बुंदेलखंड के गुलाबी गैंग में फूट और बगावत के स्वर

बुंदेलखंड के ताकतवर महिला संगठन 'गुलाबी गैंग में बगावत का स्वर थमने का नाम नहीं ले रहा। अपने अपमान से आहत संयोजक जयप्रकाश (बाबू जी) ने दो मार्च को अतर्रा कस्बे में आमसभा बुलाने का जहां एजेंडा जारी कर दिया है, वहीं कमांडर संपतपाल (दीदी) किसी भी दशा में इस बैठक को सफल नहीं होने देना चाहतीं। शनिवार को संपत पहले अपनी जिला कमांडर मिटठू देवी के खार्इंपार सिथत घर गर्इं और उसे मनाने या फिर इस्तीफा देने का दबाव बनाया जब वह नहीं मानीं तो अपनी आदतन धमकाया, हालांकि बात नहीं बनी और संपत को बैरंग वापस लौटना पड़ा।
गैंग के सदस्यों के बीच नोंक-झोंक
इसके बाद एक अखबार के दफ्तर पहुंचीं, जहां संयोजक जयप्रकाश शिवहरे को बुलाकर समझौता का प्रयास हुआ, समझौते की बात तो दूर दोनों के बीच तीखी नोंक-झोंक शुरू हो गर्इ। संयोजक ने दो टूक कह दिया कि 'अब दो मार्च को होने वाली आमसभा की बैठक में ही निर्णायक फैसला होगा। इससे संपत एक बार फिर ताव में आर्इ और यहां तक कह दिया कि 'गुलाबी गैंग सिर्फ उनका है, जो भी महिला बैठक में भाग लेगी, उसे निकाल बाहर किया जाएगा। संपत यह भूल गर्इं कि गुलाबी गैंग एक गैर पंजीकृत संगठन है और साल 2006 में गठित इस संगठन की कहानी ही कुछ और है।
गुलाबी गैंग के गठन के अतीत में जाने से पता चलता है कि आर्थिक तंगी से जूझ रही संपत कानपुर से एक सैकड़ा गुलाबी साड़ी खरीद कर फेरी लगाकर बेंचने की नियत से लार्इ थीं। अतर्रा के बिसंड़ा रोड़ पर किराए के कमरे संपत और जयप्रकाश साड़ी बेंचने की तरकीब पर चर्चा कर ही रहे थे कि जर्नलिस्ट रामलाल जयन, दाता सतबोध सार्इं व सेवानिवृत चिकित्साधिकारी डा. खन्ना पहुंच गए और यही इसके गठन पर चर्चा शुरू हो गर्इ।
जर्नलिस्ट जयन के प्रस्ताव को संपत ने यह कह कर नाकार दिया था कि 'गुलाबी गैंग नाम देने से ठीक नहीं रहेगा, क्योंकि 'ददुआ गैंग व 'ठोकिया गैंग चल रहे हैं। पुलिस इसे भी डकैतों का गैंग न समझ ले। जब समझाया गया कि गैंग का अर्थ समूह होता है, तब सभी ने इस नाम को हरी झंड़ी दे दी। उस समय पारित प्रस्ताव में जयन, जयप्रकाश, डा. खन्ना व दाता जी इस संगठन के संस्थापक सदस्य माने गए थे और संपत पाल को कमांडर एवं सावित्री (अब मृतक) को वाइस कमांडर नियुक्त किया गया था। शुरुआत में इस संगठन में महज एक दर्जन महिलाएं जुड़ी जिनमें दलित महिला सुशीला का नाम सर्वोपरि है।
गुलाबी गैंग ने अपना पहला आन्दोलन बिसंड़ा रोड के जल भराव को लेकर किया था, जहां तहसील दिवस की अध्यक्षता कर रहे तत्कालीन अपर जिलाधिकारी बांदा (वित्तराजस्व) जी.सी. पांडेय का धेराव ही नहीं किया गया, बलिक उन्हें अधिकारियों के अमले के साथ करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर बिसंड़ा रोड की दुर्दशा भी देखनी पड़ी थी। इस गैंग का सबसे बड़ा दूसरा आन्दोलन अतर्रा थाने से जुड़ा है, अतर्रा पुलिस ने गैंग से जुड़ी महिला सुशीला के पति को बेकसूर होने के बाद भी रात भर थाने के लाकप में बंद किए रही।
गुलाबी गैंग को कैसे मिली शोहरत
पहले से तय रणनीति के मुताबिक महिलाएं संपत की अगुआर्इ में थाने जा धमकीं और निर्दोष को छोड़ने की बात कही। लेकिन वहां पुलिस से विवाद हो गया और सुशीला ने संगमलाल दरोगा को रस्सी में बांध दिया था, जिसका सेहरा संपत के सिर बंधा। इस आन्दोलन में पुलिस महिलाओं पर टूट पड सक़ती थी, लेकिन वहां पहले से मौजूद इनाडु टीवी (इ टीवी) के कैमरा मैन गुलजार अहमद सभी तस्वीरें कैद कर रहे थे।
कैमरे में पुलिस ज्यादती न कैद हो जाए, इसलिए पुलिस लाचार बनी रही और इस घटना के प्रसारण से देश-विदेश में संपत और गुलाबी गैंग को शोहरत हासिल हो गर्इ। इस घटना के बाद संपत नारी सशक्तीकरण के रूप में उभरी और कर्इ देशों की यात्रा करने का मौका भी मिला। संपत विदेश घूम आर्इ और अपना आर्थिक ढ़ांचा भी मजबूत कर लिया, लेकिन दलित महिला सुशीला को सिर्फ दरोगा को बंधक बनाने का एक मुकदमा ही नसीब हुआ। संपत खुद तो आसमान पर उड़ रही है, लेकिन यह महिला आज भी मजदूरी कर अदालत के चक्कर काट रही है।
संपत को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाने वाले जयप्रकाश अपनी टूटी साइकिल में लाद कर रोजाना तीस से चालीस किलोमीटर की यात्रा कराते रहे, फिर भी आज उन्हें ही जान से मरवा देने की धमकी देना किसी के गले नहीं उतर रही। संस्थापक सदस्य सतबोध दाता सार्इं कहते हैं कि 'हमें आश्चर्य है कि संपत इतनी दबंग कैसे हो गर्इ? वह कहते हैं कि संगठन एक व्यकित का नहीं, बलिक समूह का होता है।
बकौल दाता जी, 'दो मार्च को होने वाली आमसभा की बैठक में गैंग में आंतरिक लोकतंत्र बहाल करने पर गंभीरता से चर्चा की जाएगी, संगठन किसी एक व्यकित के हाथ की कठपुतली नहीं रहेगा। दूसरे संस्थापक सदस्य डा. खन्ना गुलाबी गैंग में बिखराव से बेहद दु:खी हैं, वह कहते हैं कि 'गुलाबी गैंग सिर्फ महिला हिंसा रोकने के लिए गठित किया गया था, अगर खुद शीर्ष पदाधिकारी हिंसा पर उतारू हो जाए तो इसे सिर्फ गुंड़ागर्दी ही कहा जाएगा।
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