कभी नेहरू के चुनाव क्षेत्र रहे फूलपुर में इस बार क्यों हो रहा है 'मोदी-मोदी'?

नई दिल्ली- प्रयागराज (Prayagraj) से सटे यूपी के फूलपुर (Phulpur) लोकसभा क्षेत्र में एक साल के अंदर ही सियासी फिजा बदली-बदली नजर आ रही है। अगर यहां के लोगों को टटोलें तो मौजूदा चुनाव में 'मोदी बनाम सारे' की ही संभावना ही नजर आ रही है। जैसे-जैसे वोटिंग की तारीख नजदीक आ रही है वोटरों का उत्साह बढ़ता जा रहा है। 19.75 लाख वोटरों वाले इस क्षेत्र ने 2018 के उपचुनाव में बीजेपी को बहुत तड़ा झटका दिया था। लेकिन, आज यहां का माहौल काफी बदल चुका है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि बीते साल भर में ऐसा क्या हो गया कि यहां का राजनीतिक समीकरण बदल जाने की बात की जा रही है।

फूलपुर की ग्राउंड रिपोर्ट

फूलपुर की ग्राउंड रिपोर्ट

इलाहाबाद (Allahabad) में एक शॉप चलाने वाले अशित नियोगी कहते हैं कि, " इलाहाबाद और फूलपुर के निवासियों से अभी भी 2019 के बेहद कामयाब कुंभ की खुमारी उतरी नहीं है। कुंभ के चलते यहां विकास का बहुत सारा काम हुआ है, जिसे स्थानीय लोगों ने देखा और सराहा है। और निश्चित रूप से इससे बीजेपी को एडवांटेज है।" फाफामऊ के भास्कर सिंह कहते हैं 'जब राज्य में बीजेपी की सरकार बनी तो इस इलाके ने विकास देखना शुरू किया।' हालांकि, बिजनेसमैन अभिलाष बसक कहते हैं, "ढांचागत विकास तो हुआ है। लेकिन, जहां तक बायलेन का सवाल है, रोड खराब हैं और स्ट्रीट लाइट का इंतजाम तो बहुत ही बेकार है।" वे लूकरगंज इलाके में मानसून के दौरान जल भराव की समस्या भी उठाते हैं। हालांकि वे ये भी साफ कर देते हैं, "जहां तक लोकसभा चुनाव 2019 का सवाल है, तो मुझे लगता है कि लोगों का सेंटिमेंट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ है।" सिविल लाइंस के अमन मेहरा भी यही बात दोहराते हैं, "वह मोदी को वोट दे रहे हैं।"

जातीय समीकरण से नहीं है अछूता

जातीय समीकरण से नहीं है अछूता

वैसे कुछ ऐसे लोग भी हैं जो उपर जताए गए नजरिए से जरा भी इत्तेफाक नहीं रखते। इलाहाबाद के दारागंज निवास निर्मल कुमार दास कहते हैं, "जहां तक लोकसभा चुनाव की बात है तो विकास पीछे छूट चुका है और अब जातीय समीकरण की चर्चा है, जो पिछले दो दिनों में उभर कर सामने आया है।" यही कारण है कि समाजवादी पार्टी को यकीन है कि वह इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखेगी। पार्टी प्रवक्ता और एमएलसी राजपाल कश्यप कहते हैं, "फूलपुर, गोरखपुर और कैराना के उपचुनाव ने यूपी के चुनावी राजनीति की कहानी बदल दी है और राज्य से बीजेपी का सफाया साबित करने वाला रहा है। इन सभी क्षेत्रों में निश्चित तौर पर महागठबंधन को वोट पड़ेगा, जिसका लक्ष्य महापरिवर्तन है।"

बदला समीकरण बदले चेहरे

बदला समीकरण बदले चेहरे

अबकी बार यहां पर बीजेपी से केशरी देवी पटेल, समाजवादी पार्टी से पंधारी यादव और कांग्रेस से पंकज पटेल समेत कुल 14 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। जबकि, उपचुनाव में विपक्ष के साझा उम्मीदवार के तौर पर सपा के नागेंद्र प्रताप पटेल को जीत मिली थी। तब सपा उम्मीदवार को 3.42 लाख वोट मिले थे और उन्होंने बीजेपी के कौशलेंद्र सिंह पटेल को हराया था, जिन्हें 2.83 लाख वोट मिले थे। वैसे बीजेपी ने समाजवादी पार्टी के दावों को यह कहकर खारिज किया है कि उपचुनाव की तुलना में परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। पार्टी के मीडिया कोऑर्डिनेटर राकेश त्रिपाठी कहते हैं, "उपचुनाव में कम पोलिंग पर्सेंटेज के कारण बीजेपी की हार हुई थी। जबकि, पिछले एक साल में बड़ी संख्या में फर्स्ट टाइम वोटर (First time Voters) पार्टी के साथ जुड़े हैं। मुझे पूरा भरोसा है कि फूलपुर से बीजेपी की उम्मीदवार ही विजेता बनकर निकलेगी।"

फूलपुर से नेहरू का रहा है कनेक्शन

फूलपुर से नेहरू का रहा है कनेक्शन

फूलपुर सीट से जवाहरलाल नेहरू 1951, 1957 और 1962 में जीते थे। 1951 में यह क्षेत्र इलाहाबाद जिला (पूर्व) सह जौनपुर जिला (पश्चिम) के नाम से जाना जाता था। 1964 में नेहरू के निधन के बाद यहां से उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित 1964 और 1967 में जीतीं थीं। कांग्रेस यहां से आखिरी बार 1971 में जीती, तब विश्वनाथ प्रताप सिंह पार्टी के सांसद बने थे। इसके बाद यहां से ज्यादातर बार गैर-कांग्रेस और गैर-बीजेपी पार्टियां ही जीतती रहीं। सपा यहां से 1996,1998, 2004 और 2018 में जीती, जबकि 2009 में यह बसपा के खाते में गई। बीजेपी को पहली बार 2014 में यहां से कामयाबी मिली, जब यूपी के मौजूदा डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या यहां से विजयी रहे थे। उनके इस्तीफे के चलते ही 2018 में यहां चुनाव कराने पड़े थे।

फूलपुर में छठे दौर में 12 मई को वोटिंग होनी है। इस लोकसभा क्षेत्र के अंदर फूलपुर, फाफामऊ, सोरांव (सुरक्षित), इलाहाबाद पश्चिम और इलाहाबाद उत्तर विधानसभा क्षेत्र आते हैं।

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