफ आंदोलन चलाना उनकी प्रमुख पहलकदमियाँ रहीं। इस दौरान उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। उनकी पत्नी नागम्माई और बहन ने भी निडरता से उनके साथ संघर्ष किया।

लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि कांग्रेस के अंदर भी गहरे जातिगत भेदभाव छुपे हैं। 1922 में उन्होंने पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग की, लेकिन गांधी जी और उनके अनुयायियों ने उसे ठुकरा दिया। निराश होकर पेरियार ने 1925 में कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया और प्रण लिया कि वे तमिलनाडु में कांग्रेस को हमेशा के लिए सत्ता से बाहर रखेंगे। इतिहास ने उनके इस संकल्प को सही साबित किया है।

वैकोम सत्याग्रह: न्याय के द्वार पर योद्धा

1924 में त्रावणकोर राज्य में चल रहे वैकोम सत्याग्रह में पेरियार और नागम्माई ने हिस्सा लिया। जाति अत्याचार के खिलाफ उनकी निडरता ने उन्हें 'वैकोम वीरर' की उपाधि दिलाई। गांधी जी ने आंदोलन में बाहरी लोगों की भागीदारी पर आपत्ति जताई, लेकिन पेरियार ने इसे तुच्छ समझा।

छुआछूत के खिलाफ आवाज

1925 में पेरियार ने जाति व्यवस्था पर प्रहार करते हुए कहा, "चिड़िया, जानवर और कीड़े जाति में नहीं बंटते, फिर मनुष्य क्यों बंटा?" उनकी सोच थी कि स्वाभिमान ही सबसे बड़ा धर्म है।

स्वाभिमान के आंदोलन की शुरुआत

1925 से उन्होंने अंधविश्वास, निरर्थक रीति-रिवाज और जाति भेद के खिलाफ स्वाभिमान आंदोलन की शुरुआत की। कड़ी नीतियों और लेखन के माध्यम से जैसे 'कुडी अरासु' (1925) और 'रिवोल्ट' (1928) से उन्होंने समाज में बदलाव की लहर दौड़ाई। महिलाओं की शिक्षा, विधवाओं का पुनर्विवाह, बिना पुरोहित विवाह और जातिगत पेशों का उन्मूलन उनकी प्रमुख मांगें बनीं।

न्याय पार्टी और द्रविड़ कषगम का जन्म

1937 में अंग्रेजों द्वारा तमिल स्कूलों में हिंदी थोपने पर पेरियार ने विरोध की अगुआई की। इसके बाद उन्होंने न्याय पार्टी का नेतृत्व संभाला और इसे 1944 में द्रविड़ कषगम में तब्दील कर दिया। उनका उद्देश्य था - अंधविश्वास, ब्राह्मणवाद और सामाजिक विषमता का उन्मूलन।

अंतिम उद्घोष

1958 में अंग्रेजी को भारत की सच्ची एकता की भाषा बताया। 1963 में उत्तर भारत की यात्रा कर जाति प्रथा उन्मूलन का संदेश फैलाया। 19 दिसंबर 1973 को चेन्नई में दिया गया उनका अंतिम भाषण समानता और तर्कवाद की अंतिम पुकार बना। पांच दिन बाद, 24 दिसंबर 1973 को 94 वर्ष की उम्र में पेरियार का निधन हो गया।

पेरियार की विरासत (Periyar Birthday Special)

पेरियार आज भी जीवित हैं... हर उस आवाज में जो जातिगत भेदभाव के खिलाफ खड़ी होती है, हर उस महिला में जो शिक्षा का अधिकार मांगती है, और हर उस तर्कवादी में जो अंधविश्वास को चुनौती देता है। उनका संघर्ष आज भी प्रेरित करता है समाज के हर तबके को समानता, स्वाभिमान और तर्कवाद के पथ पर आगे बढ़ने के लिए।

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