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सिर्फ 24 साल की उम्र में शहीद होने वाले शेर से डर गया था पाक

बैंगलोर। मंगलवार को बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार नरेंद्र मोदी हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में एक चुनावी रैली को संबोधित कर रहे थे और यहां पर जब उन्‍होंने 'यह दिल मांगे मोर,' कहा तो पालमपुर की जनता की आंखें नम हो गई। उनके जेहन में कैप्‍टन विक्रम बत्रा की यादें और उनका नाम ताजा हो गया। भारतीय सेना का एक ऐसा अफसर जिसने पालमपुर को एक नई पहचान दी।

एक कोल्‍ड ड्रिंक कंपनी की इन लाइनों को दरअसल पहचान दी थी कारगिल शहीद कैप्‍टन विक्रम बत्रा ने। सिर्फ 24 वर्ष की आयु में देश के लिए शहीद हो जाने वाले कैप्‍टन बत्रा पालमपुर के ही रहने वाले थे। उनका जन्‍म नौ सितंबर 1974 को पालमपुर के पास घुग्‍गर गांव में हुआ था।

यह बात भी काफी हैरान करने वाली है कि जिस विक्रम बत्रा का जिक्र नरेंद्र मोदी अपनी रैली में कर रहे थे, उनकी मां को मोदी से ज्‍यादा केजरीवाल पर भरोसा है। कैप्‍टन बत्रा ने न सिर्फ कारगिल के युद्ध में देश का अहम विजय दिलाई बल्कि वह यहां के लोगों खासकर युवाओं के आदर्श के तौर पर मशहूर हुए।

कारगिल की प्‍वाइंट 4875 से दुश्‍मनों को खदेड़ कर इस पर फिर से भारतीय तिरंगा लहराने वाले बत्रा का जिक्र जब मोदी ने किया तो उनसे जुड़ी कई खास बातें भी याद आ गईं। चंडीगढ़ से अपनी पढ़ाई पूरी करने वाले कैप्‍टन बत्रा ने इंडियन मिलिट्री एकेडमी में दाखिला लिया। यहां से एक लेफ्टिनेंट के तौर पर वह भारतीय सेना के कमीशंड आॅफिसर बने और फिर एक कैप्‍टन बनकर कारगिल युद्ध में 13 जम्‍मू एवं कश्‍मीर राइफल्‍स का नेतृत्‍व किया।

आगे की स्‍लाइड्स में पढ़िए बत्रा की जिंदगी और उनकी बहादुरी से जुड़ी कुछ खास बातें।

घर पर मिली थी प्राथमिक शिक्षा

घर पर मिली थी प्राथमिक शिक्षा

शहीद बत्रा की मां जय कमल बत्रा एक प्राइमरी स्‍कूल में टीचर थीं और ऐसे में कैप्‍टन बत्रा की प्राइमरी शिक्षा घर पर ही हुई थी।

खुद कैप्‍टन बत्रा ने बताई थी बात

खुद कैप्‍टन बत्रा ने बताई थी बात

जिस समय कारगिल वॉर चल रहा था कैप्‍टन बत्रा दुश्‍मनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती में तब्‍दील हो गए थे। ऐसे में पाकिस्‍तान की ओर से उनके लिए एक कोडनेम रखा गया और यह कोडनेम कुछ और नहीं बल्कि उनका निकनेम शेरशाह था। इस बात की जानकार खुद कैप्‍टन बत्रा ने युद्ध के दौरान ही दिए गए एक इंटरव्‍यू में दी थी।

कारगिल युद्ध में बन गया था विजयी नारा

कारगिल युद्ध में बन गया था विजयी नारा

एक कोल्‍ड ड्रिंक कंपनी के एड की लाइनें यह दिल मांगे मोर को सबसे पहले कैप्‍टन बत्रा ने ही प्रयोग करना शुरू किया। देखते ही देखते यह लाइनें कारगिल में दुश्‍मनों के लिए आफत बन गईं और हर तरफ बस 'यह दिल मांगे मोर' ही सुनाई देता था।

कैप्‍टन बत्रा बना कारगिल हीरो

कैप्‍टन बत्रा बना कारगिल हीरो

कारगिल वॉर में 13 जेएके राइफल्‍स के ऑफिसर कैप्‍टन विक्रम बत्रा के साथियों की मानें तो कैप्‍टन बत्रा युद्ध मैदान में रणनीति का एक ऐसा योद्धा था जो अपने दुश्‍मनों को अपनी चाल से मात दे सकता था। यह कैप्‍टन बत्रा की अगुवाई में उनकी डेल्‍टा कंपनी ने कारगिल वॉर के समय कारगिल की प्‍वाइंट 5140, प्‍वाइंट 4750 और प्‍वाइंट 4875 को दुश्‍मन के कब्‍जे से छुड़ाने में अहम भूमिका अदा की थी।

बहादुरी के लिए मिला सम्‍मान

बहादुरी के लिए मिला सम्‍मान

कैप्‍टन बत्रा को कारगिल वॉर के बाद परमवीर चक्र से सम्‍मानित किया गया। एक सैनिक ही इस पुरस्‍कार की अहमियत को समझ सकता है। परमवीर चक्र किसी भी सैनिक को उसकी सेवा के लिए दिया जाने वाला सर्वोच्‍च सम्‍मान है।

कैप्‍टन बत्रा के आखिरी शब्‍द

कैप्‍टन बत्रा के आखिरी शब्‍द

सात जुलाई 1999 को प्‍वाइंट 4875 पर मौजूद दुश्‍मनों को कैप्‍टन बत्रा ने मार गिराया लेकिन इसके साथ ही तड़के भारतीय सेना का यह जाबांज सिपाही को शहादत हासिल हो गई। 'जय माता दी' कैप्‍टन बत्रा के आखिरी शब्‍द थे। (फोटो फेसबुक)

जब अभिषेक बच्‍चन बने कैप्‍टन बत्रा

जब अभिषेक बच्‍चन बने कैप्‍टन बत्रा

जेपी दत्‍ता की फिल्‍म एलओसी में बॉलीवुड एक्‍टर अभिषेक बच्‍चन ने कैप्‍टन विक्रम बत्रा का किरदार अदा किया था।

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