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One Nation One Election: 'एक राष्ट्र एक चुनाव' के फायदे और नुकसान क्या होंगे?

'एक राष्ट्र एक चुनाव' की संभावनाओं पर विचार करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से समिति गठित करने को लेकर एक नई राजनीतिक बहस छिड़ी हुई है। दरअसल, जब से मोदी सरकार ने 18 सितंबर से संसद का 5 दिवसीय विशेष सत्र बुलाया है, विपक्ष इसे 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले की नौटंकी बताने की कोशिश कर रहा है।

बहरहाल राजनीतिक बहसबाजी से अलग एक आम भारतीय नागरिक को यह जानने का अधिकार है कि अगर 'एक राष्ट्र एक चुनाव' पर चर्चा के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अगुवाई में समिति बनाई गई है तो इसकी गंभीरता कितनी ज्यादा है। इसलिए यह भी जानना जरूरी है कि इससे किस तरह के फायदे हो सकते हैं और किस तरह के संभावित नुकसान भी इससे जुड़े होंगे।

 one nation one election advantages and disadvantages

अलग-अलग चुनावों की शुरुआत कब हुई?
सबसे पहले हमें एक तथ्य यह मालूम होना चाहिए कि एक साथ चुनाव कोई अचानक पैदा हुआ विचार नहीं है। 1967 तक देश में राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव एक साथ ही करवाए जाते रहे। 1968 और 1969 में देश की कुछ राज्य विधानसभाओं को तत्कालीन शासन की ओर से समय से पहले ही भंग कर दिया गया था। जबकि, लोकसभा 1970 में भंग हुआ। यहीं से देश में राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के आम चुनाव अलग-अलग होने शुरू हो गए।

एक साथ चुनाव करवाने के फायदे:-

देश का खजाना बचेगा
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया बहुत ही ज्यादा खर्चीला है। अगर राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव एक साथ करवाए जाते हैं तो इन खर्चों में बहुत ही ज्यादा कमी होने की उम्मीद है। इससे देश के खजाने पर पड़ने वाला बहुत बड़ा आर्थिक बोझ घट जाएगा। लगभग एक ही खर्च में दो चुनावों का खर्च निकल सकता है।

समय की बचत और शासन पर फोकस
आज की तारीख में आए दिन देश के किसी न किसी भाग में चुनाव का काम चलता ही रहता है। इससे विकास की प्रक्रियाएं तो बाधित होती ही हैं, सरकारों का ध्यान भी शासन की जगह चुनावों में ही लगा रहता है। एकसाथ चुनाव होने से समय की बजत होगी और चुनाव प्रक्रिया खत्म होने के बाद नई सरकारों का पूरा फोकस विकास और शासन पर रहेगा।

सरकारों की स्थिरता
देश में कई बार सरकारों के पास बहुमत सीमित होती है। इसका परिणाम ये होता है कि ऐसी सरकारें जनता और विकास पर फोकस करने की जगह खुद को बचाने में ही समय निकाल देती है। ऐसे में विधि आयोग सिफारिश कर चुका है कि अगर विपक्ष किसी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाता है तो उसे साथ के साथ वैकल्पिक सरकार के लिए विश्वास प्रस्ताव भी लाना चाहिए।

मतलब, किसी सरकार को तभी सत्ता से बेदखल होना पड़ेगा, जब वैकल्पिक सरकार बनने की स्थिति हो। इससे जनता पर बेवजह के चुनाव का बोझ नहीं पड़ेगा। चुनाव निर्धारित समय पर ही हो सकेंगे।

एक साथ चुनाव करवाने के नुकसान:-

चुनावी उपकरणों पर भारी निवेश
ईवीएम और इससे जुड़े तमाम इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की उम्र करीब 15 साल की बताई जाती है। ऐसे में एक बार चुनाव करवाने पर इन्हें करीब तीन चुनावों में ही इस्तेमाल किया जा सकता है। उसके बाद नए उपकरणों में निवेश करना होगा।

हर तीन चुनाव के बाद बड़ा खर्च
दूसरी बात ये है कि अभी देश में करीब 10 लाख पोलिंग बूथ हैं। अगर एक ही साथ चुनाव करवाए जाते हैं तो इन उपकरणों की संख्या दोगुनी से भी ज्यादा रखनी होगी। क्योंकि, अभी भी 20 से 40% उपकरण रिजर्व में रखने का प्रावधान है। अभी सिर्फ लोकसभा चुनाव ही एक साथ होते हैं। बाकी राज्यों में अलग-अलग चुनाव होने से इतने उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती। एक अनुमान के मुताबिक इतनी संख्या में ईवीएम और अन्य उपकरणों के इंतजाम के लिए करीब 9 हजार करोड़ से भी ज्यादा की रकम चाहिए; और हर 15 साल में इसी हिसाब से अतिरिक्त लागत आने की संभावना रहेगी।

अगर चुनावों के बाद कोई विधानसभा त्रिशंकु रह जाती है या वहां किसी भी नई सरकार के गठन की संभावना नहीं रहती तो क्या होगा? क्योंकि अगले 5 साल तक तो राष्ट्रपति शासन नहीं रह सकता। यह स्थिति लोकसभा चुनावों में भी हो सकती है।

इसी तरह से संविधान में आर्टिकल 356 का भी प्रावधान है, जिसमें केंद्र सरकार को यह अधिकार है कि किसी राज्य का शासन संविधान के दायरे मे रहकर चलाना मुश्किल हो रहा हो तो वह राष्ट्रपति शासन लगा सकता है। यह व्यवस्था सिर्फ 6 महीने के लिए हो सकती है।

लेकिन, वन नेशन वन इलेक्शन के बाद क्या होगा? अगर वहां फिर से चुनाव करवाया गया और कुछ ही समय बाद 'एक राष्ट्र एक चुनाव' के तहत निर्धारित चुनाव हुए तो उस राज्य में फिर से चुनाव करवाना पड़ सकता है। इससे बेवजह का खर्च बढ़ेगा और इस विचार का मूल मकसद ही बेकार हो सकता है।

एक राष्ट्र एक चुनाव का एक नुकसान ये हो सकता है कि वोटर इसमें या तो राष्ट्रीय मुद्दों की ओर झुक सकता है या फिर क्षेत्रीय मुद्दों की ओर बहाव में बह सकता है। इससे या तो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों को फायदा हो सकता है या फिर राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा ही अजीब जनादेश देखने को मिल सकता है, जिससे राष्ट्रहित को भी नुकसान पहुंच सकता है।

हो सकता है कि किसी समय में देश में कोई बहुत ही प्रभावी नेतृत्व हो और उसकी ओर रुझान इस तरह का हो कि एक ही चेहरे पर वोटरों का ध्यान सीमित हो जाए तो इससे एक हाथ में असीमित अधिकार आने की आशंका पैदा हो सकती है।

'एक राष्ट्र एक चुनाव' वाली समिति के सदस्य
केंद्र सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अगुवाई में इन सब सवालों पर विचार करने के लिए जो समिति बनाई है, उसमें केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, राज्यसभा में विपक्ष के पूर्व नेता गुलाम नबी आजाद, वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष एनके सिंह, लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान के विशेषज्ञ सुभाष सी कश्यप, वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे और पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त संजय कोठारी शामिल हैं। कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल इसके विशेष आमंत्रित सदस्य होंगे और कानून सचिव नितेन चंद्रा इस समिति के भी सचिव होंगे।

इस पैनल में लोकसभा में कांग्रेस के नेता सदन अधीर रंजन चौधरी का भी नाम शामिल किया गया है, लेकिन उन्होंने राजनीतिक वजहों से इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया है।

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