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बिना आंखों की रोशनी के भी रौशन है इस 'फौजी' की जिंदगी, मोटरसाइकिल पर कर चुके हैं लद्दाख तक की सैर

नई दिल्‍ली। कहते हैं कि फौजी का फौज से निकालना तो आसान है लेकिन एक फौजी में से फौज को निकालना बहुत मुश्किल है। फौज की ड्यूटी को अलविदा कहने के बाद भी एक फौजी हमेशा सैनिक ही रहता है। कुछ ऐसे ही फौजियों की एक सीरीज वन इंडिया आपके लिए लेकर आया है। इस सीरीज में हम आपको ऐसे हीरोज से मिलवाएंगे जिन्‍होंने या तो फौज छोड़ दी है या फिर फौज में उनके जाने का सपना किसी वजह से पूरा नहीं हो सका। ऐसे ही एक 'फौजी' हैं वीरेन मित्‍तर, एक फौजी परिवार से आते हैं और देश सेवा हमेशा से उनका सपना था लेकिन उनका सपना पूरा नहीं हो सका। एक हादसे ने उनके एक सपने को तोड़ा लेकिन आज वह जो कुछ कर रहे हैं, वह तमाम लोगों के लिए प्रेरणा है करगिल वेटरन मेजर (रिटायर्ड) डीपी सिंह के साथ खास बातचीत में वीरेन ने अपनी जिंदगी के बारे में बताया है।

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    हादसे की वजह से नहीं मिला कमीशन

    हादसे की वजह से नहीं मिला कमीशन

    वीरेन मित्‍तर की आंखों में रोशनी पिछले 21 सालों से न के बराबर है मगर उनसे मिलकर आपको कभी इस बात का अहसास नहीं होगा। एक फौजी परिवार से आते हैं और देश सेवा हमेशा से उनका सपना था। सन् 1999 में वह ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (ओटीए) में बतौर जेंटलमैन कैडेट (जीसी) अपने सपने को पूरा करने के लिए पहुंचे थे। यहां पर इसी दौरान उनके साथ एक‍ हादसा हो गया। पासिंग आउट परेड के बस आठ दिन पहले ही नाइट ड्रिल करते समय उनकी आंख में चोट लग गई। उन्‍हें लगा कि यह ठीक हो जाएगी। आर्मी के डॉक्‍टरों ने उन्‍हें देखा और उनकी नजर उस समय पूरी तरह से ठीक थी। लेकिन आर्मी ने फैसला किया कि आंख में लगी चोट की वजह से उन्‍हें कमीशन नहीं दिया जा सकता है। वीरेन मित्‍तर के लिए यह एक बड़ा झटका था मगर इसके बाद भी वह रुके नहीं।

    पूरी तरह से गंवाई रोशनी

    पूरी तरह से गंवाई रोशनी

    सेना में उन्‍हें कमीशन नहीं मिल सका और फौज में जाने का उनका सपना अधूरा रह गया। वीरेन मित्‍तर की मानें तो जो कुछ होता है, वह अच्‍छे के लिए होता है। इस ख्‍याल को उन्‍होंने अपनी जिंदगी में इस तरह से आत्‍मसात कर लिया कि सपने के टूटने का गम उन पर कभी हावी नहीं हो सका। ओटीए में उन्‍हें जो चोट लगी उसके करीब नौ बाद उन्‍हें कुछ तकलीफ हुई। इस वजह से उनकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई। डॉक्‍टरों ने उन्‍हें बताया कि उनकी आप्टिक नर्व में कुछ समस्‍या आ गई है। ऑप्टिक नर्व की वजह से ही आंखों में रोशनी होती है। उनकी तकलीफ धीरे-धीरे दिमाग की तरफ बढ़ रही थी। डॉक्‍टरों ने कहा कि अगर जल्‍दी कुछ नहीं किया गया तो हो सकता है कि उनका ब्रेन डेड भी हो जाए। वीरेन के मुताबिक छह माह बाद पूरी तरह से उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी।

    डिप्रेशन से भी गुजरे वीरेन

    डिप्रेशन से भी गुजरे वीरेन

    इस दौरान उन्‍हें पूरी तरह से कमरे में बंद रहने को मजबूर होना पड़ा। वीरेन के मुताबिक यह समय उनके लिए बहुत तकलीफ भरा था। वह एक पल को डिप्रेशन में भी चले गए और उन्‍हें हर तरफ नकारात्‍मकता नजर आने लगी। लेकिन धीरे-धीरे उन्‍होंने इस स्थिति को समझा और स्‍वीकार किया। उन्‍हें इस बात का अहसास हुआ कि उन्‍हें खुद ही अपना रास्‍ता तलाशना होगा। उन्‍हें पता लग चुका था कि उनके हाथ में बस उनका कर्म है और इस बात को दिमाग में रखकर वह कई तरह के विकल्‍पों पर विचार करने लगे। उनकी मानें तो वह दो सालों से बंद पड़ चुकी जिंदगी में फिर से रफ्तार फूंकना चाहते थे। वह दिवारों से बाहर आकर फिर से अपना आत्‍मविश्वास हासिल करना चाहते थे और आत्‍मनिर्भर बनना चाहते थे। यह उनके लिए बहुत आसान नहीं भी था।

    45 मिनट की स्‍कूटर राइड ने बदली जिंदगी

    45 मिनट की स्‍कूटर राइड ने बदली जिंदगी

    वीरेन ने इसके बाद जो किया आप आज सोचेंगे तो लगेगा कि वह चमत्‍कार से कम नहीं था। वीरेन ने अपने गैराज में पड़ा एक पुराना स्‍कूटर निकाला। वह जानते थे कि इस स्‍कूटर की चाभी कहां रखी है और किक मारने के बाद 45 मिनट तक स्‍कूटर चलाया। वीरेन की मानें तो बस 10 प्रतिशत रोशनी के बाद भी उन्‍होंने उस स्‍कूटर को ड्राइव किया। वीरेन घर आकर सो गए और दो दिन तक सोते रहे। इसके बाद वीरेन ने अपने एक और सपने को पूरा किया। वीरेन एक मोटरसाइकिल खरीद कर लाए और यहां से उन्‍होंने एक नए वीरेन को दुनिया से रूबरू करवाया। फौज के साथ बतौर ऑफिसर बनकर पहाड़ों में रहने के अपने सपने को उन्‍होंने मोटरसाइकिल के साथ सिर्फ 10 प्रतिशत आंखों की रोशनी के पूरा किया है। पहली राइड मनाली थी। यहां से शुरू हुए सिलसिले को लद्दाख, स्‍पीती, सांच वैली और लगभग सभी जगह की सैर कर चुके हैं।

    14,000 फीट की ऊंचाई पर वर्कशॉप

    14,000 फीट की ऊंचाई पर वर्कशॉप

    वह कहते हैं कि जब तक आपका शरीर और दिमाग को आप उसकी सीमाओं तक परखेंगे तो दोनों आपकी मदद करेंगे। साथ ही भगवान का आर्शीवाद भी जरूरी है। वीरेन ने सीमित रोशनी के साथ ही फोटोग्राफी भी सीखी और ब्‍लॉग लिखना भी शुरू कर डाला। उन्‍होंने अपनी कमजोरियों को खुद पर हावी नहीं होने नहीं दिया। उनकी कुछ फोटोग्राफ्स को पुरस्‍कार मिला है तो कुछ को मैगजीन में जगह मिली है। आज वह 14,000 फीट की ऊंचाई पर फोटोग्राफी की वर्कशॉप तक चलाते हैं।यहां पर हमने जिस फोटो का प्रयोग किया है वह, वीरेन ने ही क्लिक की है। वीरेन के लिए खुद को आत्‍मनिर्भर बना पाना इतना आसान भी नहीं था। आंखों की सीमित रोशनी की वजह से वह ब्‍लाइंड स्‍कूल तक ले जाए गए।

    आज हैं एक सफल आईटी प्रोफेशनल

    आज हैं एक सफल आईटी प्रोफेशनल

    यहां पर विकल्‍प देखा गया कि बिना पूरी रोशनी वह क्‍या-क्‍या काम कर सकते हैं। बिना रोशनी के लोग कौन-कौन से काम कर सकते हैं, इसके बारे में वीरेन को स्‍कूल में बताया गया। वीरेन को बताया कि वह चॉक बना सकते हैं या फिर बेंत की कुर्सियां तैयार कर सकते हैं। वीरेन तय कर चुके थे कि उन्‍हें यह नहीं करना है। अप्‍लाइड फीजिक्‍स बचपन से उनका जुनून था और वह कंप्‍यूटर साइंस के स्‍टूडेंट रहे थे। साल 2002 में वीरेन ने फौज से मिले पैसों से एक कंप्‍यूटर तक एसेंबल कर डाला। आज वह एक सफल आईटी प्रोफेशनल भी हैं।

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