दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे किसानों की मौतों का हमारे पास कोई रिकॉर्ड नहीं: केंद्र सरकार
नई दिल्ली, 11 अगस्त: केंद्र सरकार की ओर से बीते साल जून लाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर करीब 9 महीने से प्रदर्शन कर रहे किसानों की मौत को लेकर सरकार के पास कोई आंकड़ा नहीं है। बुधवार को राज्य सभा में गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने एक सवाल के जवाब में कहा कि दिल्ली पुलिस ने एक किसान की आत्महत्या का मामला दर्ज किया था। इसके अलावा हमारे पास किसानों की मौत से जुड़ा कोई डाटा उपलब्ध नहीं है।

सरकार से सवाल किया गया था कि क्या गृह मंत्रालय ने प्रदर्शनकारी किसानों की ठंड, आत्महत्या और दूसरी वजहों से हुई मौतों का कोई रिकॉर्ड रखा है या नहीं। इस पर गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि उनके पास कोई रिकॉर्ड नहीं है। साथ ही उन्होंने कहा कि मृतक किसानों के परिवारों को किसी तरह का मुआवजा, आश्रितों को नौकरी या किसी दूसरी सहायता की भी कोई योजना नहीं है। उन्होंने राज्य सरकारें ऐसे मामलों में मुआवजे और नौकरियां देने पर विचार कर सकती हैं।
केंद्र के नए कृषि कानूनों के खिलाफ नवंबर 2020 से किसान दिल्ली की सीमाओं पर खुले आसमान के नीचे रह रहे हैं। कृषि संगठनों और मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले संगठनों का कहना है कि अब तक 500 से ज्यादा किसान सर्दी, गर्मी, आत्महत्या और दूसरे कारणों से धरनास्थलों पर जान गंवा चुके हैं। इसी को लेकर सरकार से सदन में सवाल पूछा गया था।
क्या हैं किसानों की मांग, जिसको लेकर इतना लंबा आंदोलन
बता दें कि केंद्र सरकार बीते साल जून में तीन नए कृषि कानून लेकर आई थी, जिनमें सरकारी मंडियों के बाहर खरीद, अनुबंध खेती को मंजूरी देने और कई अनाजों और दालों के भंडारण की सीमा खत्म करने जैसे प्रावधान किए गए हैं। इसको लेकर किसान जून के महीने से लगातार आंदोलनरत हैं और इन कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। किसानों का आंदोलन जून, 2020 से नवंबर तक मुख्य रूप से हरियाणा, पंजाब में चल रहा था। सरकार की ओर से प्रदर्शन पर ध्यान ना देने की बात कहते हुए 26 नवंबर को किसानों ने दिल्ली के लिए कूच कर दिया। इसके बाद 26 नवंबर, 2020 से देशभर के किसान दिल्ली और हरियाणा को जोड़ने वाले सिंधु बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर, गाजीपुर बॉर्डर और दिल्ली के दूसरे बॉर्डर पर धरना दे रहे हैं। दिल्ली के बॉर्डरों पर किसानों के धरने को अब करीब 9 महीने हो चुके हैं लेकिन सरकार मानने को तैयार नहीं है और किसान बिना मांगे मंगवाए वापस हटने को राजी नहीं हैं।
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