जगदीप धनखड़ को क्या पद से हटा पाएगा विपक्ष? अविश्वास प्रस्ताव में कितना दम, क्या है संवैधानिक प्रावधान?
Parliament Winter session: विपक्ष संसद में शीतकालीन सत्र के दौरान कथित तौर पर यह सामने आया है कि विपक्ष राज्यसभा के उप सभापति जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। सदन में विपक्ष की ओर उपसभापति पर लगातार ये आरोप लगाए जा रहे हैं कि उनकी (विपक्षी दलों के नेताओं) की बातों को दरकिनार किया जा रहा है। ऐस में सवाल ये है कि सदन में विपक्ष अगर जगदीप धनखड़ को पद से हटाने का प्रस्ताव लाता है, तो इसमें कितनी शक्ति होगी? संविधान में उप सभापति को हटाए जाने का क्या प्रावधान है?
राज्यसभा के उप सभापति के कार्यकाल की बात करें तो ये पांच साल का होता है। इस पर आसीन नेता को अविश्वास प्रस्ताव के जरिए कार्यावधि के बीच में भी हटाया जा सकता है। हालांकि इससे लिए राज्यसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले दल या फिर गठबंधन के पास पूर्ण बहुमत होना आवश्यक है। समर्थन के साथ संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक, अविश्वास प्रस्ताव के साथ विशिष्ट नियमों का पालन करना भी जरूरी है।

उपराष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया
I- संवैधानिक प्रावधान
अनुच्छेद 67(बी)
यह अनुच्छेद उपराष्ट्रपति को हटाने को नियंत्रित करता है। इसके लिए राज्यसभा द्वारा अपने सभी सदस्यों के बहुमत से पारित एक प्रस्ताव की आवश्यकता होती है और बाद में लोकसभा द्वारा सहमति व्यक्त की जाती है।
निष्कासन के लिए आधार: संविधान निष्कासन के लिए विशेष आधार निर्दिष्ट नहीं करता है, इसे संसद के सदस्यों के विवेक पर छोड़ देता है।
II- नोटिस अवधि
हटाने के लिए प्रस्ताव पेश करने से पहले 14 दिन का नोटिस दिया जाना चाहिए। नोटिस में समाधान शुरू करने का इरादा स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए और इसके कारणों को रेखांकित किया जाना चाहिए।
III- वोटिंग
यह प्रस्ताव राज्य सभा के कुल सदस्यों के बहुमत से पारित होना चाहिए। प्रस्ताव को सफल बनाने के लिए इसे लोकसभा में साधारण बहुमत से सहमत होना होगा।
IV- उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने में चुनौतियां
1- विपक्षी दलों के बीच आम सहमति
विपक्षी गुट के सभी सदस्य इस प्रस्ताव पर सहमत नहीं हैं, जो प्रयास को कमजोर कर सकता है।
2- बहुमत की आवश्यकता
संसद के दोनों सदनों में बहुमत हासिल करना महत्वपूर्ण है, ऐसे प्रस्ताव की सफलता चुनौतीपूर्ण होती है जब तक कि महत्वपूर्ण क्रॉस-पार्टी समर्थन न हो।
3- संसदीय कामकाज पर प्रभाव
अविश्वास प्रस्ताव संसद के कामकाज को और अधिक ध्रुवीकृत कर सकता है, जिससे विधायी कार्यवाही प्रभावित हो सकती है।











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