शिवसेना ने कहा-केंद्र की सहमति के बिना नहीं हो सकता पेगासस हमला, JPC करे जांच

नई दिल्ली, जुलाई 21: पेगासस विवाद को लेकर केंद्र पर निशाना साधते हुए शिवसेना ने बुधवार को कहा कि पेगासस चुनिंदा भारतीयों पर एक साइबर हमला है और ऐसा हमला केंद्र सरकार की सहमति के बिना नहीं हो सकता। सामना के संपादकीय में शिवसेना ने आगे लिखा कि पेगासस हमला आपातकाल से ज्यादा खतरनाक है। पेगासस के "असली पिता" हमारे देश में हैं और उन्हें उन्हें ढूंढना चाहिए।

Pegasus attack cant happen without Centres consent: Shiv Sena

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    शिवसेना ने सामना के संपादकीय में लिखा कि, पेगासस चुनिंदा भारतीयों पर एक साइबर हमला है और ऐसा हमला केंद्र सरकार की सहमति के बिना नहीं हो सकता। पेगासस जासूसी मामले की जिम्मेदारी कौन लेगा? सबसे पहले पूरे मामले की जांच संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) द्वारा की जानी चाहिए। नहीं तो सुप्रीम कोर्ट को स्वत: संज्ञान लेना चाहिए और एक स्वतंत्र समिति नियुक्त करनी चाहिए। राष्ट्रीय हित इसमें निहित है।

    लोकसभा में शिवसेना के पार्टी नेता विनायक राउत के नेतृत्व में शिवसेना सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की और पेगासस विवाद में जेपीसी के गठन और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। शिवसेना नेताओं ने स्पीकर को लिखे अपने पत्र में कहा कि, रिपोर्ट के अनुसार, विपक्षी नेताओं, मंत्रियों, पत्रकारों, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों और अन्य सहित कम से कम 40 लोगों को निगरानी में रखा गया था।

    संपादकीय में आगे कहा गया है कि मुट्ठी भर लोग आपातकाल लगने की घटना के लिए हर साल काला दिवस मनाते हैं। पेगासस हमला आपात स्थिति से ज्यादा खतरनाक है। पेगासस के असली पिता हमारे देश में हैं और उन्हें उन्हें ढूंढना चाहिए। इसे निजता के अधिकार पर सीधा हमला बताते हुए शिवसेना के मुखपत्र ने आगे कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आश्चर्यजनक बयान दिया है कि यह देश और लोकतंत्र को बदनाम करने की एक अंतरराष्ट्रीय साजिश है। क्या गृह मंत्री बता सकते हैं कि कौन देश को बदनाम कर रहा है? सरकार, लोकतंत्र और देश आपका है। फिर यह सब करने की हिम्मत किसमें है?

    संपादकीय में आगे कहा गया कि, जब कांग्रेस शासन के दौरान जासूसी की घटनाएं सामने आईं, तब भाजपा ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए इस्तीफे की मांग की थी। अब वह सत्ता में है लेकिन संसद में इस मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार नहीं है। लोकतंत्र के चार स्तंभों जैसे न्यायपालिका, संसद, कार्यपालिका और प्रेस को निगरानी में रखा गया था। अब, सवाल यह है कि राजनीतिक विरोधियों पर नजर रखने के लिए भारत में पेगासस सेवाओं को किसने खरीदा। ऐसा हमारे देश के इतिहास में पहली बार हुआ है।

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