नगालैंड हिंसा: क्या है 70 साल से चल रहे सशस्त्र आंदोलन का इतिहास?
भारतीय सेना की गोलियों से 14 नागरिकों की मौत के बाद, देश के अशांत उत्तर-पूर्वी राज्य नगालैंड में तनाव बना हुआ है. प्रशासन ने इंटरनेट पर रोक लगा दी है और व्यापक विरोध प्रदर्शन रोकने के लिए कर्फ़्यू भी लगाया गया है.
हिंसा की ये घटना शनिवार को हुई. राज्य के मोन जिले में सेना के एक गश्ती दल ने मज़दूरों के एक समूह को चरमपंथी समझकर उन पर गोलीबारी शुरू कर दी. इसमें छह लोग मारे गए.
सेना ने इसे "ग़लत पहचान का मामला" बताया, लेकिन स्थानीय लोगों ने सेना के इस दावे को ख़ारिज कर दिया.
इतना ही नहीं, उस घटना के बाद इलाक़े में तैनात सैनिकों के साथ स्थानीय लोगों की गुस्साई भीड़ की झड़प भी हो गई. उस झड़प में भारतीय सेना के एक जवान के अलावा सात और लोगों की मौत हो गई. रविवार की दोपहर में प्रदर्शनकारियों ने सेना के एक शिविर पर हमला कर दिया. इसमें भी एक नागरिक की मौत हो गई.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस घटना पर "गहरा दुख" व्यक्त किया है. वहीं नगालैंड की राज्य सरकार ने मामले की विशेष जांच दल (एसआईटी) से उच्चस्तरीय जांच का वादा किया है.
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हाल की सबसे बड़ी हिंसक घटना
हिंसा की ये घटना नगालैंड में हाल के सालों में हुए सबसे घातक वारदातों में से एक है. मालूम हो कि नगालैंड लंबे समय से उग्रवाद और जातीय हिंसा से पीड़ित रहा है. ये पहली बार नहीं है जब भारतीय सुरक्षा बलों पर वहां के निर्दोष लोगों को ग़लत तरीक़े से निशाना बनाने के आरोप लगे.
शनिवार की ये घटना म्यांमार से लगती सीमा पर तब घटी, जब भारतीय सेना के सहयोगी अर्द्धसैनिक बल असम राइफ़ल्स के सैनिक चरमपंथियों के ख़िलाफ़ एक अभियान चला रहे थे.
भारतीय सेना के अनुसार, इलाक़े में अलगाववादी छापामारों के होने की "विश्वसनीय ख़ुफ़िया जानकारी" मिलने के बाद सैनिक कार्रवाई कर रहे थे. उसके मुताबिक़ सुरक्षा बलों पर हमला करने के बाद ये छापामार अक्सर म्यांमार में घुस जाते हैं.
हर हफ़्ते छुट्टियां बिताने अपने घर जाने वाले कोयला खान के मज़दूरों को ले जा रहे एक ट्रक पर सैनिकों ने गोलियां दाग दीं.
स्थानीय लोगों का आरोप है कि ये गोलीबारी बिना उकसावे के की गई थी. हालांकि सैनिकों का दावा है कि मज़दूरों ने जब "सहयोग करने से इनकार किया" तो उन्हें उनके विद्रोही होने का शक़ हुआ, तब गोलियां चलाई गईं.
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'ग़लत पहचान का मामला'
सेना का कहना है कि ये जो गड़बड़ी हुई है, वो "ग़लत पहचान का मामला" है.
इस बारे में सुरक्षा विश्लेषक जयदीप सैकिया कहते हैं, "ये वाक़ई में ग़लत पहचान का मामला है. इसलिए रविवार को जब स्थानीय लोगों की गुस्साई भीड़ ने सेना के एक शिविर में आग लगा दी, तो सैनिकों ने काफ़ी संयम बरता और गोली नहीं चलाई."
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि "ग़लत पहचान" की बात "भरोसेमंद ख़ुफ़िया जानकारी" की कमी के बारे में बताती है. साथ ही चरमपंथ विरोधी अभियानों के बारे में सवाल भी खड़े करती है. नगालैंड पुलिस ने सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ दर्ज़ शिक़ायत में कहा कि "साफ़" है कि उनका "इरादा" "नागरिकों की हत्या और उन्हें घायल करना" था.
पूर्वोत्तर भारत पर लिखने और टिप्पणी करने वाले संजय हज़ारिका ने बताया, "ये भयानक और अपमानजनक है." उनका मानना है कि आफ़्स्पा (AFPSA) क़ानून के तहत "सुरक्षा बलों को मिली सर्वव्यापी सुरक्षा" इस अशांत इलाक़े के लिए "न्याय की राह की प्रमुख बाधा" है.
असल में, आफ़्स्पा यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून एक विवादास्पद क़ानून है जो विद्रोहियों के ख़िलाफ़ सुरक्षा बलों को तलाशी और ज़ब्ती का अधिकार देता है.ये क़ानून किसी कार्रवाई के दौरान ग़लती से या ज़रूरी हालात में किसी नागरिक को मार देने वाले सैनिकों को भी बचाता है.
आलोचक इस क़ानून को "फर्जी हत्याओं" के लिए दोषी ठहराते हैं और कहते हैं कि अक्सर इसका दुरुपयोग होता है.
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आज़ादी के साथ शुरू हुई ये लड़ाई
नगालैंड में 1950 के दशक से सशस्त्र संघर्ष चल रहा है. इस आंदोलन की मांग है कि नगा लोगों का अपना संप्रभु क्षेत्र हो. इसमें नगालैंड के अलावा उसके पड़ोसी राज्यों असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश के साथ-साथ म्यांमार के नगा-आबादी वाले सभी इलाक़े भी शामिल हों.
1975 में एक समझौते के बाद सबसे बड़े नगा विद्रोही गुट 'नगा नेशनल काउंसिल' ने आत्मसमर्पण कर दिया था. लेकिन एक दूसरे गुट 'नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन) ने उस समझौते की निंदा करते हुए लड़ते रहने का फ़ैसला किया. एनएससीएन में चीन से प्रशिक्षण और हथियार पाने वाले लड़ाके शामिल थे.
हालांकि 1997 में टी. मुइवा के नेतृत्व वाला एनएससीएन का मुख्य गुट युद्धविराम पर सहमत होकर केंद्र सरकार के साथ बातचीत करनी शुरू कर दी.
2015 में दोनों पक्षों के दस्तख़त के बाद एक समझौता के ढांचे पर सहमति बनी, जिसने अंतिम समझौते का आधार रखा. हालांकि अलग झंडे और अलग संविधान की मांग के चलते ये बातचीत अभी अटकी हुई है, क्योंकि भारत सरकार इन मांगों को मानने को तैयार नहीं है.
शनिवार को जो वारदात हुई वो असल में भारतीय सैनिकों के एनएससीएन के दूसरे गुट के लड़ाकों की तलाश के दौरान घटी. यह गुट केंद्र सरकार के साथ मुइवा गुट की बातचीत का विरोध करता है. और म्यांमार के सागिंग में बने अपने ठिकानों से हमले को अंज़ाम देता है.
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म्यांमार की सीमा पर कई विद्रोही गुट सक्रिय
भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किमी लंबी सीमा लगती है. इनमें से अधिकांश इलाक़े पहाड़ी हैं, जिसके दोनों तरफ़ कई अलगाववादी विद्रोही संगठनों के ठिकाने हैं.
ऐसे ही संगठनों में से एक पीपुल्स लिबरेशन आर्मी है, जो पड़ोसी राज्य मणिपुर में सक्रिय है. पीएलए ने पिछले महीने असम राइफ़ल्स के काफ़िले पर हमला किया था. उस हमले में सेना के एक कर्नल, उनकी पत्नी और नाबालिग बेटे सहित चार सैनिक मारे गए.
कुछ लोगों का कहना है कि सेना के जवान अपने कमांडर की हत्या का बदला लेने के लिए बेताब थे.
वहीं कइयों का मानना है कि सेना की विद्रोहियों से निपटने की रणनीति अब पुरानी हो चुकी है. ताक़त के ज़रिए "इलाक़े पर वर्चस्व" बनाने की कोशिश करना बहुत हद तक ग़लत है. ऐसे लोगों का मानना है कि सेना को "भरोसेमंद ख़ुफ़िया जानकारी" जुटाने की ख़ातिर वहां के लोगों का "दिल और दिमाग़" जीतने की ज़रूरत है.
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