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मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह मामला : सीबीआई को किसकी अस्थियां मिली थीं

मुजफ़्फ़र नगर मामला
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मुजफ़्फ़र नगर मामला

बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में स्थित एक बालिका गृह में बच्चियों के साथ यौन शोषण और प्रताड़ना के मामले में 14 जनवरी को दिल्ली के साकेत कोर्ट से फ़ैसला आने वाला है लेकिन उससे पहले ही सीबीआई की ओर से अदालत में दाखिल की गई चार्ज़शीट पर सवाल उठने लगे हैं.

सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई ने चार्जशीट पर उठे सवालों को लेकर जो हलफ़नामा अथवा स्टेटस रिपोर्ट जमा की है, उसमें कहा गया है कि मुजफ़्फ़रपुर आश्रय गृह में किसी लड़की की हत्या नहीं हुई. सभी 35 लड़कियां जीवित हैं.

सीबीआई के अनुसार मामले की जांच के दौरान मिले दोनों कंकालों में से कोई बच्चियों का नहीं है. फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट कहती है कि इनमें से एक कंकाल महिला का और एक पुरुष का है.

केंद्रीय जांच एजेंसी के इस हलफ़नामे पर मामले के याचिकाकर्ताओं ने कड़ा ऐतराज़ जताया है. उनका कहना है कि सवाल यह था ही नहीं कि सभी बच्चियां ज़िंदा है या नहीं. सवाल तो ये था कि मामले की ग़वाह और पीड़िताओं के बयानों के अनुसार बालिका गृह से कुछ बच्चियों की हत्या हुई है और कुछ ग़ायब हुई हैं. वो बच्चियां कहां हैं?

उन्हीं बयानों और गवाहों के आधार पर सीबीआई ने खुदाई करके कंकाल बरामद किया था. उस वक़्त सीबीआई की ओर से बयान जारी किया गया था कि बरामद कंकाल बच्चियों के ही हैं.

मुज़फ़्फ़रपुर बालिकागृह मामले में सीबीआई की चार्जशीट के ख़िलाफ़ याचिका दायर करने वाली निवेदिता झा कहती हैं, "सीबीआई ने जो जांच रिपोर्ट पेश की है वो संदेहास्पद है. जिन बातों का हमें डर था वही हुआ. तीन महीने पहले सीबीआई के ख़िलाफ़ याचिका दायर की गई थी कि सीबीआई की जांच सही दिशा में नहीं चल रही है. मुख्य अपराधियों को बचाया जा रहा है. जो बयान बच्चियों ने दिया है, उसे ध्यान में रखते हुए जांच नहीं की जा रही है."

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SATYAM JHA
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इस सवाल का जवाब क्यों नहीं दे रही सीबीआई?

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका स्वीकार करके सीबीआई को अपनी जाँच का दायरा बढ़ाने और अपराध में 'बाहरी लोगों' के शामिल होने का पता लगाने का कहा था. सीबीआई को तीन महीने का वक़्त दिया गया था.

निवेदिता झा कहती हैं, "अभी भी दोषियों को बचाया जा रहा है. सीबीआई ने तब पटना में प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर ख़ुद कहा था कि अस्थियां बच्चियों की थीं. तब तो 11 बच्चियों की हत्या के सुराग उनको मिले थे. अगर हम यह मान भी लें कि फ़ॉरेंसिक जांच में अस्थियां वयस्कों की हैं तो भी सीबीआई यह क्यों नहीं बता रही है कि ये वयस्क कौन थे? अगर ग़वाहों की निशानदेही पर ख़ुदाई करके अस्थियां बरामद की गई हैं तो इसका मतलब भी यही हुआ ना कि किसी न किसी की हत्या करके उसे दफ़ना दिया गया था?"

वह कहती हैं, "सीबीआई की तरफ़ से यह एकदम नई बात कही जा रही है कि 35 लड़कियों को खोज लिया गया है और वे जिंदा हैं. इसकी तो कोई सूचना या शिकायत ही नहीं थी. दरअसल सीबीआई ने मनगढ़ंत कहानी बनाकर हत्यारों को बचाने का काम किया है. लेकिन हम इस लड़ाई को लड़ेंगे. फिर से एक नई याचिका दायर करने पर विचार किया जा रहा है."

सवाल ये भी उठ रहा है कि सीबीआई ने चार्जशीट में हत्या के आरोप की धाराएं (आईपीसी की धारा 302) क्यों नहीं लगाई हैं? अगर हत्या का मुक़दमा दर्ज होगा तो मामले पर क्या असर पड़ेगा?

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को देख रहीं वक़ील फ़ौजिया शकील के अनुसार, "बच्चियों ने अपने बयान में स्पष्ट कहा है कि कौन-कौन सी बच्चियां ग़ायब हुईं और किनको मारा गया. यहां तक कि उन्होंने ये भी कहा है कि मारने में कौन-कौन लोग शामिल थे और बोरियों में किसने भरा. कथित रूप से जिस गाड़ी से शवों को बोरियों में भरकर ले जाया गया था उसके ड्राइवर की निशानदेही पर ख़ुदाई करके शव बरामद किए गए थे. इसके बाद भी अब सीबीआई कह रही है कि किसी की हत्या नहीं हुई. ऐसे में या तो पहले सीबीआई ने झूठ बोला था या फिर सीबीआई के अनुसार बच्चियां झूठ बोल रही हैं."

ये भी पढ़ें: कैसे लोग चलाते हैं बालिका गृह?

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राष्ट्रीय मुद्दा बना था बालिका गृह मामला

फ़ौजिया कहती हैं, "बच्चियों के बयानों के आधार पर मानें तो जिस तरह से हत्या हुई है वह एक साज़िश के तहत हुई है. यह काम कई लोगों ने मिलकर किया है. अगर धारा 302 लगी और यौन शौषण का मामला हुआ तो दोषियों को सज़ा-ए-मौत मिलेगी. लेकिन, सीबीआई ने कोई जांच ही नहीं की. पिछले तीन महीनों में मामले को सिर्फ़ रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश हुई है."

मुज़फ़्फ़रपुर बालिकागृह मामला मई, 2018 में उस वक़्त सामने आया था जब टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस (TISS) की रिपोर्ट बिहार के बाल कल्याण विभाग के निदेशक तक पहुंची थी.

TISS की रिपोर्ट में वहां रहने वाली बच्चियों के साथ यौन दुर्व्यवहार से लेकर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की जानकारी दी गई थी. इसके बाद यह मामला राष्ट्रीय सुर्खियों में शामिल हो गया था और तत्कालीन समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा को पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था.

इस मामले में कई नेताओं और मंत्रियों पर शक़ की सूई घूमी थी.

बिहार सरकार ने दबाव बढ़ता देख मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी थी. शुरू में सुनवाई मुजफ़्फ़रपुर के विशेष पॉक्सो कोर्ट में हो रही थी. बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मामले को दिल्ली स्थित साकेत कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया.

मामले का ट्रायल पूरा हो चुका है. मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह में रहने वाली 44 में से 33 लड़कियों समेत कुल 102 ग़वाहों के बयानों और उनसे लिए गए साक्ष्यों के आधार पर 21 अभियुक्तों के ख़िलाफ़ आरोप तय किए गए हैं.

ये भी पढ़ें: मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह की लड़कियां कहां और कैसी हैं?

मुजफ़्फ़रनगर मामला
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कई सवालों के जवाब मिलने बाकी हैं...

मामले के सामने आने के बाद से लेकर अब तक कई अहम वाकये हुए हैं जो इससे जुड़े थे.

मुजफ़्फ़रपुर बालिका गृह से छुड़ाई गई जिन लड़कियों को मधुबनी भेजा गया था, उनमें से एक लड़की जिसकी गु़मशुदगी की रिपोर्ट 12 जुलाई 2018 को मधुबनी के नगर थाने में दर्ज है, वो आज तक नहीं मिल पाई है.

सीबीआई की चार्जशीट के अनुसार वो लड़की मामले की एक ग़वाह भी थी. साथ ही पीएमसीएच की मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार उसके साथ भी यौन शोषण हुआ था.

मेडिकल रिपोर्ट और एफ़आईआर रिपोर्ट की तुलना करने पर सवाल ये भी उठा था कि जिस लड़की ने मजिस्ट्रेट के समक्ष सीआरपीएस की धारा 164 के तहत बयान दिया है, जिसकी मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार वह सामान्य है, वो एफ़आईआर रिपोर्ट में गूंगी कैसे हो सकती है?

मुजफ़्फ़रपुर बालिकागृह मामले में हाई कोर्ट में सबसे पहले याचिका दायर करने वाले संतोष कुमार कहते हैं, "कितनी अजीब बात है कि सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट को कह दिया कि सभी लड़कियां ज़िंदा हैं. इसका मतलब है कि उन्होंने सभी की पड़ताल की होगी. अगर सभी लड़कियां ज़िंदा हैं तो वो बताएं कि जो लड़की मधुबनी बालिका गृह से ग़ायब हुई वो कहां है?"

ये भी पढ़ें: ब्रजेश ठाकुर पर सीबीआई ने लगाया 11 लड़कियों की हत्या का आरोप

मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर
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मुख्य अभियुक्त ब्रजेश ठाकुर

जांच की अगुवाई करने वाले डीएसपी का तबादला

केवल मधुबनी से ही नहीं, इसके पहले मोकामा के आश्रय गृह से भी 22 फ़रवरी 2019 को सात लड़कियां लापता हुई थीं. इनमें से चार मुजफ़्फ़रपुर बालिकागृह की ही लड़कियां थीं. हालांकि, पुलिस ने बाद में दावा किया कि 24 घंटों के अंदर सभी लड़कियों को सकुशल बचा लिया गया था.

संतोष कुमार कहते हैं, "आप ही सोचिए कि एक लड़की को आज तक नहीं ढूंढा जा सका. उसे गूंगी और मानसिक विक्षिप्त बताकर मामला रफ़ा-दफ़ा कर कर दिया गया. वहीं, पुलिस 24 घंटे के अंदर सात लड़कियों को सकुशल ढूंढ लेती है. तीन महीने के अंदर यह कह देती है कि मुजफ़्फ़रपुर बालिकागृह की सभी लड़कियां ज़िंदा हैं. आख़िर हम कैसे यक़ीन करें?"

उन्होंने कहा, "सीबीआई शुरू से ही बड़े लोगों को बचाने में लगी हुई है. जब ताज़ा हलफ़नामा तैयार हो रहा था तभी सीबीआई के एक डीएसपी अभय सिंह का तबादला हो गया जबकि वही इस मामले की जांच का नेतृत्व कर रहे थे. जब सरकार पर सवाल उठे तो कह दिया गया कि वो मामले की जांच का नेतृत्व करते रहेंगे. जो अफ़सर विशेष अपराध शाखा में चला गया है, उसकी बात सीबीआई शाखा में क्यों मानी जाएगी?"

बीबीसी ने सीबीआई से उसका पक्ष जानने की कोशिश की लेकिन पीआरओ कंचन प्रसाद ने इस मामले से जुड़ी किसी भी तरह की जानकारी देने से इनकार कर दिया. मामले की जांच कर रहे डीएसपी अभय सिंह से संपर्क नहीं हो सका.

ये भी पढ़ें: बिहार में एक और बालिका गृह कांड का डर क्यों है

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क्या कार्रवाई करेगी नीतीश सरकार?

मुज़फ़्फ़रपुर बालिकागृह मामले से जुड़ी एक और ख़बर इन दिनों सुर्खियों में है. मामला सरकार से जुड़ा है.

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर TISS की रिपोर्ट में चिंताजनक स्थिति में पाए गए बिहार के सभी 17 आश्रय गृहों की जांच पूरी हो चुकी है. सीबीआई ने इसकी जांच रिपोर्ट अदालत को सौंप दी है.

17 में 13 आश्रय गृह में यौन शौषण और प्रताड़ना के मामले दर्ज किए गए हैं. 54 एनजीओ को ब्लैकलिस्ट किया गया है. सीबीआई ने बिहार के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर इस मामले में 25 डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट समेत 71 अधिकारियों के ख़िलाफ़ विभागीय कार्रवाई की सिफ़ारिश की है.

बिहार की राजनीति में इन दिनों यह सवाल चर्चा में है कि नीतीश कुमार की सरकार सीबीआई की सिफ़ारिश के आधार पर अपने अधिकारियों पर कार्रवाई करेगी या नहीं.

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