क्या कांग्रेस के ढुलमुल रवैये से नरेंद्र मोदी और मजबूत हो रहे हैं ?
नई दिल्ली, 01 नवंबर। क्या कांग्रेस के ढुलमुल रवैये के कारण नरेन्द्र मोदी और मजबूत हो रहे हैं ? कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी है। फिलहाल वह सत्ता में नहीं है। लेकिन क्या वह सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने में सक्षम है ? महंगाई समेत कई ऐसे मुद्दे हैं जो केन्द्र सरकार के खिलाफ हैं। फिर भी नरेन्द्र मोदी मजबूत बने हुए हैं। आखिर क्यों ?

प्रशांत किशोर और ममता बनर्जी ने इसके लिए कांग्रेस के ढुलमुल रवैये को जिम्मेदार माना है। इनका कहना है, "नरेन्द्र मोदी इस लिए मजबूत होते जा रहे हैं क्यों कि कांग्रेस (सोनिया-राहुल) कोई फैसला नहीं ले पा रही है। कांग्रेस के भ्रम और अनिर्णय की कीमत अब देश को चुकानी पड़ रही है।" 2022 में पांच राज्यों (उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड गोवा और मणिपुर) में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन पांच राज्यों में से चार में भाजपा का शासन है। सिर्फ पंजाब में कांग्रेस की सरकार है। कांग्रेस गोवा और मणिपुर में भी सरकार बना सकती थी। इन दो राज्यों में वह सबसे बड़ी पार्टी थी। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व की लापरवाही, अदूरदर्शिता और अक्षमता के कारण यहां भाजपा ने बाजी मार ली। ऐसे में क्या यह नहीं मान लेना चाहिए कि कांग्रेस की वजह से भाजपा मजबूत हो रही है ?

त्रिशंकु सदन के समय ही नेतृत्व की असली परीक्षा
राजनीति का रथ हमेशा किसी समतल मार्ग पर सरपट नहीं दौड़ता। उसे चुनावी रण के उबड़-खाबड़ रास्ते पर भी भागना होता है। कुशल सारथी वही है जो अपने रथ को दोनों ही रास्तों पर आसानी से दौड़ा सके। किसी राजनीतिक दल का परम लक्ष्य सत्ता की प्राप्ति होती है। त्रिशंकु सदन की स्थिति में पार्टी प्रमुख को सरकार बनाने के लिए त्वरित और सटीक फैसले लेने होते हैं। अगर वह ऐसा नहीं कर पाता तो उसकी क्षमता पर सवाल उठना लाजिमी है। ममता बनर्जी, प्रशांत किशोर आखिर क्यों कांग्रेस को अनिर्णय का शिकार बता रहे हैं ? गोवा और मणिपुर का वाकया इसका प्रमाण है। 2017 के मणिपुर विधानसभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला था। 60 सदस्यीय सदन में सबसे अधिक कांग्रेस को 28 सीटें मिली थीं। वह तीन सीटों की कमी से बहुमत का आंकड़ा नहीं छू पायी थी। भाजपा को 21 सीटें मिलीं थीं। कांग्रेस को केवल तीन विधायकों का समर्थन चाहिए था। लेकिन कांग्रेस के किसी रणनीतिकार ने इसके लिए ईमानदारी से काम नहीं किया। जबकि दूसरी तरफ भाजपा ने 10 विधायकों को अपने पाले में कर सरकार बना ली।

कांग्रेस ने दो राज्यों की सत्ता भाजपा को उपहार में दी !
मणिपुर में भाजपा के मुख्यमंत्री एन वीरेन सिंह पहले कांग्रेस में ही थे। लेकिन कांग्रेस छोड़ कर उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया था। उनके नेतृत्व में भाजपा ने नेशनल पीपुल्स पार्टी (4), नागा पीपुल्स फ्रंट (4), लोकजनशक्ति पार्टी (1) और तृणमूल कांग्रेस (1) के सहयोग से सरकार बना ली। यहां गौर करने वाली बात ये है कि भाजपा ने उस तृणमूल कांग्रेस को भी अपने पाले में कर लिया जो उसकी कट्टर विरोधी थी। जबकि दूसरी तरफ कांग्रेस का नेतृत्व (सोनिया- राहुल) न तो अपने संगठन को मजबूत रख सका और न ही निर्णायक मौके पर कोई फैसला ले सका। इसी तरह गोवा के पिछले चुनाव में कांग्रेस 17 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। बहुमत के लिए 21 का आंकड़ा चाहिए था। भाजपा को 13 सीटें मिलीं थीं। कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह को पर्यवेक्षक बना कर गोवा भेजा था। कांग्रेस नेताओं ने तब आरोप लगाया था कि दिग्विजय सिंह गोवा के पर्यटन स्थलों पर घूमते रहे और भाजपा के रणनीतिकार नितिन गडकरी ने सरकार बनाने की पटकथा लिख दी। तब भाजपा के पास मनोहर पर्रिकर जैसे लोकप्रिय नेता थे। उन्होंने महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (3), गोवा फॉरवर्ड पार्टी (3) और निर्दलीय विधायकों की मदद से सरकार बना ली। यानी कांग्रेस ने अपनी गलती से दो राज्यों की सत्ता भाजपा को गिफ्ट कर दी।

क्या इसके लिए कांग्रेस जिम्मेवार है ?
ममता बनर्जी के मुताबिक, "कांग्रेस को अब क्षेत्रीय दलों की ताकत स्वीकर कर लेनी चाहिए। अगर वह राज्यों के मजबूत क्षत्रीय दलों के खिलाफ चुनाव लड़ेगी तो यह एक तरह भाजपा को सहयोग करना ही होगा। कांग्रेस निजी लाभ-हानि को छोड़ कर जब तक भाजपा को हराने के लिए एक समग्र गठबंधन नहीं बनाएगी तब तक विपक्ष की जीत मुश्किल है।" यानी, जैसे कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में तृणमूल के खिलाफ चुनाव लड़ कर भाजपा को फायदा पहुंचाया। उसी तरह वह उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के खिलाफ चुनाव लड़ कर भाजपा को लाभ पहुंचाएगी। 2018 में गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव के नतीजे से यह साबित हो गया था कि अगर सपा, बसपा और कांग्रेस एक साथ चुनाव लड़ें तो भाजपा को हराया जा सकता है। जब उपचुनाव में यह प्रयोग हो सकता है तो मुख्य चुनाव में ऐसा क्यों नहीं ? लेकिन कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को महत्व नहीं देना चाहती। इसकी वजह से ही सशक्त विकल्प नहीं बन पा रहा। प्रशांत किशोर के मुताबिक, भाजपा को हराने के लिए भाजपा की तरह ही सोचना होगा। राहुल गांधी यह सोचते हैं कि अगर वे नरेन्द्र मोदी को ध्वस्त कर देंगे तो भाजपा खुद ब खुद खत्म हो जाएगी। लेकिन यह उनका भ्रम है। कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के सहयोग से ही भाजपा को हरा सकती है। लेकिन कांग्रेस कोई फैसला नहीं ले पा रही।
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