निकाह को कोई नहीं राज़ी, क्या करें महिला क़ाज़ी?

जयपुर की क़ाज़ी जहांआरा और अफ़रोज़ तीन तलाक़, निकाह, हलाला और शौहर द्वारा घर से निकाल देने जैसे तमाम मसलों पर राय देती हैं. मगर इन्हें उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार है जब वे पहला निकाह पढ़वाएंगी.

भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की पहल पर दारुल-उलूम-निस्वान, मुंबई ने पिछले साल 30 मुस्लिम महिलाओं को क़ाज़ी की ट्रेनिंग दी थी.

ट्रेनिंग के बाद 18 मुस्लिम महिलाओं ने पिछले साल फरवरी में क़ाज़ी का इम्तिहान पास किया था. इनमें से 15 ने इस साल प्रैक्टिकल भी पास किया. इनमें जहांआरा और अफ़रोज़ भी शामिल थीं.

दबदबा पुरुष क़ाज़ियों का

मगर क़ाज़ी के इम्तिहान और ट्रेनिंग में अव्वल आने के बावजूद अभी तक समाज ने उनकी काबिलियत पर मुहर नहीं लगाई है.

मुस्लिम समुदाय में पारंपरिक रूप से अभी तक पुरुष क़ाज़ी ही निकाह पढ़वाते आए हैं.

अब तक एक भी अर्ज़ी नहीं आई

नेशनल वूमेन वेल्फेयर सोसाइटी की अध्यक्ष निशात हुसैन ने बीबीसी को बताया, "महिला क़ाज़ियों से निकाह पढ़वाने की एक भी अर्ज़ी उनके दफ्तर में नहीं पहुंची है. जयपुर ही नहीं, देश के दूसरे हिस्सों में भी महिला क़ाज़ियों को अभी तक निकाह पढ़वाने का बुलावा नहीं मिला है."

क़ाज़ी अफ़रोज़ कहती हैं, "देखा जाए तो कुरान शरीफ़ में ये मुद्दा है ही नहीं कि निकाह आदमी पढ़वाए या औरत. मगर रूढ़िवादी सोच वाले लोगों को डर है कि महिलाएं क़ाज़ी के तौर पर काम करने लगेंगी तो पहले से काबिज लोगों का दबदबा ख़त्म हो जाएगा."

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क़ाज़ी जहांआरा कहती हैं, "हालांकि कई लोगों ने कहा है कि उनके घर में कोई शादी होगी तो उन्हें बुलवाएंगे. पर हर कोई यह सोचता है कि पहल मैं नहीं करूं, कोई और करे. वे सोचते हैं कि पहला कदम कोई और उठाएगा तो मैं भी साथ चल लूंगा और कहूं कि देखो, उन्होंने भी तो ऐसा किया था."

नियम बन रहा है बाधा

दारुल-उलूम-निस्वान ने एक मॉडल निकाहनामा भी तैयार किया है जिसमें निकाह के एक महीने पहले अर्ज़ी देने का प्रावधान है.

निशात कहती हैं, "हमारा यह नियम बहुत अच्छा है पर यह भी बाधा बन रहा है क्योंकि पुश्तैनी क़ाज़ी के पास निकाह पढ़वाने के लिए कोई नोटिस पीरियड नहीं होता. जबकि हमारे नियम के मुताबिक दोनों पक्षों द्वारा दिए गए तथ्यों की तस्दीक करने के बाद ही हम निकाह पढ़वा सकते हैं.

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दारुल-उलूम-निस्वान की संस्थापक ज़किया सोमन के मुताबिक, इस्लाम में निकाह एक कॉन्ट्रैक्ट है, जहां निकाहनामा एक बहुत ही अहम दस्तावेज़ है. वह बताती हैं, "पारंपरिक रूप से इसमें नाम, दस्तख़त जैसी चीज़ों के अलावा कुछ नहीं होता. कमज़ोर निकाहनामे और मेहर के बारे में स्पष्ट नहीं लिखे जाने से तलाक की सूरत में महिला को कुछ नहीं मिलता. इसलिए मॉडल निकाहनामा तैयार किया गया."

काज़ी जहांआरा ने भी ख़ुद इस दर्द को महसूस किया है. उनके पति ने चार बच्चे होने के बाद एक छोटी सी बात पर उन्हें घर से निकाल दिया था.

वह कहती हैं, "इस बात का ज़बरदस्त सामाजिक दबाव है कि औरत को धर्म के नाम पर क़ाज़ी बनने की इजाज़त ना दी जाए, जबकि इस पद का धार्मिकता से कोई ताल्लुक नहीं है."

'RSS की उपज है महिला काज़ी'

जमीयत उलेमा-ए-राजस्थान के महासचिव मोहम्मद अब्दुल वाहिद खत्री मुस्लिम महिलाओं के सशक्तीकरण के पक्ष में हैं, पर वे उनके क़ाज़ी बनने की मुहिम को एकदम बेकार मानते हैं.

उन्हें लगता है कि जब तक महिला काज़ियों को उलेमा की तरफ से पहचान नहीं मिलेगी, उनकी कथित ट्रेनिंग से कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ने वाला.

उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि यह मुहिम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उपज है और किसी को भी तीन तलाक़ और महिला क़ाज़ी जैसे फालतू मुद्दों पर वक्त ख़राब नहीं करना चाहिए.

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