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New Criminal Laws: नए आपराधिक कानूनों को लागू होने से रोक पाएगा विपक्ष? क्या कहते हैं एक्सपर्ट

New Criminal Laws Implementation Date: संसद के दोनों सदनों से पारित और राष्ट्रपति की मंजूरी से बने तीनों नए आपराधिक कानून लागू होने के लिए तैयार हैं। केंद्र सरकार ने 1 जुलाई, 2024 से इनपर तामील शुरू करने की तारीख तय कर रखी है। पूरे देश में पुलिसकर्मियों और पुलिस अफसरों तक को इसकी ट्रेनिंग दी जा चुकी है।

लेकिन, उससे पहले विपक्षी दलों के गठबंधन इंडिया ब्लॉक के सहयोगी राजनीतिक दलों ने इसपर अमल रोकने की मांग शुरू कर दी है। सबसे पहले पश्चिम बंगाल की सीएम और तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने यह मुद्दा उठाया और फिर कांग्रेस अपनी दलीलों के साथ आगे आ गई।

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तीनों नए आपराधिक कानूनों पर अमल रोकने के पक्ष में विपक्ष
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा है, 'तीन नए कानून 1 जुलाई, 2024 से प्रभावी होने जा रहे हैं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की यह पुख्ता राय है कि इस तारीख को टालना चाहिए, ताकि गृहमंत्रालय की पुनर्गठित स्थाई कमेटी की ओर से इसका पूरी तरह से समीक्षा और पुनःपरीक्षण किया जा सके, जो कि ज्यादा व्यापक और सार्थक परामर्श के साथ होना चाहिए।'

बिना विस्तृत बहस के तीनों कानून पारित किए जाने का विपक्ष लगा रहा है आरोप
निर्धारित तारीख को इसे लागू नहीं किए जाने के पक्ष में दलील देते हुए कांग्रेस नेता ने कहा, 'तीन दूरगामी विधेयकों को संसद में उचित बहस और चर्चा के बिना पारित कर दिया गया और यह तब हुआ जब लोकसभा और राज्यसभा के 146 सांसद निलंबित थे।'

इससे पहले टीएमसी चीफ ने भी मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में इन तीनों विधेयकों को 'जल्दबाजी' में पारित कराने का आरोप लगाते हुए, इसे अभी नहीं लागू करने की मांग की थी।

कानून पारित किए जाने के समय 146 सांसदों के निलंबित होने की दे रहे दलील
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे एक खत में भारतीय न्याय संहिता 2023, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 को लागू करने को लेकर 'गंभीर चिंता' जाहिर की थी। उन्होंने भी वही दलील दी थी कि जब ये कानून संसद से पारित करवाए गए थे, तब दोनों सदनों के 146 सांसद निलंबित थे।

मोदी सरकार विपक्ष के दबाव के आगे झुकने को बाध्य नहीं- कानून के एक्सपर्ट
कानून के जानकारों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार विपक्ष के दबाव के आगे झुकने को बाध्य नहीं है। पटना हाई कोर्ट के वकील आदित्यनाथ झा ने वनइंडिया को बताया है कि 'जब तीनों विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुके हैं और उन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है, उसके बाद इसमें किसी तरह के पुनर्विचार के लिए फिर संविधान संशोधन की ही आवश्यकता होगी।'

प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति का विरोध करके विपक्ष ने जाहिर कर दी अपनी मंशा
मतलब साफ है कि विपक्ष 18वीं लोकसभा के शुरुआत से ही मोदी सरकार को किसी भी तरह से घेरने और बैकफुट पर लाने की रणनीति पर काम कर रहा है। उसने इसकी बुनियाद प्रोटेम स्पीकर के पद पर सात बार के बीजेपी सांसद भर्तृहरि महताब की नियुक्ति के विरोध के साथ ही रख दी है। क्योंकि, शायद भारत के संसदीय इतिहास में कभी यह मुद्दा इतना सियासी तूल नहीं पकड़ा था।

मौजूदा एनडीए सरकार में 293 सांसद हैं। इसमें बीजेपी के अपने 240 सांसद हैं और कांग्रेस समेत विपक्षी पार्टियां इसी वजह से शुरुआत से ही सरकार को दबाव में रखना चाहती है। लेकिन, न तो सरकार तीनों आपराधिक कानूनों पर अमल रोकने के लिए बाध्य है और न ही प्रोटेम स्पीकर या फुलटाइम स्पीकर के मसले पर उसके सामने विपक्ष के आगे झुकने की किसी तरह की बाध्यता नजर आती है।

तीनों नए आपराधिक कानूनों की विस्तृत जानकारी के लिए इस लिंक को क्लिक कर सकते हैं।

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