बिहार चुनाव- जहां महिलाएं बदलेंगी समीकरण
पटना। बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार पुरुषों से कहीं ज्यादा बढ़-चढ़ कर महिलाएं हिस्सा ले रही हैं। भले ही पहले तीन चरणों में 57 फीसदी महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया हो, लेकिन इसी वजह से राजनीतिक पंडितों की सारी गणित और आंकलन फेल होते नजर आ रहे हैं।

इतनी अधिक संख्या में महिलाओं के वोट मिलने के क्या कारण हो सकते हैं? नीतीश कुमार का काम, मोदी का केंद्र में शासन या लालू यादव की वापसी? चलिये जानते हैं, महत्वपूर्ण बिंदुओं के साथ।
- नीतीश कुमार की महिलाओं के उत्थान को केंद्रित करने वाली नीति सबसे पहली वजह है।
- लालू के कुशासन का डर और प्रधानमंत्री मोदी का एनडीए को प्रोजेक्ट करने से महिलाओं के वोट बंट गये हैं।
- सवर्ण जातियों की ज्यातर महिलाएं भाजपा के प्रति अपनी वफादारी ज्यादा दिखा रही हैं।
- हालांकि सवर्ण जातियों की महिलाओं का मतदान प्रतिशत बाकी जातियों की तुलना में अधिक रहा।
- ओबीसी-ईबीसी महिलाओं का वोट कहां जायेगा, इस पर संशय बरकरार है।
- ओबीसी-ईबीसी महिलाओं के वोट पर निर्णय उनका परिवार या समाज करता है।
- समाज व परिवार मतदान के ठीक एक या दो रात पहले तय कर लेते हैं कि किसे वोट देना है।
- ओबीसी-ईबीसी की ज्यादातर महिलाएं जाति के आधार पर वोट देती रही हैं।
क्या हो सकता है इस साल
- हालांकि इस बार ऐसा लग रहा है कि ओबीसी-ईबीसी महिलाएं परंपराओं को तोड़ रही हैं। ऐसा हुआ तो यही वोट गणित बिगाड़ने का काम करेंगे।
- ओबीसी-ईबीसी युवा इस वक्त सबसे ज्यादा समर्थन भाजपा कर रहे हैं। हो सकता है वे महिलाओं को भी प्रभावित करें।
- इस वर्ग की महिलाएं अच्छी तरह चीजों से वाकिफ हैं और अपना निर्णय खुद लेना जानती हैं।
- इस वर्ग की महिलाएं नीतीश कुमार से खुश हैं, लेकिन लालू प्रसाद यादव को पसंद नहीं करती हैं।
- ये महिलाएं नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहती हैं।
- रही बात बिहार में सरकार की तो ज्यादातर महिलाएं जदयू-भाजपा की सरकार चाहती हैं, न कि जदयू-राजद की।
नोट: यह लेख नीति सेंट्रल के लेख का सारांश है।












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