Opinion poll में कितने झोल! ताजा सर्वे की 'पोल' खोलने वाले 3 सवाल?

Opinion poll 2024: लोकसभा चुनाव करीब है, लिहाजा चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों की भी शुरुआत हो चुकी है। हाल ही में एक बड़े मीडिया ग्रुप ने 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए पूरे देश के लिए सीटों की संभावनाएं बताई हैं।

इंडिया टुडे ग्रुप के 'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे को यूं तो काफी वैज्ञानिक आधार पर तैयार करने की बात सामने आई है। लेकिन, इसको लेकर देश के बहुत ही सामान्य मतदाताओं के नजरिए से कुछ सवाल भी उठ रहे हैं।

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अबकी बार करीब 97 करोड़ मतदाता डालेंगे वोट
चुनाव आयोग के अनुसार आने वाले आम चुनावों में देश में लगभग 97 करोड़ से ज्यादा मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इनमें 47 करोड़ के करीब महिला वोटर हैं। 2 करोड़ से अधिक तो वैसे युवा वोटर हैं, जो पहली बार मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे।

सर्वे में भाग लेने वाले मतदाताओं की संख्या
पहला सवाल ये कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जहां हर कोस पर पानी और चार कोस पर वाणी बदल जाती है, उसके लिए इस ओपनियन पोल में सिर्फ 35,801 वाला सैंपल साइज ही अपने आप में सबसे बड़ा सवाल बन जाता है।

जिस देश में पिछले करीब साढ़े सात दशकों में लोकतंत्र इतना 'मजबूत' हो चुका है कि एक राजनीतिक दल को अपने सांसदों और विधायकों को अपनी बात मनवाने के लिए व्हिप जारी करने के अधिकार के बावजूद भी गच्चा खा जाने का डर बना रहता है, वहां 35-36 हजार सैंपल के आधार पर एक अरब स्वतंत्र वोटरों के मन को पढ़ लेने का दावा करना, सोचने को मजबूर जरूर करता है।

सर्वे का समय
इस सर्वे के लिए जो आंकड़े जुटाए गए हैं, वे 15 दिसंबर, 2023 से लेकर 28 जनवरी, 2024 के बीच के बताए गए हैं। मतलब, इसमें कुछ आंकड़े विपक्षी दलों की दिल्ली में हुई चौथी बैठक (19 दिसंबर, 2023) से भी पहले के हैं।

यह वो समय था जब इंडिया ब्लॉक सत्ताधारी एनडीए को घेरने के लिए काफी मजबूत नजर आ रहा था। लेकिन, उसके बाद विपक्षी गठबंधन धीरे-धीरे बिखरना शुरू हो गया।

इस गठबंधन में अभी तक सीटों के बंटवारे पर स्थिति साफ नहीं हुई है। फिर, उस दौरान जो आंकड़े जुटाए गए, वे कितने विश्वसनीय माने जा सकते हैं? जबकि, अब कम से कम बंगाल, पंजाब और यूपी का समीकरण पूरी तरह से उलट-पुलट हो चुका है।

इसी तरह से एनडीए के सामने उस समय गठबंधन के स्तर पर चुनौतियों का पहाड़ नजर आ रहा था। लेकिन, बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने जिस इंडिया ब्लॉक की अगुवाई शुरू की थी, वह पलटी मारकर बीजेपी के साथ जुड़ चुके हैं। जेडीयू के एनडीए में आने से पहले देश में जुटाए गए आंकड़े, आज कितने भरोसेमंद माने जा सकते हैं।

कुछ राज्यों के आंकड़ों पर प्रश्नचिन्ह
इसका सबसे बड़ा उदाहरण केरल का दिया जा सकता है। इस सर्वे में केरल की सारी की सारी 20 सीटें इंडिया ब्लॉक को जाती हुई दिखाई गई हैं। अगर सर्वे करने वाले की तकनीक इतनी दुरुस्त है तो इसमें सत्ताधारी एलडीएफ और विपक्षी यूडीएफ की सीटें अलग-अलग क्यों नहीं दिखाई गई हैं?

इसी तरह से महाराष्ट्र को लेकर भी सवाल उठते हैं। वहां न तो इंडिया ब्लॉक के सहयोगियों की सीटें तय हो पाई हैं और न ही एनडीए की। जब यही तय नहीं हुआ है कि एनडीए में एनसीपी के लिए बीजेपी और शिवसेना कौन सी सीटें छोड़ने के लिए राजी होगी तो फिर उस सीट पर हार या जीत का अनुमान किस आधार पर लगाया जा सकता है।

बदले समीकरण में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी-शरदचंद्र पवार और कांग्रेस किन-किन सीटों पर लड़ने के लिए राजी होती है, जब यही तय नहीं है तो करीब दो महीने पहले जुटाए गए आंकड़ों से क्या संकेत दिया जा सकता है?

इस लेख से हमारा ये मकसद कतई नहीं है कि हम चुनाव पूर्व अनुमान लगाने वाले विज्ञान पर सवाल उठाएं। सवाल सिर्फ इसके लिए जुटाए गए आंकड़ों के समय और देश में तेजी से बदल चुके चुनावी समीकरणों के साथ उसकी तालमेल को लेकर है।

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