देश के मूड से मेल नहीं खाती तथाकथित मूडीज की रिपोर्ट

आसमान गिरने वाली कहानी सभी ने सुनी है। किसी पेड़ से एक अखरोट जमीन पर गिरा। बस मुर्गे ने चिल्लाना शुरू कर दिया कि आसमान गिर रहा है। थोड़ी देर में पूरे जंगल में हंगामा मच गया। ऐसा ही हंगामा ‘असहिष्णुता' के मुद्दे को लेकर अपने देश में मचा हुआ है। पंचतंत्र के ठगों की तरह एक बेबुनियाद डर बार-बार दिखाया जा रहा है। पूरे षड़यंत्र का मकसद है कि एक झूठ को इतनी बार बोला जाए, कि वो सच लगने लगे।


इस षड़यंत्र का ताजा शिकार बनी है मूडीज़ एनालिटिक्स की रिपोर्ट- 'इंडिया आउटलुक- सर्चिंग फॉर पटेन्शल।' इस सतही आकलन को नेशनल मीडिया होने का दंभ भरने वाले अंग्रेजी अखबारों ने सनसनीखेज बनाकर छापा। सभी न पूरी रिपोर्ट के एक खास हिस्से को उठाया और लगभग एक जैसी हैडिंग के साथ उसे प्रकाशित किया। साफ है कि इस खबर को एक खास रंग देने के लिए उन्हें किसी ने प्रेरित किया होगा।

मीडिया रिपोर्ट्स का लब्बोलुआब है कि प्रधानमंत्री मोदी भाजपा के नेताओं पर लगाम कसें, वर्ना वह दुनिया का भरोसा खो सकते हैं। ये दुनिया का पहला ऐसा मामला है जहां दुनिया की एक जानीमानी रेटिंग एजेंसी की सब्सिडियरी ने किसी देश की केंद्रीय सरकार के बारे में कहा है कि वो राज्यों की कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों और स्थानीय नेताओं की बयानबाजी के कारण दुनिया का भरोसा खो देगी। जाहिरतौर पर पूरी कवायद का मकसद भारत की एक गलत छवि पेश करना और निवेशकों को दूर रखना था।

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इस रिपोर्ट को लेकर मीडिया रिपोर्टिंग में जैसी एकरूपता देखने को मिली, वो भी खबर की सच्चाई पर सवाल खड़े करती है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर कुछ इस तरह शुरू होती है- देश में बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ बढ़ती आवाज को शुक्रवार को मूडीज़ एनालिटिक्स का साथ मिला, जो मूडीज कॉर्पोरेशन का एक डिविजन है। इसमें प्रधानमंत्री से आह्वान किया गया कि वो अपनी पार्टी के सदस्यों पर लगाम कसें, वर्ना घरेलू और वैश्विक विश्वसनीयता खोने का जोखिम है।

यहां यह समझने की भी जरूरत है कि मूडीज़ एनालिटिक्स और मूडीज एक नहीं हैं। मूडीज एनालिटिक्स मूडीज कार्पोरेशन की एक सहायक कंपनी है, जो वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज इनवेस्टर्स सर्विस से अलग है। इसलिए इस राय को मूडीज़ की राय बताना गलत है और मीडिया रिपोर्टिंग लोगों को बहकाने की कोशिश से अधिक कुछ नहीं। ये वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज इनवेस्टर्स सर्विसेज की आधिकारिक रिपोर्ट नहीं है।

साथ ही यह एक रिपोर्ट न होकर मूडीज़ एनालिटिकल्स के एक एसोसिएट इकॉनॉमिस्ट फराज सैय्यद की टिप्पणी भर है। यहां तक कि जिस रिपोर्ट को लेकर इंडियन एक्सप्रेस ने सिर आसमान पर उठा लिया वो मूडीज़ एनालिटिकल्स की मुख्य वेबसाइट पर भी नहीं है। इसे कमेंट्री सेक्शन के तहत एक माइक्रो साइट "डिसिमल साइनटिस्ट" में जगह मिली।

ये रिपोर्ट मुख्य रूप से आर्थिक मानकों पर आधारित है और चार खंडों में विभाजित है- (1) कुछ सकारात्मक बदलाव (2) लेकिन बाहरी बाधाओं में वृद्धि (3) धूमिल होते वित्तीय मनोभाव (4) राजनीति में सुधार की जरूरत। जहां दिल्ली के मीडिया ने सिर्फ अंतिम सेक्शन को ही रिपोर्ट किया, वहीं मूडीज की मेन वेबसाइट ने जब फराज सैय्यद की टिप्पणी को अपनी वीकली फोरकॉस्ट रिपोर्ट में शामिल किया तो इस अंतिम खंड को पूरी तरह छोड़ दिया और प्रधानमंत्री मोदी या असहिष्णुता का कोई जिक्र तक नहीं किया।

मूडीज की मुख्य वेबसाइट ने विवादित चौथे खंड को पूरी तरह छोड़ दिया, जो बताता है कि संस्थान स्वयं टिप्पणीकार की राजनीतिक राय से सहमत नहीं है।

जाहिरतौर पर यह भारतीय जनता को भ्रमित करने और भाजपा सरकार को नुकसान पहुंचने के लिए जानबूझकर किया गया दुर्भावनापूर्ण प्रयास था, जिसके लिए एक व्यक्ति की निजी राय को संस्थान की आधिकारिक राय बताकर पेश किया गया।

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