बिजनौर: CAA हिंसा में मारे गए युवक की कांग्रेस प्रत्याशी मां का पर्चा क्यों हुआ ख़ारिज?

नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) और एनआरसी को लेकर दिसंबर 2019 में हुई हिंसा में उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले के नहटौर क़स्बे के 21 साल के युवक सुलेमान की मौत हो गई थी.

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उन्हीं सुलेमान की मां अकबरी बेगम को कांग्रेस पार्टी ने बिजनौर सदर विधानसभा सीट से अपना प्रत्याशी बनाया था, लेकिन शनिवार को उनका पर्चा निरस्त कर दिया गया.

बिजनौर कलेक्ट्रेट में 21 से 28 जनवरी तक नामांकन प्रक्रिया चली. अकबरी बेगम ने 27 जनवरी को अपना पर्चा दाख़िल किया. बीते शनिवार को नामांकन पत्रों की जाँच हुई, जिसके बाद अकबरी बेगम का पर्चा निरस्त कर दिया गया.

बिजनौर विधानसभा के रिटर्निंग ऑफ़िसर, ज्वाइंट मजिस्ट्रेट विक्रमादित्य सिंह ने मीडिया को बताया कि कांग्रेस प्रत्याशी अकबरी बेगम के सिंबल फ़ॉर्म बी पर पार्टी की तरफ़ से हस्ताक्षर नहीं थे. इसी कमी के चलते उनका पर्चा निरस्त कर दिया गया.

हालांकि कांग्रेस के ज़िलाध्यक्ष शेरबाज़ पठान ने बीबीसी से कहा, "पर्चे में दो फ़ॉर्म होते हैं, एक ए और दूसरा बी. इसमें ए फ़ॉर्म पर हस्ताक्षर तो अनिवार्य होते हैं, जबकि बी फ़ॉर्म पर हस्ताक्षर अनिवार्य नहीं होते. लेकिन प्रशासन ने बी फ़ॉर्म पर हस्ताक्षर भी अनिवार्य तौर पर माँगा."

शेरबाज़ यह बात मानते हैं कि बी फ़ॉर्म पर हस्ताक्षर नहीं थे. लेकिन उनके अनुसार, "इसमें कोई विशेष कमी नहीं थी. ये कमी ज़बरदस्ती पैदा की गई है. प्रशासन पॉलिटिकल दबाव में था."

'मेरे बेटे पर जो ज़ुल्म हुआ किसी और पर न हो'

अकबरी बेगम को पार्टी की ओर से बिजनौर सदर विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाये जाने पर ज़िलाध्यक्ष शेरबाज़ पठान ने बीबीसी से कहा, "पार्टी मुखिया मानती हैं कि एक पीड़ित ही पीड़ित की समस्या जान सकता है. प्रियंका जी ने भी अपनों को खोने का दुख वर्षों पहले झेला है, इसलिए पीड़ितों को ताक़त मिलनी चाहिए. ये लोग ही आगे चलकर दुखियारों की आवाज़ बनते हैं."

अकबरी बेगम नहटौर क़स्बे की रहने वाली हैं. ऐसे में उन्हें नज़दीकी नहटौर और या फिर धामपुर विधानसभा सीट से उन्हें टिकट क्यों नहीं दिया गया, इस सवाल के जवाब में शेरबाज़ कहते हैं, "नहटौर विधानसभा सीट आरक्षित सीट है. धामपुर विधानसभा के स्थान पर अकबरी बेगम को बिजनौर सदर सीट से इसलिए चेहरा बनाया गया था, क्योंकि सीएए और एनआरसी मामले में बिजनौर के युवाओं पर ज़ुल्म हुए थे."

कांग्रेस पार्टी से प्रत्याशी बनाए जाने पर अकबरी बेगम प्रियंका गांधी की प्रशंसा करती हैं. वो कहती हैं, "जब मेरे बेटे सुलेमान की गोली लगने से मौत हुई थी, उस वक़्त प्रियंका जी हमारे घर पहुँची थीं और मुझे ढाढस बंधाया था. मैं वो वक़्त कभी नहीं भूल सकती. उन्होंने मुझे पार्टी प्रत्याशी बना ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए प्रेरित भी किया था, पर मेरा पर्चा ही ख़ारिज़ कर दिया गया. लेकिन बेटे के इंसाफ़ के लिए हमारी लड़ाई जारी रहेगी."

भाई की मौत के बाद मेरी पढ़ाई रुक गई

अकबरी बेगम के परिवार में उनके पति ज़ाहिद हुसैन के अलावा चार बेटियां और दो बेटे हैं. परिवार की आय का स्रोत लगभग 10 बीघा जंगल की भूमि है, जिसमें पैदा होने वाली फ़सल परिवार के ख़र्चे के लिए नाकाफ़ी होती है.

बड़ा बेटा ज़िले में ही छोटी-मोटी नौकरी करते हैं, जबकि उनसे छोटे भाई सलमान मस्जिद में इमाम हैं. चार बहनों में बड़ी बहन की शादी हो गई है जबकि उनसे छोटी बहन सना बीएससी कर चुकी हैं.

वह कहती हैं, "जो हमारे साथ हुआ किसी के साथ न हो. भाई को याद कर दिल बार-बार तड़प उठता है. भाई की मौत के बाद मेरा हौसला टूट गया. पैसों की क़िल्लत से परिवार जूझ रहा है. ऐसे में पढ़ाई जारी रखना मुश्किल हो गया है."

पास में ही बैठी छोटी बहन अर्शी कहती हैं, "मैं बीए कर रही हूं. जो हालात देखे हैं, कोई मदद को नहीं आया. घर वालों ने भाई खोया और परेशानियां झेलीं. इसे देखकर मैंने वकील बनने की ठानी है, जिससे कि बेसहारा और ग़रीबों की मदद कर सकूं."

सबसे छोटी बहन इलमा अभी कक्षा आठ में ही पढ़ रही हैं. पास में ही अकबरी बेगम की बहू गौहर बानो भी बैठी हुई हैं.

गौहर बानो कहती हैं, "मैं घर की बहू भले ही हूं, लेकिन अम्मा की बेटी से कम नहीं हू. जब उन्हें पार्टी की तरफ़ से टिकट देने की पेशकश हुई तो हम लोगों ने अम्मा को चुनाव लड़ने के लिए मनाया. उनसे कहा कि घर के कामकाज और दूसरी ज़िम्मेदारियों को हम ख़ुद देख लेंगे, पर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था."

सुलेमान के बड़े भाई मस्जिद में इमाम सलमान कहते हैं, "सुलेमान की मौत के बाद केस लड़ रहे हैं. कहीं से कोई मदद नहीं है. हमारा भाई यूपीएससी की तैयारी कर रहा था. वह पढ़ने में काफ़ी होशियार था. उसने 10वीं और 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी में डिस्टिंक्शन मार्क्स के साथ पास की थी."

सुलेमान के पिता बेटे को याद कर काफ़ी भावुक हो जाते हैं. वह कहते हैं, "मेरा बेटा अगर आज ज़िंदा होता, तो शायद किसी न किसी बड़े ओहदे पर होता. वह पढ़ने में बहुत होशियार था, लेकिन ज़ालिमों ने उसे मार दिया. ऐसे वक़्त में प्रियंका जी ने हमारे दर्द को समझा था. उन्होंने टिकट देकर हमारे परिवार को इंसाफ़ की लड़ाई लड़ने के लिए प्रेरित किया था, लेकिन पर्चा निरस्त होने पर हमें बहुत अफ़सोस है."

क्या हुआ सुलेमान की मौत के दिन

साल 2019 और तारीख़ थी 20 दिसंबर. नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी को लेकर देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे. उत्तर प्रदेश के ज़िला बिजनौर का क़स्बा नहटौर भी इस विरोध प्रदर्शन से अछूता नहीं था.

जुमे की नमाज़ के बाद जब यहां से लोग नमाज़ पढ़ कर बाहर निकले तो कुछ समय बाद ही पुलिस और भीड़ की मुठभेड़ हुई. इसमें क़स्बे के दो युवाओं की गोली लगने से मौत हो गई. मरने वालों की पहचान 21 वर्षीय सुलेमान और 22 वर्षीय अनस के रूप में हुई.

सुलेमान के भाई शोएब कहते हैं, "20 दिसंबर, 2019 को जब मेरा भाई सुलेमान जुमे की नमाज़ पढ़कर मस्जिद से निकला तो कुछ पुलिसकर्मियों ने उसे उठा लिया था. क़रीब 100 मीटर की दूरी पर घास मंडी के निकट ले जाकर उसे गोली मार दी गई थी."

सुलेमान के भाई के अनुसार, उन्होंने प्रदेश के सभी पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा सीएम और पीएम कार्यालय में भी शिकायत की थी, लेकिन उन्हें आज तक कोई इंसाफ़ नहीं मिला. मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है.

हालांकि पुलिस की ओर से कहा गया था कि स्वाट टीम का एक कॉन्स्टेबल जब छिनी हुई पिस्तौल को बरामद करने के लिए आगे बढ़ा, तो भीड़ के एक उपद्रवी ने गोली चला दी. वो बाल-बाल बचा. जवाबी आत्मरक्षा फ़ायर में उस उपद्रवी को गोली लगी. बाद में पता लगा कि उस घायल को उसके साथी वहां से उठाकर ले गए थे. उसका नाम सुलेमान था और उसकी मौत हो गई थी.

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