मोदी, लालू के चाय वाले के बाद नीतीश ने कहा मैं वैद्य का बेटा

Narendra Modi, Lalu Prasad Yadav and Nitish Kumar's background
पटना| बिहार की सियासत में पिछड़े वर्ग के मतदाताओं की भूमिका शुरू से ही निर्णायक मानी जाती रही है। इस बीच बिहार के धुरंधर राजनीतिज्ञ अतीत के कार्यो को लेकर राजनीतिक बिसात पर अपनी मोहरे चलने लगे हैं। इसकी शुरुआत भाजपा के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने खुद को चाय बेचने वाला कहकर की। वहीं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अपने वैद्य पिता के काम में हाथ बंटाने की बात कहकर स्वयं को साधारण पृष्ठभूमि का साबित करने की कोशिश में लगे हैं। उधर, अपने बयानों से सुर्खियां बंटोरने वाले राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद खुद को असली चाय बेचने वाला कहकर मोदी से मुकाबला करने की तैयारी में लग गए हैं।

माना जा रहा है कि ये नेता अपने अतीत के सहारे ना केवल स्वयं को आम आदमी साबित करने की कोशिश कर रहे हैं बल्कि पिछड़े और कमजोर तबके के मतदाताओं को भी आकर्षित करने में लगे हैं। बिहार की राजनीति के जानकार कहते हैं कि बिहार में खासकर 90 के दशक के बाद जो भी सरकारें आईं, उनके वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा पिछड़े वर्ग के मतदाताओं का रहा है।

यहां सत्ता समीकरण इन मतदाताओं को नजरअंदाज कर नहीं बन सकता। तभी तो लालू ने 'माय' (मुसलमान और यादव) समीकरण बनाया। वहीं, नीतीश का लव-कुष सत्ता समीकरण तो पूरी तरह पिछड़ों के केंद्र में था। कुर्मी और कोयरी जैसी पिछड़ी जातियां उसके केंद्र में बनी रहीं। वैसे जनता दल (युनाइटेड) से अलग होने के बाद भाजपा भी सत्ता के इसी समीकरण के सहारे बिहार की राजनीति का सिरमौर बनने की तैयारी कर मोदी को चाय वाला और पिछड़े वर्ग का नेता बनाकर प्रचार कर रही है।

आंकड़ों पर गौर करें तो बिहार में पिछड़े मतदाताओं की संख्या 50 प्रतिशत से ज्यादा है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा यादवों का करीब 11 प्रतिशत है जबकि कुर्मी और कोयरी सात प्रतिशत के करीब हैं। माना जाता है कि यादव मतदाता लालू के वोट बैंक हैं। वहीं, नीतीश सत्ता में कोयरी-कुर्मी के सहारे आए जरूर, लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने अति पिछड़ों का कार्ड खेला। इन 50 प्रतिशत पिछड़े मतदाताओं में अतिपिछड़े 30 से 32 प्रतिशत हैं। शेष 20 प्रतिशत पिछड़ों में यादव, कुर्मी, कोयरी करीब 18 प्रतिशत हैं। राजनीति के जानकार सुरेंद्र किशोर कहते हैं कि यादवों को लालू से अलग करना किसी पार्टी के लिए आसान नहीं है। ऐसे में सभी लोग अतिपिछड़ों का कार्ड खेल रहे हैं।

किशोर कहते हैं कि बिहार में मोदी से ही नीतीश और लालू का मुकाबला है। ऐसे में इन्हें भी स्वयं को साधारण पृष्ठभूमि का बताना पड़ रहा है। वह मानते हैं कि अभी लोकसभा चुनाव में समय है ऐसे में नेताओं को अतीत के कार्यो का फल वर्तमान की राजनीति में कितना मिलेगा, यह तो चुनाव बाद ही पता चल सकेगा।

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