I.N.D.I. A.-पुरानी बातों को भूल कर ममता और सोनिया एक साथ, मजबूत होगा ‘INDIA’
बेंगलुरु। मंगलवार को विपक्षी दलों ने अपने गठबंधन का नाम 'इंडिया' रख कर दूर की कौड़ी खेली है। अब एनडीए को इस गठबंधन का नाम लेकर आलोचना करने में मुश्किल होगी। इंडिया- अंग्रेजी के पांच शब्दों से मिल कर बना है- इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक इन्क्लूसिव एलायंस (Indian National Democratic Inclusive Alliance )।
सोनिया गांधी और ममता बनर्जी अगल बगल बैठीं
विपक्षी दलों की बैठक की औपचारिक शुरुआत से पहले ही सोनिया गांधी और ममता बनर्जी आयोजन स्थल पर पहुंच गयी थीं। दोनों ने आसपास बैठ कर लंबी बातचीत की। तब तक मीटिंग शुरू होने का समय हो गया। जब ममता बनर्जी वहां से उठ कर दूसरी जगह बैठने के लिए जाने लगीं तो सोनिया गांधी ने उनसे अपने पास ही बैठने का अनुरोध किया। 26 विपक्षी दलों की मीटिंग शुरू हुई तो सोनिया गांधी और ममता बनर्जी अगल-बगल बैठी हुईं थीं। यह दृश्य विपक्षी दलों के लिए शुभ संकेत है।

झगड़े के बाद सुलह की कोशिश
पटना में हुए विपक्षी महासम्मेलन के बाद भी तृणमूल और कांग्रेस का संबंध तनावपूर्ण बना रहा। 8 जुलाई को पश्चिम बंगाल में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव हुए थे। इस चुनाव में जबर्दस्त हिंसा हुई जिसमें 12 लोग मारे गये। गैर सरकारी आंकड़ों में ये संख्या अधिक बतायी जा रही है। कई कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मारे जाने का आरोप है। इस हिंसा पर कांग्रेस ने ममता बनर्जी का तीव्र विरोध किया था। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और सांसद अधीर रंजन चौधरी ने कहा था, राज्य में कानून व्यवस्था बिल्कुल खत्म हो गयी है। यहां की स्थिति बहुत तनावपूर्ण और बदतर है। राज्य अराजकता की ओर बढ़ रहा है। इसके बाद तृणमूल और कांग्रेस का संबंध फिर तनावपूर्ण हो गया था। अगर इस कड़वाहट के बीच सोनिया गांधी और ममता बनर्जी एकसाथ बैठने और दिखने के लिए उत्सुक हैं तो जाहिर है वे पुरानी बातों को भूल कर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं। मालूम हो कि राजीव गांधी के जमाने से ही ममता बनर्जी का सोनिया गांधी से करीबी संबंध रहा है।
अभी एकता सिर्फ लोकसभा चुनाव के लिए
कहा जा रहा है कि विपक्ष दल फिलहाल लोकसभा चुनाव के लिए अपनी एकता स्थापित करना चाहते हैं। राज्यों की लड़ाई को फिलहाल इससे दूर रख दिया गया है। जैसे विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस की पश्चिम बंगाल में तृणमूल से, दिल्ली और पंजाब में आप से आमने सामने की लड़ाई है। अगर ये लड़ाई सामने बनी रही तो विपक्षी एकता कभी नहीं हो सकती। अगर विधानसभा चुनाव की राजनीति को अलग रख कर केवल लोकसभा चुनाव की रणनीति पर विचार किया जाय तो हितों का टकराव कम से कम होगा। इसलिए ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल अभी सोनिया गांधी के साथ नजर आ रहे हैं। इनका विश्वास है कि अगर एकता की इस कोशिश से नरेन्द्र मोदी सरकार सत्ता से बाहर हो जाती है तो भविष्य की राजनीति उनके लिए आसान हो जाएगी। इसलिए पहला लक्ष्य 2024 में भाजपा को हराना है। इसके बाद राज्यों की राजनीति तय की जाएगी।
ममता से संबंध सुधारने की सोनिया ने की पहल
कांग्रेस ने भी अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए अभी सोनिया गांधी को आगे कर दिया है। राहुल गांधी की तुलना में सोनिया गांधी ने कम विवादास्पद बयान दिये हैं। वे कम बोलती हैं। अगर कुछ मौकों को छोड़ दिया जाय तो वे सोच समझ कर बोलती हैं। विपक्ष के बड़े नेता सोनिया गांधी का अदब करते हैं। शरद पवार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, एमके स्टालिन जैसे नेता सोनिया गांधी को लेकर सहज रह सकते हैं। इसलिए ममता बनर्जी से संबंध सुधारने की कमान भी सोनिया गांधी ने ही संभाली। इस मुलाकात से विपक्षी एकता को कोशिशों को मजबूती मिलेगी। जैसा कि ममता बनर्जी ने बेंगलुरु में कहा, सब अच्छा है।
विपक्ष के 10 दलों के पास एक भी सांसद नहीं
विपक्षी दलों के कुनबे में दस दल ऐसे हैं जिनका कोई सांसद नहीं। फिलवक्त कांग्रेस के 50 (राहुल गांधी के बाद), डीएमके 24, तृणमूल 23, जदयू 16 सासंद है। यानी मुख्य रूप से विपक्ष की यही बड़ी पार्टियां हैं। शिवसेना और एनसीपी में विभाजन के बाद उनकी स्थिति कमजोर हो चुकी है। इसके बाद चार दलों के तीन-तीन सदस्य। पांच दलों के एक-एक सदस्य हैं। राजद समेत 10 दलों का लोकसभा में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। विपक्ष में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है। ये सच्चाई तो 2019 से मालूम है। लेकिन पहली बार विपक्षी दलों ने इस वास्तविकता को स्वीकार किया है। अगर ये कोशिश कामयाब रही तो भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा होगा जब कांग्रेस के नेतृत्व में देश के 26 दल लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। भारतीय राजनीति के लिए यह ऐतिहासिक घटना होगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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