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मोदी+मंडल+कमंडल= यूपी में विराट जीत, जानिए कैसे तय हुआ ये सफर

पीएम मोदी और अमित शाह दोनों ही जानते थे कि चुनाव काफी कठिन होने वाला है, इसलिए जीत सुनिश्चित करने के लिए मोदी के चहरे को मंडल और कमंडल के साथ इस्तेमाल किया गया।

नई दिल्ली। यूपी विधानसभा चुनाव में हुई भाजपा की प्रचंड जीत को भले ही सिर्फ मोदी लहर कहा जा रहा हो, लेकिन अगर इसकी बारीकियों पर गौर किया जाए तो यह जीत एक राजनीतिक रणनीति के तहत हासिल हुई है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने 18 महीनों तक इस जीत के लिए ताना-बाना बुना और आखिरकार जीत का सेहरा भाजपा के सिर सज गया। जाति, समुदाय और धर्म से परे हटकर अमित शाह और उनकी पार्टी ने एक ऐसा कैंपेन बनाया, जिससे वह लोगों के दिलों तक पहुंच सकें और उनके वोट पा सकें। इस कैंपेन की सफलता के लिए अमित शाह के पास तीन हथियार थे- मोदी, मंडल और कमंडल।

पीएम मोदी और अमित शाह दोनों को ही पता था कि उत्तर प्रदेश का चुनाव काफी कठिन होने वाला है, क्योंकि यूपी में स्थितियां काफी बदल चुकी हैं। उन्हें पता था कि इस बार 2014 के लोकसभा चुनाव की तरह प्रचंड जीत (80 में से 71 सीटें) मुश्किल होगी। इससे पहले भाजपा को 1991 में रामजन्मभूमि के मुद्दे के बल पर कुल 425 सीटों में से 221 सीटें (पूर्ण बहुमत) जीतने का मौका मिला था। इस बार के चुनाव में भाजपा ने लोगों में कांग्रेस प्रति गुस्से को भी भुनाया। वहीं दूसरी ओर कोई मुख्यमंत्री पद के लिए किसी के नाम की घोषणा न करते हुए पीएम मोदी के नाम पर ही उत्तर प्रदेश का चुनाव लड़ा। ये भी पढ़ें- यूपी चुनाव में छाई रहीं ये महिलाएं, देखें किसको मिली जीत और किसे मिली हार

क्या है कमंडल की राजनीति?

क्या है कमंडल की राजनीति?

इस बार के चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए मोदी के चहरे को मंडल और कमंडल के साथ इस्तेमाल किया। पश्चिमी यूपी और पूर्वी यूपी में शाह ने कमंडल (हिंदुत्व की राजनीति) का इस्तेमाल किया। उन्होंने शाक्य, राजभर, पासी, मौर्या, निषाद, पाल वोटर्स को टारगेट किया और सभी को एक छत के नीचे लाए। मोदी ने भी बार-बार 'दलित, शोषित, वंचित, पीड़ित समाज' की बात की, जैसे कि इंदिरा गांधी गरीबों के बीच जाकर गरीबी हटाओ का नारा देती थीं और विपक्षियों से टक्कर लेती थीं।

दशकों से भाजपा की छवि ब्राह्यण, बनिया और राजपूतों की पार्टी की रही है। उच्च श्रेणी के लोग ही भाजपा के मुख्य मतदाता के रूप में जाने जाते थे। इस बार के चुनाव में शाह को यह छवि भी बदलनी थी। इसके लिए उन्होंने गैर जाटव दलित और गैर यादव पिछड़ी जाति के लोगों से खुद को जोड़ा। पीएम मोदी ने यूपी में की अपनी 24 रैलियों में गरीबों को लेकर बातें कहीं। यह गुजरात से बिल्कुल अलग था, क्योंकि वहां पर पीएम मोदी को मध्यम वर्गीय लोग, बिजनेस क्लास के लोग और धर्म गुरुओं की ओर से वोट मिला।

मुस्लिम लोगों को कन्फ्यूज करके विपक्ष को नुकसान

मुस्लिम लोगों को कन्फ्यूज करके विपक्ष को नुकसान

पार्टी ने पाया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल में लोगों के बीच यादव-मुस्लिम जुगलबंदी के चलते काफी असंतोष है। समाजवादी प्राटी के शासन में अधिकतर सरकारी दफ्तरों और पुलिस थानों में यादव और मुस्लिम थे। अमित शाह ने एंटी यादव कंसोलिडेशन शुरू किया, ताकि इन हिस्सों में पार्टी की किस्मत बदली जा सके। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि पश्चिमी यूपी के मुस्लिम और दलित बसपा को वोट न करें। एक सोची-समझी रणनीति के तहत शुरुआती चरणों में हिंदुत्व का कैंपेन जोर-शोर से नहीं किया गया, ताकि मुस्लिमों को कन्फ्यूज किया जा सके। पूर्वांचल में बसपा कन्फ्यूज हुई और मुस्लिम वोट बंट गए, जिसकी वजह से सपा को नुकसान हुआ। पार्टी की तरफ से एक भी मुस्लिम को वोट नहीं दिया गया, जिसके लिए पार्टी के नेताओं से सार्वजनिक रूप से सफाई देने की बात भी कुछ लोगों ने कही। हालांकि, यह साफ था कि यह पूरी तरह से हिंदुओं की पार्टी है और आखिरकार इस मुद्दे पर कोई सफाई नहीं दी गई। ये भी पढ़ें- मोदी लहर के बावजूद पिता आजम खान से आगे निकल गए बेटे अब्दुल्ला

शाह का व्यवस्था परिवर्तन

शाह का व्यवस्था परिवर्तन

शाह ने पिछड़ी जाति को लामबंद करने का काम किया, जो राम मनोहर लोहिया के दिनों के बाद दोबारा नहीं देखा गया था, जिन्होंने एक झटके में जाति की राजनीति को छोड़ दिया था। 'मंडल' के मुद्दे पर वीपी सिंह को जमकर वोट मिले थे और एक बार फिर से इतिहास दोहराने के लिए भाजपा ने मंडल का मुद्दा उठाया। आपको बता दें कि मंडल कमीशन ने सिफारिश की थी कि पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिया जाए, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने मान लिया था। इससे एक साफ संदेश दिया गया कि अति पिछड़ा वर्ग के लोग और गैर जाटव दलितों को भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलेगा। शाह ने पिछड़ा वर्ग को 140 टिकट दिए और सिर्फ 8 टिकट यादवों को दिए। वहीं दूसरी ओर 83 टिकट दलितों को दिए गए। इसके अलावा 160 सीटों पर टिकट ठाकुर, ब्राह्यण, भूमिहार, बनिया, पंजाबी और जैन लोगों को दिए गए। यह था शाह का व्यवस्था परिवर्तन।

अनुप्रिया पटेल की भाजपा की सहायक पार्टी अपना दल को 11 टिकट दिए गए, जिससे कुर्मी वोटबैंक पर पकड़ मजबूत की गई, जबकि भारतीय समाज पार्टी को 8 टिकट देकर राजभर लोगों पर पकड़ बनाई। बची हुई 384 सीटों पर भाजपा ने चुनाव लड़ा।

अकांक्षा पेटी से परिवर्तन रथ

अकांक्षा पेटी से परिवर्तन रथ

भाजपा ने गैर यादव पिछड़ा वर्ग को टारगेट किया जिनकी संख्या कुल वोटों की 25 फीसदी है, जिनमें से 18 फीसदी गरीब हैं। भाजपा की तरफ से यूपी में जाकर महिलाओं को उज्जवला गैस, जन धन खाते, मुद्रा बैंक, शौचालय और कई अन्य सरकारी सुविधाओं के बारे में बताया, जिनकी शुरुआत गरीबों के लिए मोदी सरकार आने के बाद की गई, ताकि लोगों को आकर्षित किया जा सके। अकांक्षा पेटी ने भी एक अहम रोल अदा किया, जिसमें लोगों को अपनी परेशानियां लिखकर डालनी थीं। करीब 40 लाख लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी। इनमें कर्ज माफी, एंटी रोमियो स्क्वाड, बूचड़खानों के खिलाफ कड़ा कदम उठाने की मांग की गई थी, जिन्हें पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में भी जगह दी। भाजपा ने यूपी में परिवर्तन रथ अन्य पार्टियों से काफी पहले ही चला दिया था। इस रथ ने कुल 8,138 किलोमीटर की यात्रा तय की। पार्टी ने कुल 233 पब्लिक मीटिंग कीं और करीब 50 लाख लोगों से जुड़े।

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