CJI चंद्रचूड़ को 'दुष्ट ट्रोल' से बचाने की गुहार क्यों लगा रहे हैं सांसद, राष्ट्रपति से की शिकायत ?
महाराष्ट्र के सियासी विवाद में अदालत में हुई कुछ टिप्पणियों पर ट्रोलिंग को लेकर विपक्ष के कुछ सांसद राष्ट्रपति और अटॉर्नी जनरल तक पहुंचे हैं। उन्होंने सीजेआई को ट्रोलिंग से बचाने की गुहार लगाई है।

महाराष्ट्र की सियासी लड़ाई अब राष्ट्रपति के दरबार तक पहुंच गई है। सबसे बड़ी हैरानी की बात है कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के समर्थन के लिए कुछ विपक्षी सांसदों को आवाज उठानी पड़ी है। दरअसल, महाराष्ट्र के राजनीतिक मुद्दे पर सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अदालत में जो टिप्पणियां हुई हैं, उसपर सोशल मीडिया पर भी कमेंट किए जा रहे हैं। लेकिन, विपक्षी सांसदों को लग रहा है कि यह देश की न्यायपालिका और सीजेआई के प्रति हमला है, उनका अपमान है। इसलिए विपक्षी सांसदों को सीजेआई की पैरवी राष्ट्रपति और अटॉर्नी जनरल तक से करनी पड़ रही है।

सीजेआई-सुप्रीम कोर्ट की पैरवी करने उतरे विपक्षी सांसद
महाराष्ट्र में सरकार गठन के मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है। इससे पहले ही विपक्षी दलों के कुछ सांसदों की एक लॉबी भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ को कथित 'शातिर ट्रोल' से बचाने के लिए आगे आ गई है। इन सांसदों ने इसके लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि तक से गुहार लगाई है। इन लोगों ने ऐसे ट्रोल्स और उनके पीछे जो लोग हैं, उनके खिलाफ सख्त और तत्काल कार्यवाही की मांग की है।

इन विपक्षी सांसदों ने राष्ट्रपति-अटॉर्नी जनरल से लगाई गुहार
राष्ट्रपति से गुहार लगाने वाले विपक्षी सांसदों का दावा है कि सुप्रीम कोर्ट और सीजेआई को निशाना वाले महाराष्ट्र की सत्ताधारी पार्टी से सहानुभूति रखने वाले लोग हैं। देश की सर्वोच्च सत्ता और भारत के सबसे बड़े न्याय अधिकारी के सामने जिन सांसदों ने देश के प्रधान न्यायाधीश की रक्षा के लिए आवाज उठाई है, उनमें कांग्रेस के राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा सबसे आगे हैं; और उनको समर्थन देने वालों में समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव और जया बच्चन, आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा, शिवसेना उद्धव बाल ठाकरे की प्रियंका चतुर्वेदी भी शामिल हैं। जबकि, इसमें कांग्रेस के कई और सांसद भी शामिल हैं, जिसमें दिग्विजय सिंह, प्रमोद तिवारी, शक्तिसिंह गोहिल, इमरान प्रतापगढ़ी, रंजीत रंजन, अमी याज्ञ्निक और अखिलेश प्रसाद सिंह शामिल हैं।

न्यायपालिका के कार्य में दखल देने का आरोप
इन नेताओं ने अपनी चिट्ठी में दावा किया है कि इस तरह से निशाना बनाना न्यायपालिका के कार्य में दखल देना है और यह सिर्फ 'सत्ताधारी लोगों' के सहयोग से ही संभव है। खत में कहा गया है कि देश की राष्ट्रपति का यह दायित्व है कि न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा करे। इन लोगों ने अटॉर्नी जनरल को दिल्ली पुलिस और आईटी और कानून मंत्रालय को निर्देश देने को कहा है कि दोषियों की पहचान करके सख्त कानून और आपराधिक कार्रवाई की जाए।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने की हैं कुछ कठोर टिप्पणियां
दरअसल, महाराष्ट्र में शिवसेना और शिवसेना उद्धव बाल ठाकरे के बीच चल रही कानूनी लड़ाई की सुनवाई के दौरान सीजेआई जस्टिस चंद्रचूड़ ने कुछ कठोर टिप्पणियां की हैं। जिसकी वजह से सोशल मीडिया पर देश के शीर्ष जज और सर्वोच्च अदालत पर निशाना साधा जा रहा है। अटॉर्नी जनरल को देश के पहले कानून अधिकारी बताते हुए इन सांसदों ने कहा है कि वह केंद्र की ओर से कानून और संविधान के संरक्षक हैं और वह अपनी जिम्मेदारियों का पालन करें। इन सांसदों ने सोमवार को उनसे मुलाकात का भी समय मांगा है।

सांसदों को क्यों लगानी पड़ रही है गुहार ?
लेकिन, सवाल है कि क्या देश की सर्वोच्च अदालत और भारत के प्रधान न्यायधीश कानून की मर्यादा का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति को दंडित करने के लिए नेताओं या सांसदों के समर्थन के मोहताज हैं ? सुप्रीम कोर्ट हमेशा से अभिव्यक्ति की आजादी का हिमायती रहा है, लेकिन वह इसकी सीमाएं भी तय कर सकता है और इसकी मर्यादा तोड़ने वालों पर कदम उठाने में भी सक्षम है।
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सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र पर फैसला रखा है सुरक्षित
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक बेंच ने गुरुवार को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इसपर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत ने सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल की ओर से उठाए गए कुछ कदमों पर सवाल उठाए हैं और यही इस विवाद की वजह बना हुआ है। बहरहाल, देखने वाली बात है कि इस मामले में राष्ट्रपति और अटॉर्नी जनरल विपक्षी सांसदों की चिंताओं का क्या हल निकालते हैं ?












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