दिल्ली से पटना-सेमिनारों में आते हैं गिनती के लोग
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) हिंदी पट्टी से सेमिनारों का दौर गुडर गा लगता है। अब हिन्दी प्रांतों में अहम सवालों पर होने वाले सेमिनारों या परिचर्चाओं में गिनती के लोग पहुंचते हैं। साहित्यिक गोष्ठियों में भी यही हो रहा है।इस खबर के साथ लगी तस्वीर को देखिए। हाल ही की है।
सोता आदमी कौन
पटना के सेमिनार की है। पटना के आईएमए सभागार में दिग्गज पत्रकार और लेखक प्रफुल बिदवई की याद में अनिल चौधरी का व्याख्यान हो रहा है, विषय है ''दोध्रुवीय राजनीति की चुनौतियां...'' और मंच पर बैठे तीन लोगों के बीच में जो आदमी सिर झुकाकर सो रहा है, वह कार्यक्रम के अध्यक्ष आलोचक खगेंद्र ठाकुर हैं। इस सेमिनार में श्रोताओं की तादाद भी 8-10 ही रही।
वरिष्ठ युवा कवि अभिषेक श्रीवास्तव कहते हैं कि हिन्दी समाज का कुछ नहीं हो सकता। यहां पर सामयिक सवालों पर बहस के लिए स्पेस खत्म हो चुका है। वे कहते हैं, मैंने अभी कुछ दिन पहले कहा था न कि सबका काम तय है-लड़ने वाला लड़ेगा, बोलने वाला बोलेगा, लिखने वाला लिखेगा। खगेंद्र ठाकुर को देखकर एक पंक्ति और बनती है- सोने वाला सोएगा।
प्रेमचंद-निराला के उत्तर प्रदेश में नहीं रहा हिन्दी पढ़ना जरूरी
निकल लिए
ये तो एक उदाहरण है हिन्दी पट्टी का। कुछ समय पहले राजधानी के आई.पी.एक्सटेंशन इलाके में प्रेमचंद की कहानियों पर चर्चा होनी थी। क्षेत्र के हिन्दी प्रेमियों ने इसका आयोजन किया था।
पर चर्चा के दौरान 10 लोग भी नहीं आए। दो-तीन लोग बीच में ही निकल लिए। वरिष्ठ हिन्दी लेखक प्रतार सहगल कहते हैं कि हिन्दी समाज साहित्य, संगीत, कला से दूर है। उसे सिर्फ टुच्ची राजनीति करनी आती है।













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