• search
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

Operation Blue Star: सियासत और धर्म के बीच टकराव की कहानी

By Rizwan
|

नई दिल्ली। ऑपरेशन ब्लू स्टार अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में 3 से 6 जून 1984 तक चला था। इस पूरे घटना क्रम को 34 साल हो रहे हैं लेकिन अभी भी ये पंजाब की राजनीति में बहुत पुराना नहीं हुआ है। ऑपरेशन ब्लू स्टार के पीछे मौटे तौर पर भिंडरावाला की अलग खालिस्तान की मांग और इसके समर्थकों का स्वर्ण मंदिर में अड्डा बना लेना माना जाता है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में देश के भीतर सबसे बड़ी सैन्य कार्रवाई में गिना जाता है, लेकिन क्या ये सब कोई एक दिन में तैयार नहीं हुआ था कई सालों से चल रह राजनीति और हिंसक आंदोलन इसके पीछे थे।

Operation Blue Star: Politics behind the whole issue

पंजाब में अलगाव की शुरुआत 1970 के दशक से अकाली राजनीति में खींचतान और अकालियों की पंजाब संबंधित मांगों को लेकर शुरु हुई थी। पहले साल 1973 में और फिर 1978 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया। मूल प्रस्ताव में सुझाया गया था कि भारत की केंद्र सरकार का केवल रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा पर अधिकार हो जबकि अन्य विषयों पर राज्यों को पूर्ण अधिकार हों। अकाली ये भी चाहते थे कि भारत के उत्तरी क्षेत्र में उन्हें स्वायत्तता मिले।

यही वह वक्त भी था जब पंजाब में अकाली दल कांग्रेस का विकल्प बनकर उभर चुका था, इंदिरा गांधी ने इसके जवाब के तौर पर सरदार ज्ञानी जैल सिंह को पंजाब के मुख्यमंत्री के तौर पर खड़ा किया। जैल सिंह का बस एक ही मकसद था-शिरोमणि अकाली दल का सिखों की राजनीति में वर्चस्व कम करना। इन सब हालात के बीच एक शख्स का उदय हुआ जिसका नाम था जरनैल सिंह भिंडरावाले, जिसे पहले अकाली दल के काट के लिए लाया गया था लेकिन बाद में वो सरकार के लिए चुनौती बन गया।

जैल सिंह और दरबारा सिंह ने उसे आगे बढ़ाया और उस पर जब संजय गांधी का हाथ हो गया तो वो पंजाब का अघोषित मुखिया बन बैठा था लेकिन तब तक सरकार ने ये नहीं सोचा था कि जिसको वो समर्थन दे रहे हैं वो ही एक दिन फिजा में जहर घोलेगा और आतंकवाद का रास्ता अपना लेगा। धीरे-धीरे उसने काफी लोकप्रियता हासिल कर ली थी । 1977 में उसे दमदमी टकसाल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। इस बीच अमृतसर में 13 अप्रैल 1978 को अकाली कार्यकर्ताओं और निरंकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई जिसमें 13 अकाली कार्यकर्ता मारे गए। इस झड़प के बाद 24 अप्रैल 1980 को निरंकारियों के प्रमुख बाबा गुरबचन सिंह की हत्या कर दी गई, नामजद ज्यादातर लोगों का ताल्लुक भिंडरावाले से था।

इंदिरा गांधी को 1980 के चुनाव में जबरदस्त जीत मिली, लोकसभा की 529 सीटों में से कांग्रेस को 351 सीटें मिलीं। ज्ञानी जैल सिंह को प्राधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गृह मंत्री बनाया, पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकाली दल को पछाड़ा। पंजाब में दरबारा सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद अकालियों और दरबारा सिंह सरकार में तनातनी चलने लगी थी। जनगणना का दौर था और लोगों से उनके धर्म और भाषा पूछी जाती थी, इस दौर में अखबार पंजाब केसरी ने हिंदी को लेकर मुहिम चला दी, जिससे माहौल और खराब हो गया, हिंदी की मुहिम से कट्टर सिख नाराज हो गए, जिनमें भिंडरावाले भी थे और यहीं से इंदिरा गांधी के फैसले का विरोध शुरू हुआ।

9 सितंबर 1981 को हथियार बन्द लोगों ने पंजाब केसरी के संपादक लाला जगत नारायण को गोली मार दी, इल्जाम जरनैल सिंह भिंडरावाले पर भी आया। लाला जगत नारायण की हत्या के बाद 15 सितंबर को अमृतसर के गुरूद्वारा गुरुदर्शन प्रकाश से भिंडरावाले को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन सबूतों के अभाव में जमानत मिल गई। इस दौरान पंजाब को अलग देश बनाने की मांग ने जोर पकड़ लिया। हिंसा के उस दौर में पंजाब के डीआईजी एएस अटवाल की हत्या स्वर्ण मंदिर के सीढ़ियों पर कर दी गई, एएस अटवाल की लाश घंटों स्वर्ण मंदिर के सीढियों पर पड़ी रही, उनके शव को हटाने के लिए मुख्यमंत्री दरबारा सिंह को जरनैल सिंह भिंडरावाले से मिन्नत करनी पड़ी थी।

पंजाब में हालात विस्फोटक होते जा रहे थे, अकाली भी विरोध कर बैठे उनकी मांग थी अनंतपुर साहब के रिजॉलूशन को पास करो, इसी बीच 5 अक्टूबर, 1983 को सिख चरमपंथियों ने कपूरथला से जालंधर जा रही बस को रोक लिया, बस में सवार हिन्दू यात्रियों को चुन-चुन कर मार डाला गया, पता चला कि इन चरमपथियों को पाकिस्तान से समर्थन मिल रहा है। इस घटना के अगले दिन इंदिरा गांधी ने दरबारा सिंह की सरकार को हटा दिया और पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगा दिया लेकिन इसके बाद भी पंजाब में हिंसा, मार-काट जारी रहा, इंदिरा गांधी भिंडरावाले के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठा पा रही थीं।

15 दिसंबर, 1983 को भिंडरावाले ने अपने हथियार बंद साथियों के साथ स्वर्ण मंदिर के अकाल तख्त पर कब्जा कर लिया। आपको बता दें कि अकालतख्त का मतलब एक ऐसा सिंहासन जो अनंतकाल के लिए बना हो। भिंडरावाले चाहते थे कि हिन्दू पंजाब छोड़ कर चले जाएं, ये सीधे-सीधे दिल्ली सरकार को चुनौती थी, इंदिरा गांधी ने इसी दौरान एक बड़ा फैसला लिया और उन्होंने 1 जून, 1984 को पंजाब को सेना के हवाले कर दिया, जिसका कोड वर्ड रखा गया 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' ।

'ऑपरेशन ब्लू स्टार' की अगुवाई मेजर जनरल कुलदीप सिंह बरार ने की 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' की अगुवाई मेजर जनरल कुलदीप सिंह बरार को सौंपी गई, 3 जून को अमृतसर से पत्रकारों को बहार कर दिया गया. पाकिस्तान से लगती सीमा को सील कर दिया गया, मंदिर परिसर में रह रहे लोगों को बाहर आने को कहा गया, 5 जून को 7 बजे तक सिर्फ 129 लोग ही बाहर आए, लोगों ने बताया कि भिंडरावाले के लोग बाहर आने से रोक रहे हैं। 5 जून, 1984 को शाम 7 बजे सेना की कार्यवाई शुरू हुई, रात भर दोनों तरफ से गोली बारी होती रही। फायरिंग में चली कई गोलीयां हरिमंदिर साहिब की तरफ भी गई, अकालतख्त को भी भारी नुकसान हुआ। 6 जून की देर रात जरनैल सिंह भिंडरावाले की लाश सेना को मिली, 7 जून की सुबह ऑप्रेशन ब्लू स्टार' खत्म हो गया। हालांकि इसका नतीजा दिल्ली में इंदिरा गांधी की हत्या और सिख विरोधी दंगों के रूप में निकल कर आया। ऑपरेशन के कई सालों बाद जाकर पंजाब में जनजीवन पटरी पर लौटा।

अधिक पंजाब समाचारView All

जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
Operation Blue Star: Politics behind the whole issue
For Daily Alerts

Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X
We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Oneindia sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Oneindia website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more