Mothers Day: इस रिश्ते की कोई दूसरी मिसाल नहीं- 'मां ने आंखें खोल दीं, घर में उजाला हो गया', 10 मशहूर बातें
Mothers Day 14 मई को पूरी दुनिया में मनाया जाता है। लोग कविता, पेंटिंग खत और शायरी की मदद से अपने इमोशंस का इजहार करते हैं। मां-बच्चे के रिश्ते पर बहुत कुछ लिखा-पढ़ा-सुना गया है, लेकिन ये रिश्ता शब्दों से परे होता है।

Mothers Day भाग दौड़ भरी जिंदगी के बीच सुकून भरा ऐसा लम्हा होता है जब हम-आप निश्च्छल प्रेम और दुनिया में सबसे कमाल के संबंध का एहसास कर पाते हैं। मां-बच्चे के बारे में आज 10 ऐसी बातें तो मां सुनते ही बिना कोशिशों के कौंध जाती हैं।
दरअसल, मां-बच्चे का रिश्ता ऐसा है, जहां शब्द बेमानी लगने लगते हैं। इमोशंस से भरपूर इस रिश्ते की बात करें तो दुनिया की लगभग हर भाषा में मां की ममता और बेटे के रिश्ते की इनोसेंस पर रचनाएं हुई हैं।
हम हिंदुस्तानी जबान में हुई 10 ऐसी बेमिसाल रचनाओं और इनके कलमकार से रूबरू करा रहे हैं, जिनकी कुछ जादुई पंक्तियां मां शब्द सुनते ही जेहन और जुबान पर स्वत: ही उमड़ने लगती हैं।
कई बार गुस्से में मां को अनाप-शनाप कह गुजरने वाली युवा पीढ़ी शायद इस पंक्ति से मां के नि:स्वार्थ भाव को फील कर सकती है।
'बन पूत पिशाच भले माता का काट कलेजा भी ले निकाल, फिर भी उस कटे कलेजे से स्वर निकलेगा खुश रहो लाल'
राजस्थान के कवि ओम व्यास के शब्दों में मां कैसी होती है, इसके शब्द चित्रण में उन्होंने कहा, नवजात शिशु जब स्तनपान करता है तो नन्हे पांव दूसरे स्तन पर लगते हैं। दुनिया का इकलौता रिश्ता है जहां पांवों लगने के बावजूद मां भोजन कराती हैं। उन्होंने काव्यांश में लिखा-
मां का महत्व दुनिया में कम हो नहीं सकता
मां जैसा दुनिया में कोई हो नहीं सकता
मां परमात्मा की स्वयं एक गवाही है
मां जिंदगी के मोहल्ले में आत्मा का भवन है
मां काशी-काबा और चारों धाम है
मां जिंदगी की कड़वाहट में अमृत का प्याला है
मां बिना इस सृष्टि कि कल्पना अधूरी है
मशहूर शायर मुनव्वर राणा ने वैसे तो तमाम रचनाएं की हैं, लेकिन उनकी मां रचना आधुनिक समय में सबसे अद्भुत मानी जाती है। उन्होंने इसमें चंद पंक्तियां अद्वितीय लिखी है-
ऐ अँधेरे देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गयालबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती
मां बेटे की मार्मिक कहानी
कवि शैलेष लोढ़ा को टीवी इंडस्ट्री के लोग, खास तौर पर 15-20 साल के आयुवर्ग के बच्चे 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' सीरियल से जानते हैं, लेकिन कविता और शब्द संसार के रसिक उन्होंने मां के बारे में क्या लिखा, इससे भी जानते हैं।
जिस आजादी के लिए तुझसे मैं सारी उम्र लड़ता रहा
सारी आजादी मेरे पास है, फिर भी न जाने क्यों
दिल की हर धड़कन उदास है
कहता था न तुझसे मैं वही करूंगा जो मेरे जी में आएगा
आज वही सबकुछ करता हूं जो मेरे जी में आता है
बात ये नहीं है कि मुझे कोई रोकने वाला नहीं है
बात इतनी सी है कि सुबह देर से
उठने पर कोई टोकने वाला नहीं है
काव्यांश के अंत में कवि शैलेष कहते हैं
खैर मेरा तो क्या होना है, क्या हुआ है
तू खुश रह लेना यही दुआ है
आज तमाम खुशियां ही खुशियां,
पर गम ये नहीं है कि कोई ये सब खुशियां बांटने वाला होता
पर कोई तो होता जो गलतियों पर डांटने वाला होता
इसे नौकरी मिल जाए तरक्की करे दुआओं में हाथ उठाती
तरक्की के लिए घर छोड़ देगा सुनकर दरवाजे के पीछे चुपके-चुपके आंसू बहाती
सबकुछ है मां- सबकुछ आज तरक्की की हर रेखा तेरे बेटे को छूकर जाती है, पर मां हमें तेरी बहुत याद आती है
घर परिवार को एकजुट रखने में मां की भूमिका पर कवि आलोख श्रीवास्त्व ने क्या खूब लिखा है।
घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे
चुपके-चुपके कर देती हैं जाने कब तुरपाई अम्माधूप हुई तो आंचल बनकर कोने-कोने छाईं अम्मा
सारे घर का शोर-शराबा, सूनापन तन्हाई अम्माउसने खुद को खोकर मुझमें एक नया आकार लिया है
धरती, अंबर, आग, हवा, जल जैसी ही सच्चाई अम्मासारे रिश्ते जेठ-दुपहरी, गर्म हवा आतिश अंगारे
झरना, दरिया, झील समंदर, भीनी सी पुरवाई अम्मा
उर्दू जबां के मशहूर नगमा निगार निदा फाजली के काव्यांश में मां की भूमिका-
बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां
याद आती है चौका, बासन, चिमटा फुंकनी जैसी मां
आधी सोई आधी जागी
थकी दोपहरी जैसी माँदिन भर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी मां
दो बेटों की मां को खाना नसीब नहीं
लेखक स्वामी नाथ पांडे ने लघु कथा में मां-बच्चे के रिश्तों का अद्भुत खाका खींचा। उन्होंने लिखा-
एक विधवा मां के दो बच्चे थे
तीन माले के मकान में, एक ऊपर-दूसरा नीचे रहता था
मां 15-15 दिन दोनों के यहां भोजन करती थीं
31 दिनों का महीना होने पर एक दिन उपवास रखती थीं।
नौ महीने कोख में पालने वाली मां को एक दिन भूखा रहना पड़ता था।
बॉलीवुड में केसरी फिल्म के लिए 'तेरी मिट्टी' जैसा बेमिसाल नगमा लिखने वाले मनोज मुंतशिर ने भी मां के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, जितना कहो वो कम है, ऐसी भावनाओं का इजहार कर, काव्यांश लिखा।
मैं सोच रहा हूं, जिसने अक्षर-अक्षर पढ़ना सिखाया
उसके लिए कौन सी किताब खोलूं
जिसने शब्द-शब्द बोलना सिखाया
उसके लिए क्या बोलूं
कौन सा दीया जलाऊं उसके आगे जिसने मेरे इंतजार में आंखें जलाई हैं
क्या गाऊं उसके लिए जिसने मेरे लिए लोरियां गाई हैं।
पूछ के देखो मेरा रोम-रोम एक अनकही कहानी कहेगा
आज मैं कुछ नहीं कहूंगा, जो कहना है मेरी आंखों का पानी कहेगा
इन तमाम पंक्तियों के साथ शब्दों से मां की तस्वीर बनाने की कोशिश को मध्य प्रदेश के इंदौर से आने वाले दिवंगत शायर राहत इंदौरी के शब्दों के साथ विराम। मां को भावांजलि के भावनात्मक प्रयास में चार दशक से भी अधिक समय पहले राहत इंदौरी ने शेर लिखा-
मां के कदमों के निशां हैं कि दीए रोशन हैं
गौर से देख, यहां पर कहीं जन्नत होगी












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