आज पहली बरसी, एक साल में ही भूल गए खुशवंत सिंह को

नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) अगर अब आप खुशवंत सिंह का किसी से घर जाने का रास्ता पूछे तो वह शायद ही बता पाए। एक साल पहले आज ही के दिन चोटी के लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह का निधन हो गया था। वे आज होते तो अपने जीवन के 100 वसंत देख चुके होते।

Nations forgets Khushwant Singh on his first death anniversary

सुजान सिंह पार्क में आप घूमते हुए किसी शख्स से पूछे कि खुशवंत सिंह का आशियाना कहां है, तो 10 में से 9 लोग आपको इस सवाल का जवाब नहीं दे पाएँगे। इससे आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि हम अपने नायकों और लेखकों को लेकर किस तरह का उदासीन रुख रखते हैं।

ट्रेन टू पाकिस्तान और सिखों का इतिहास जैसी कालजयी कृतियों के लेखक खुशवंत सिंह करीब 50 साल सुजान सिंह पार्क में रहे। पर हमने खुद देखा कि अब उनके बारे में सुजानसिंह पार्क के लोग ही कुछ नहीं बता पाते।

भूले लोग खुशवंत को

एक दौर में उनके फ्लैट में रोज लेखकों, पत्रकारों और उनकी कलम के शैदाइयों की भीड़ लगी रहती थी। शाम के वक्त वे अपनी पत्नी या किसी मित्र के साथ करीब की खान मार्केट में आइस क्रीम खाने के लिए जाते थे। उनका इस तरह का नियम दशकों तक चला। पर वक्त कितना क्रूर होता है। वक्त का पहिया घूमा तो लोग भूल गए खुशवंत सिंह को

सुजान सिंह पार्क उनके दादा और नई दिल्ली के राष्ट्रपत्ति भवन, संसद भवन और दूसरी तमाम अहम इमारतों को बनाने वाले सर सोबा सिंह ने बनाया था अपने पिता के नाम पर। यानी सुजान सिंह दादा थे खुशवंत सिंह के।

वरिष्ठ कथाकार प्रताप सहगल को अफसोस इस बात का है कि आज उनके घर के आगे एक पत्थर पर किसी सरकारी एजेंसी ने यह भी लिखवाने का कष्ट नहीं किया कि इधर कभी खुशवंत सिंह रहते थे।

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