इतने भी शरीफ नहीं हैं पाक पीएम नवाज

Nawaz-Sharif
नई दिल्‍ली। नवाज शरीफ, नरेंद्र मोदी की ताजपोशी के लिए भारत आएंगे या नहीं यह तो आज शाम को पता लग जाएगा लेकिन जो नवाज शरीफ आज भारत से दोस्‍ती की वकालत कर रहे हैं, वही नवाज शरीफ मई 1999 में भी पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री थे जब भारत कारगिल युद्ध का दर्द सह रहा था।

पाक वजीर-ए-आलम नवाज ने भारत में चुनावों के दौरान उम्‍मीद जताई थी कि भारत में बनने वाली नई सरकार और नए प्रधानमंत्री पड़ोसी मुल्‍क के साथ संबंधों को बेहतर करने की दिशा में काम करेंगे।

आज जब नवाज को मोदी की ओर से निमंत्रण भेजा गया है तो वह फैसला लेने में वक्‍त लगा रहे हैं। भले ही नवाज शरीफ ने पाकिस्‍तान में पिछले वर्ष हुए चुनावों में एक बड़ी जीत दर्ज कर अपनी सरकार बनाने में कामयाबी पाई हो लेकिन उन्‍हें शरीफ समझने की गलती भारत की हरगिज नहीं करनी चाहिए। वजहें आप खुद पढ़िए।

पहली बार बने पाक के पीएम, घाटी में बढ़ा आतंकवाद
नवाज शरीफ ने पहली बार नवंबर 1990 में पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री पद का जिम्‍मा संभाला था। अगर ध्‍यान दिया जाए तो यही वह समय था जब कश्‍मीर में आतंकवाद और चरमपंथ ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे।

90 के दशक में जब कश्‍मीर में आतंकवाद सिर उठा चुका था, भारत की ओर से कई बार पाकिस्‍तान की सरकार और आईएसआई को इसके लिए जिम्‍मेदार ठहराया गया लेकिन न तो पाकिस्‍तान सरकार ने इस पर कोई ध्‍यान दिया और न ही आईएसआई पर कोई सख्‍ती बरती गई।

मुंबई में ब्‍लास्‍ट के समय थे पीएम
यही नहीं मार्च 1993 में जब मुंबई में ब्‍लास्‍ट हुए तब नवाज शरीफ ही पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री थे। इस ब्‍लास्‍ट के आरोपी दाऊद इब्राहीम को न सिर्फ पाकिस्‍तान में शरण दी गई बल्कि उसे पूरी सुरक्षा भी मुहैया कराई जा रही है। दाऊद पाक में उसी इलाके में रहता है जिस इलाके में पाक आर्मी के वरिष्‍ठ अधिकारी रहते हैं।

कारगिल वॉर के समय रहे प्रधानमंत्री
मई 1999 में नवाज शरीफ जब पाक के प्रधानमंत्री थे, भारत और पाक के बीच तीसरा युद्ध यानी कारगिल वॉर शुरू हो गया। नवाज शरीफ ने अक्‍टूबर 1998 में परवेज मुशर्रफ को पाक आर्मी का प्रमुख नियुक्‍त किया था।

कुछ विशेषज्ञों की मानें तो नवाज शरीफ कारगिल वॉर के ब्‍लूप्रिंट से पूरी तरह से वाकिफ थे लेकिन नवाज हमेशा इससे इंकार करते आए हैं। नवाज की मानें तो उन्‍हें इसके बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी।

उन्‍हें इसके बारे में तब मालूम चला जब उस समय भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने एक अरजेंट कॉल के जरिए उनसे संपर्क किया। वह अगर मुशर्रफ की बात पर अगर यकीन किया जाए तो नवाज शरीफ ने ही कारगिल युद्ध की योजना के बारे में उनसे बात की।

मुशर्रफ ने एक किताब के लेखक को जो बातें बताई उनके मुताबिक मुशर्रफ के अलावा शरीफ और तीन और जनरल को इस योजना के बारे में मालूम था। मुशर्रफ की बातों पर अगर यकीन करें तो शरीफ को 20 फरवरी 1998 की वाजपेई की लाहौर यात्रा से 20 दिन पहले ही कारगिल ऑपरेशन के बारे में सारी जानकारी दे दी गई थी।

आईएसआई को खुला समर्थन
मुंबई में नवंबर 2008 में 26 /11 जैसे हमले की साजिश में शामिल पाक की इंटेलीजेंस एजेंसी को नवाज शरीफ का पूरा समर्थन हासिल है। कुछ दिनों पहले जब पाक में मशहूर पत्रकार हामिद मीर पर हमला हुआ तो उस समय शरीफ ने आईएसआई की खुलकर तारीफ की थी।

शरीफ ने कहा था कि जिस तरह से आईएसआई देश की सुरक्षा में तैनात है, वह वाकई काबिल-ए-तारीफ है।

इसके अलावा जब पिछले वर्ष अक्‍टूबर में नवाज शरीफ ने अमेरिका के राष्‍ट्रपति बराक ओबामा से मुलाकात की थी तो उन्‍होंने 26 /11 हमलों के मास्‍टर माइंड लश्‍कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफिज सईद की गिरफ्तारी के बारे में ओबामा को कोई भरोसा नहीं दिलाया था।

2013 में फिर लौटा घाटी में हिंसा का दौर
नवाज शरीफ के पिछले वर्ष पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही पूरी कश्‍मीर घाटी में हिंसा का दौर फिर से लौट आया है। आए दिन सेना के काफिले पर हमला हो रहा है और विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 1989 के बाद से अब घाटी के हालात बिगड़ते जा रहे हैं।

वर्ष 2013 में पाकिस्‍तान ने दिसंबर तक 195 बार सीजफायर का वॉयलेशन किया है, यह पिछले 10 वर्षों में सबसे ज्‍यादा है। साफ है नवाज शरीफ एक तरफ तो भारत के साथ शांति की बात करते हैं लेकिन दूसरी तरफ आतंकी गतिविधियों के खिलाफ कड़ी कारवाई करने में हिचकते हैं।

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