पढ़ने-लिखने से संबंध नहीं ,चले कश्मीर में चुनाव लड़ने
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला) क्या आगामी जम्मू-कश्मीर विधानसभा में निरक्षरों को बहुमत मिलेगा? यह सवाल अहम क्योंकि चुनाव के पहले चरण में जिन 15 सीटों पर चुनाव होने जा रहे हैं,उनमें लड़ने वाले 67 फीसद उम्मीदवार दसवीं पास भी नहीं हैं।

अब जरा खुद सोच लें कि इन निरक्षरों के सहारे रियासत प्रगति करेगा। घाटी की गुरेज, बांदीपोरा, सोनावारी, गांदरबल और कंगन सीट पर प्रथम चरण में 25 नवंबर को मतदान होना है।
कहां गए पढ़े-लिखे
मिली जानकारी के अनुसार, उम्मीदवारों की तरफ से भरे अपने नामांकन पत्र का अध्ययन करने से साफ हो गया कि चुनाव में खड़े हो रहे 16 प्रत्याशी केवल आठवीं पास हैं। 11 प्रत्याशी हाईस्कूल पास हैं। चुनाव में खड़े हो रहे करीब 32 प्रतिशत प्रत्याशी ही ऐसे हैं जो कालेज गए हैं।
गुरेज सीट के लिए चुनाव में खड़े हुए चार प्रत्याशियों में से तीन ग्रेजुएट हैं जबकि एक हाईस्कूल पास है।
अब बात गंदरबल की। इधर से पीडीपी के उम्मीदवार काजी मोहम्मद अफजल ने तो शिक्षा का कॉलम ही खाली छोड़ दिया है। जबकि अफजल को टक्कर दे रहे कांग्रेसी उम्मीदवार मोहम्मद यूसुफ भट्ट हाईस्कूल तक पढ़ें हैं।
हाई स्कूल भी नहीं गए
अब बात हो जाए कंगन सीट की। इधर भी ज्यादातर वे ही चुनाव लड़ रहे हैं,जिनका पढने लिखने से कोई खास सरोकार नहीं रहा। बांदीपोरा सीट पर छह प्रत्याशी ऐसे हैं जो हाईस्कूल भी पास नहीं कर सके जबकि दो प्रत्याशी ग्रेजुएट हैं। सोनावारी सीट पर एक ग्रेजुएट प्रत्याशी चनाव में खड़ा हुआ है।
जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार आसिफ सोहाफ मानते हैं कि यह बेहद दुखद बात है कि पार्टियों ने सूबे के चुनाव में पढ़े-लिखे लोगों को टिकट नहीं दिया।












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