OPINION: तेलंगाना में सरकारी स्कूल बेहतर हुए हैं, कॉर्पोरेट स्कूलों पर भारी पड़ रहे हैं

तेलंगाना में सरकारी स्कूलों का ऐसा कायाकल्प हुआ है कि इसके प्रति लोगों का नजरिया ही बदल गया है। पहले यह धारणा बनी हुई थी कि सरकारी स्कूल सिर्फ गरीबों के बच्चों के लिए होते हैं। लेकिन, अब सोच बदल चुकी है। लाखों रुपए की सैलरी पाने वाले सॉफ्टवेयर कर्मचारी भी आज अपने बच्चों के दाखिले के लिए सरकारी स्कूलों को प्राथमिकता देने लगे हैं।

इसके पीछे की वजह ये है कि तेलंगाना सरकार राज्य के सरकारी स्कूलों के लिए 'माना ऊरु - माना बाड़ी' कार्यक्रम चला रही है। अब लोगों में यह विश्वास पैदा हुआ है कि सरकारी स्कूल प्राइवेट स्कूलों की तुलना में किसी भी बात में कमतर नहीं हैं।

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बदल रहा है सरकारी स्कूलों का रुतबा
आज की तारीख में स्थिति ऐसी हो चुकी है कि हैदराबाद के महंगे माने जाने वाले इलाकों में भी सरकारी स्कूलों का रुतबा बदल चुका है। मणिकोंडा, राजेंद्र नगर, सेरिलिंगमपल्ली, गंडिपेट, गाचीबोवली जैसे इलाकों में भी साल-दर-साल दाखिले बढ़ते जा रहे हैं। ये सारे वैसे इलाके हैं, जहां तमाम आईटी और अंतरराष्ट्रीय कंपनियां स्थापित हुई हैं और हो रही हैं। इन इलाकों में रहने वाले लोगों के बारे में कहा जाता है कि उनके पास पैसों की कोई कमी नहीं है।

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लाखों रुपए की सैलरी वाले भी दे रहे हैं प्राथमिकता
जो लोग अपने बच्चों की पढ़ाई पर लाखों रुपए खर्च करने में सक्षम हैं, वह भी सरकारी स्कूलों में उनके दाखिले के लिए लालायित रहते हैं। अपने इलाके के सरकारी स्कूल में बच्चों को एडमिशन मिल जाए, इसके लिए एमएलए, सांसद, आईएएस या आईपीएस अधिकारियों से भी सिफारिश करवाने की कोशिशें करते हैं। हेडमास्टरों के लिए चुनौती बढ़ गई है कि वह किस बच्चे का दाखिला लें या किसे किसी दूसरे स्कूल में प्रयास करने को कहें। उन्हें इस चुनौती से निपटने के लिए स्क्रीनिंग और टेस्ट लेने की जरूरत पड़ने लगी है।

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आईटी कॉरिडोर के सरकारी स्कूलों में भी दाखिले की दौड़
आज हालात ऐसे हैं कि आईटी कॉरिडोर वाले इलाकों के कई स्कूलों में क्लास 6 से लेकर 10 तक एक हजार से भी ज्यादा बच्चे हो गए हैं। प्राइमरी स्कूलों की भी स्थिति इसी तरह की हो चुकी है। 500 से भी ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं। सरकारी स्कूलों में अब सुविधाएं ही इतनी बढ़ चुकी हैं कि प्राइवेट स्कूलों से माइग्रेशन में भारी बढ़ोतरी हो चुकी है। बड़ी बात ये है कि सरकारी स्कूलों में किताबें, नोटबुक, यूनिफॉर्म भी मुफ्त दिए जाते हैं और ऊपर से मिड-डे मील भी उपलब्ध करवाई जाती है।

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कॉर्पोरेट स्कूलों की तरह चमक रहे हैं सरकारी स्कूल
सरकारी स्कूलों में दाखिला बढ़ाने के लिए 'बड़ी बाटा' अभियान भी खत्म हो चुका है, लेकिन दाखिले के लिए सिफारिशें कम नहीं हो रही हैं। 'माना ऊरु - माना बाडी' योजना से सरकारी स्कूल आज कॉर्पोरेट स्कूलों की तरह से चमकने लगे हैं। इंग्लिश मीडियम की सुविधा होने से माता-पिता सरकारी स्कूलों को ही प्राथमिकता दे रहे हैं। यह पूरे आईटी कॉरिडोर में देखा जा सकता है।

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इस शैक्षणिक सत्र में मणिकोंडा के जिला परिषद हाई स्कूल में 331 नए छात्रों ने दाखिला लिया है। इनमें से 40 प्राइवेट स्कूलों से माइग्रेशन लेकर आए हैं। सेरिलिंगमपल्ली मंडल में 47 प्राइमिरी और सेकेंडरी स्कूल और 12 जिला परिषद हाई स्कूल हैं। इन सभी 59 सरकारी स्कूलों में एडमिशनों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है।

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आलम ये है कि इन स्कूलों में 6ठी से लेकर 10वीं कक्षा तक प्रत्येक में तीन-तीन सेक्शन चलाने पड़ रहे हैं। पहले प्राइमरी स्कूल जिला परिषद स्कूल में ही चलते थे। लेकिन, कमरों की संख्या कम पड़ गई है, जिसके चलते उन्हें दूसरी जगहों से चलाया जा रहा है। क्लासरूम में डिजिटल शिक्षा दी जा रही है। अटल टिंकरिंग लैब, स्टेम लैब, कंप्यूटर लैब जैसी अत्याधुनिक शिक्षा की वजह से प्रतिदिन सरकारी स्कूलों में दाखिले की कतार बढ़ती जा रही है।

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