Opposition alliance: बंगाल में रास्ता क्यों नहीं है आसान?

26 विपक्षी दलों के INDIA गठबंधन के सामने पश्चिम बंगाल में बड़ी अजीब सी स्थिति पैदा हुई है। यहां पंचायत चुनाव को लेकर पिछले एक महीने से तृणमूल, कांग्रेस और लेफ्ट के बीच भयानक लड़ाई मची हुई है। लेकिन, तीनों की लीडरशिप ने अब लोकसभा चुनावों में एकजुट होने का फैसला कर लिया है।

सवाल यही उठ रहे हैं कि पंचायत चुनाव में भयानक हिंसा के बाद जिस तरह से इन पार्टियों के जमीनी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच भयंकर तनाव है,एक-दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए है, उन्हें 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए सबकुछ भुलाकर एक होने के लिए मना लेना कितना आसान है।

problem with opposition india in bengal

नहीं तो मिल सकता है भाजपा को फायदा- एक्सपर्ट
बंगाल की सीपीएम लीडरशिप का दावा है कि वह केरल मॉडल अपनाएगी और बंगाल में तृणमूल के खिलाफ लड़ेगी, लेकिन केंद्र में विपक्षी गठबंधन का हिस्सा रहेगी। लेकिन, चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि इन सभी दलों को राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन को लेकर अपने जमीनी कार्यकर्ताओं और वोटरों को समझाना होगा, नहीं तो फायदा बीजेपी को मिल सकता है।

बंगाल में सीपीएम के लिए अच्छा नहीं होगा गठबंधन- चुनाव विश्लेषक
सीपीएम के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम के मुताबिक 'पार्टी का रुख पार्टी कांग्रेस में तय होता है। 2015 से ही हमारा स्टैंड रहा है, देश में बीजेपी को हराना और राज्य में तृणमूल को।' लेकिन, राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार सीपीएम के लिए बंगाल में गठबंधन अच्छा साबित नहीं होगा।

गठबंधन से वोट जुड़ने की गारंटी नहीं- चुनाव एक्सपर्ट
एक राजनीतिक विश्लेषक सुभमोय मैत्रा ने ईटी से बातचीत में कहा है, 'जब राजनीतिक पार्टियां साथ आती हैं तो जरूरी नहीं है कि वोट भी जुड़ जाता है। कई बार इसकी वजह से वोटों में कमी हो जाती है। अगर एक चुनाव क्षेत्र में सीपीआईएम, कांग्रेस, टीएमसी और बीजेपी चुनाव लड़ रहे हैं और यदि सीपीएम-कांग्रेस में गठबंधन है, तब सीपीएम-विरोधी कांग्रेस समर्थकों का वोट टीएमसी में जाएगा और इस तरह से गठबंधन का नतीजा नकारात्मक रहेगा। राजनीतिक अंकगणित इसी तरह काम करता है और वोटों में कमी अक्सर खतरनाक होता है।'

सीपीएम को नहीं होगा फायदा- एक्सपर्ट
उनके मुताबिक बंगाल में 2021 के बाद सीपीएम के वोट शेयर बढ़ने के स्पष्ट संकेत हैं। ऐसे में अगर पार्टी कैडर को नए गठबंधन के बारे में समझाने में सफल हो भी गए तो भी वोटरों को अपनी बात से कैसे सहमत कर सकेगी। उन्होंने कहा है कि 'हाल के पंचायत चुनाव में हिंसा और बवाल के बावजूद सीपीएम का वोट शेयर बढ़ने के स्पष्ट संकेत हैं। लेकिन, नए गठबंधन से सीपीएम को कोई फायदा नहीं होगा।'

अभी कुछ भी कहना बहुत मुश्किल है- बंगाल के कांग्रेस नेता
शायद यही वजह है कि बंगाल के समीकरण को लेकर कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व भी अभी कुछ भी कहने के लिए तैयार नहीं है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और राजसभा सांसद प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा, 'इस समय पार्टी के अंतिम निर्णय के बारे में कुछ भी कहना बहुत मुश्किल है। अभी तक यह क्रिस्टलाइज्ड नहीं हुआ है। इसमें थोड़ा समय लगेगा। दूसरी बात कि हमें यह बात दिमाग में रखना होगा कि यह एक राष्ट्रीय मुद्दा है।'

भाजपा को मिल सकता है बदले समीकरण का फायदा
उन्होंने यह भी कहा कि 'बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य केरल से थोड़ा अलग है। ऐसी ही स्थिति अन्य राज्यों में भी है। हमें चर्चा करनी होगी और देखना होगा कि इसका कैसे हल निकाला जा सकता है।' इस बात में अब कोई दो राय नहीं रह गई है कि बंगाल में अब बीजेपी ही मुख्य विपक्षी पार्टी है। अगर केंद्र के लिए अलग और राज्य के लिए अलग नजरिए के साथ विपक्षी गठबंधन यहां चुनाव लड़ेंगे तो बीजेपी को इसका परोक्ष लाभ मिलने की पूरी संभावना बनी रहेगी।

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